जल प्रबंधन

न्याय पंचायत सिकन्दरा की भौगोलिक स्थिति

न्याय पंचायत सिकन्दरा के मध्य गंगा की एक सहायक नदी ‘मनसरिता’ (मनसइता) स्थित है। यह बरसाती नदी है जो बहुधा बरसात में ही उफनती है और आसपास के क्षेत्र में कुछ नुकसान भी करती है। कभी-कभी गंगा की बाढ़ से प्रभावित होती है। इस नदी की लम्बाई लगभग 35 किमी. है। यह नदी सिकन्दरा, बकसेडा, दलीपुर, बलीपुर की कृषि भूमि को भी  प्रभावित करती है

सिकन्दरा बकसेडा के मध्य एक पुल है बहुत पुराना और सकरा है बहुत दिनों से इस क्षेत्र की जनता इस पुल को नया बनाने तथा नदी पर बाॅंध बनाने के लिए सरकार को लिख रही है। क्षेत्रीय विधायक और सांसद को भी इस पुल और बाॅंध के लिए आवेदन दे चुकी है।
न्याय पंचायत में भी इस विषय को लेकर प्रस्ताव आया है तथा न्याय पंचायत के अन्तर्गत 9 ग्राम सभा है। जिसमें इस पुल और बाॅंध के लिए प्रस्ताव रखा गया है।
1. इस नदी पर बाॅंध बनाने से लगभग 5,000 एकड़ भूमि की सिंचाई की व्यवस्था हो सकेगी।
2. मत्स्यपालन की दृष्टि से इस नदी का व्यापक उपयोग किया जा सकता है।
3. इसके दोनों किनारों पर सड़क बनाकर विकास के संसाधन स्थापित किये जा सकते हैं।
4. कृषि पर आधारित उद्योग विकसित किये जा सकते हैं।
5. पर्यटन की दृष्टि से भी इस नदी को दर्शनीय बनाई जा सकती है।
6. इसके सही प्रबन्धन से कृषि योग्य भूमि को कटान और क्षरण से रोका जा सकता है।
जल प्रबंधन समिति के माध्यम से इस पर एक परियोजना प्रारूप बनाने का कार्य किया जा रहा है। क्षेत्रीय जन सहयोग एवं समाज मन्थन के माध्यम से इस पर शीघ्र कार्य योजना प्रस्तुत होगी।
आपराधिक न्याय प्रणाली में पुलिस की जिम्मेदारी
आज आम आदमी में पुलिस की छवि को लेकर जो टिप्पणियाॅं हो रही है, बहुत ही चिंता जनक हैं। इस दिशा में सरकार को भी ध्यान देना चाहिये। राज्य सरकारें स्वयं आये दिन इन संस्थाओं का अनैतिक उपयोग करती है। पूरे देश में पुलिस प्रशासन इस दिशा में गम्भीर नहीं है जिसका परिणाम अब सरकार, जनता और स्वयं पुलिस प्रशासन को भोगना पड़ रहा है।
‘आपराधिक न्याय-प्रणाली समकालीन चुनौतियों के परिपे्रक्ष्य में बढ़ती जिम्मेदारी’ विषय पर सी.बी.आई. की ओर से आयोजित समारोह में जस्टिस के.जी. बालाकृष्णन की टिप्पणी पुलिसिया कार्यवाही की हकीकत बयान करती है। समारोह में बोलते हुए के.जी. बालाकृष्णन ने दो टूक शब्दों में कहा-?देश भर में पुलिस द्वारा गिरफ्तारियों में 60 प्रतिशत गिरफ्तारियाॅं गैरजरूरी होती है? और बेवजह लोग गिरफ्तार कर प्रताड़ित किये जाते हैं।? इस टिप्पणी से पुलिस विभाग की बेशर्मी और उसकी कार्यप्रणाली से उपजी अमानवीयता का चित्र उभरता है। कम प्राथमिकी दर्ज कर पुलिस अपने दायित्व से मुक्त रहना चाहती हैं।
जिससे जनता की उचित शिकायतों पर भी ध्यान न दिये जाने के कारण अपराधों में वृद्धि होती है। उचित समीक्षा की अयोग्यता के कारण भी समस्यायें बढ़ती है या हम यह भी कहत सकते हैं, कि सही समीक्षा के प्रति पुलिस कर्मी में इच्छा-शक्ति का अभाव है। जाने-अनजाने पुलिस की गैर जिम्मेदारी से आम-आदमी को सही न्याय न मिलना भी एक गंभीर समस्या का महत्वपूर्ण कारण है। ऐसी स्थिति के लिए पुलिस की ओर जिम्मेदारी के प्रति जवाब देह होना चाहिये।
आज की परिस्थितियों में आतंकवादी गतिविधियों में सर्वाधिक लक्ष्य पुलिस कर्मी बन रहा है। कहीं न कहीं इस स्थिति के लिए पुलिसिया, कार्यवाही, गैर जिम्मेदारी, सही समीक्षा के प्रति इच्छा-शक्ति का अभाव, भ्रष्टाचार में संलिप्तता आदि कारण है। इस दिशा में जनता की पुलिस के प्रति बढ़ती घृणा एवं उदासीनता का सही कारण खोज कर सार्थक प्रयत्न किया जाना चाहिये।
ऐसी टिप्पणियों पर पुलिस विभाग को पूरे मन से आत्म निरीक्षण करना चाहिये और आवश्यक्तानुसार सुधार के प्रयत्न किये जाने चाहिये, क्यौंकि लोकतान्त्रिक मार्यादा का सब से अधिक हनन इन्हीं विसंगतियों से हो रहा है, आम आदमी के साथ न्याय प्रकिृया में आ रही विकृति एक गम्भीर समस्या का रूप धारण करती जा रही है। दुराग्रह ग्रस्त राजनीतिज्ञों द्वारा पुलिस का दुरूपयोग भी इन समस्याओं को गम्भीर बना देता है। इन स्थितियों से निपटने के लिए प्रबुद्ध वर्ग को कुछ ठोस बुनियादी आधार बनाने का प्रयत्न करना होगा जो सामाजिक स्तर पर समितियों के गठन एवं उनके निष्पक्ष निर्णयों के आधार पर पुलिस को सहयोग एवं सही वस्तु-स्थिति से अवगत कराकर उचित कार्यवाही के लिए मार्ग प्रशस्त करें। अन्याय, शोषण, दुराग्रह पूर्ण कार्यवाही और गैर जिम्मेदारी लोकतन्त्र के लिए घातक होती है।
व्यवहारिक रूप से पुलिस की सारी क्षमता वाहनों से हफ्तावसूलने, व्यापारियों की अनैतिक व्यापारिक गतिविधियों को खोजकर हिस्सेदारी वसूलने में एवं आपसी विवादों में भय दिखाकर दोनांे पक्षों से धन वसूलने में नष्ट होती है। अपराधियों के साथ मधुर संबन्धों के लिए भी पुलिस कर्मी निन्दा का पात्र बनता है। ये सारी स्थितियाॅं अब आम हो चुकी है?? और जो जन-जन में यह विदित है। विभागीय अधिकारियों को भी इस स्थिति का ज्ञान तो है पर वे इस स्थिति के प्रति पूर्णतः अनभिज्ञता प्रकट करते हैं, उन्हें इस स्थिति से कोई क्षोभ नहीं है। क्या यह विभागीय अकर्मण्यता नहीं है ? दैनिक चर्चा में सम्मिलित यह पुलिसिया कार्यक्रम अनवरत चलता रहता है पर इसके प्रति सब उदासीन है, क्या यह एक अशुभ-संकेत स्वस्थ्य लोकतन्त्र के लिए नहीं है ? हम इस तरह लोकतन्त्र की अर्थी सजाकर कब तक जीवित लोकतन्त्र की मुनादी करते रहेंगे? प्रबुद्ध वर्ग को इस स्थिति पर विचार कर इसके लिए उचित मार्ग दर्शन करना होगा।
कार्यालयों में कार्यरत कर्मचारी अपना जीवन स्तर बेहतर बनाने के लिए विभागीय व्यवस्था में खर्च होने वाले व्यय में कमीशन खोरी, बंदर बाॅंट में संलिप्त है। व्यापक रूप से सर्वत्र केवल लूट-खसोट ही पुलिस विभाग का भी एक सूत्रीय कार्यक्रम रह गया है राज्य सरकारें और केन्द्र सरकार भी इस समस्या को गम्भीरता को स्वीकार करती है पर इस समस्या से मुक्ति के लिए उदासीन है, लोकतन्त्र की छांव में बैठकर क्या हम लोकतंत्र सशक्त कर रहे हैं?
ऐसी स्थिति में जनता या तो आतंकवाद का या उग्रवाद का आश्रय लेती है या दैन्य-पलायन का आश्रय लेगी। ये दोनो स्थितियाॅं लोकतन्त्र के लिए अभिशाप है। जनता प्रशासनिक व्यवस्था से असंतुष्ट होकर दुःखी होती है तो कुछ न कुछ अशुभ ही होगा। हारना, प्रदर्शन, भूख हड़ताल और आल हत्यायें निश्चित रूप से लोकतन्त्र को निर्बल करती हैं। इस कलंक से लोकतन्त्र को बचाना होगा अन्यथा इतिहास हमें माफ नहीं करेगा। ?परित्राणाय साधूनां, विनाशाय च दुष्कृताम्? के संकल्प के परिप्रेक्ष्य में यह सब हमारी दयनीय स्थिति का बोध कराती है। सबको न्याय मिले, सब सुखी से जियें इसके लिए हमारा समर्पण हो इसी में हमारे जीवन की सार्थकता है, हमें इस भााव में जीने का संकल्प बना होगा। राष्ट्रीय स्तर पर व्याप्त भ्रष्टाचार पूरे लोकतन्त्र के लिए दूध में खटाई जैसा है आज ऐसा कोई नहीं दिखाई पड़ता है जो इस स्थिति से उबरने और उबारने के लिए कटिबद्ध हो, ऐसे में टूट रहा जन-विश्वास राष्ट्रीय मूल्यों को आहतकर रहा है, जो भी राजनीतिक हस्तक्षेप में सामाजिक ढांचे को बिगाड़ने मके लिए उत्तरदायी हो, उसे ध्वस्त करने की आवश्यक्ता है। यह सब तक संभव होगा जब प्रबुद्ध वर्ग संगठित होकर समाज को विकसित और जागृत करने का संकल्प लेगा, हम सब को मिलकर समाज को जोड़ने और उसमे राष्ट्रीय भावना विकसित करने का संकल्प लेना होगा। राज्य का यह मौलिक कर्तव्य है कि वह भ्रष्टाचार और अपराध से जनता की साथ ही साथ रक्षा करे। जनता को भी इसके लिए विकल्प खोजना पड़ेगा। शासक वर्ग सत्ता का दुरूपयोग न कर सके इसके लिए जनता को सावधान रहना चाहिये और ऐसे लोगों को प्रतिनिधित्व का अवसर ही नहीं देना चाहिये।
गांधी इस देश की संस्कृति है, इन्हें इतिहास न बनायें
भारतीय संस्कृति, इसकी सामाजिक संरचना, समरसता, सहिष्णुता, उदारता और किसी भी सभ्यता के प्रति सद्भाव, किसी भी धर्म के प्रति सम्मान यह सब इस राष्ट्र के आभूषण हैं। हमारे ग्रन्थ, वेद, उपनिषद, पुराण, इस बात के प्रमाण है कि हम युगों-युगों से मानव जीवन के मूल्यों, संस्कारों, मान्यताओं और आचरण व्यवहार में शुचिता के ग्राहक रहे हैं। सुख-शान्ति की कामना और त्याग-बलिदान की भावना से ओत-प्रोत भारतीय समाज दुनिया में जहाॅं भी हैं सुख-समृद्धि का प्रतीक हैं।
पूरी दुनिया गाॅंधी के भारत का सम्मान करती है तथा भारतीय सामाजिक संरचना के प्रति उदार मना है। हमारी योग साधना को स्वीकार कर प्रमाण भी प्रस्तुत किया है। मन, शरीर, वाणी, कर्म मंे सुचिता हमारी इस उपलब्धि का आधार स्तम्भ है। हम अपनी इस जीवन धारा से बिमुख न हों तथा निरन्तर इस दिशा में मंथन करते रहे तो संसार को नयी चेतना मिल सकती है और परस्पर हम एक दूसरे के पूरक बन सकते हैं।
मूलतः यही गाॅंधी दर्शन है जो हमें सतत् प्रेरणा प्रदान करता रहेगा हम अपनी राह से भटककर कहीं खो न जाएं इसलिए आइये समाज मन्थन करें और समाज को सुन्दरतम बनाने का प्रयास करें।
सम्पर्क –
1- गिरिजेश   पाण्डेय
ब्यूरो चीफ शार्प रिपोर्टर
बकसेड़ा, सिकन्दरा, इलाहाबाद
मो0: 9452658184
E-mail : girijeshpandey2014@gmail.com
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