नई ऊंचाई पर भारत-बांग्लादेश संबंध/ -अरविंद जयतिलक

बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना की भारत यात्रा से दोनों देशों के ऐतिहासिक व सभ्यतागत संबंधों को नई ऊंचाई मिली है। दोनों ही देश महत्वपूर्ण समझौतों पर मुहर लगाकर संकेत दे दिए हंै कि बदलते वैश्विक परिदृश्य में कंधा जोड़ने को तैयार है। दोनों ही देश घुसपैठ, उग्रवाद, आतंकवाद की साझा चिंताओं के संदर्भ में एक-दूसरे की विरोधी गतिविधियों को कार्यान्वित करने के लिए अपने भू-क्षेत्र का इस्तेमाल न होने देने के पुराने संकल्प पर अडिग हैं और साथ ही अपनी नई भूमिका के नए विस्तार के लिए तैयार भी। शेख हसीना की यह यात्रा इस अर्थ में ज्यादा महत्वपूर्ण है कि भारत इस क्षेत्र का सबसे महत्वपूर्ण देश है जो चारों ओर से ऐसे पड़ोसियों से घिरा हुआ है जहाँ कुछ के साथ संबंध बेहतर हैं वहीं कुछ के साथ उसे चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। विशेष रुप से पड़ोसी देश पाकिस्तान की वजह से इस क्षेत्र में संघर्ष और अशांति की स्थिति है और दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि चीन उसका मददगार बन माहौल में तनाव घोल रहा है। जबकि वह भलीभांति परिचित है कि पाकिस्तान भारत विरोधी गतिविधियों में लिप्त है और दुनिया में उसकी पहचान आतंकी देश के रुप में चिंहित हुई है। यह उचित है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना की मौजूदगी में आतंकवाद को पोषित करने वाली पाकिस्तान की घृणित मानसिकता पर कड़ा प्रहार किया और बांग्लादेश को सावधान रहने की सीख दी। प्रधानमंत्री ने आतंकवाद से जूझते भारत और बांग्लादेश की मौजूदा स्थिति की तुलना वर्ष 1971 की उस मानसिकता से की जो बांग्लादेश को दबाने की कोशिश कर रहा था। इन परिस्थितियों के बीच अगर भारत और बांग्लादेश देश विकास और सुरक्षा के क्षेत्र में आपसी सहयोग को आयाम देते हैं तो यह दोनों देशों के हित में है। दोनों देशों ने परमाणु उर्जा के शांतिपूर्ण उपयोग के लिए सहयोग के अलावा डिफेंस कोआॅपरेशन फ्रेमवर्क, स्टेटेजिक एंड आॅपरेशनल स्टडीज, साइबर सिक्युरिटी, इन्फारमेशन टेक्नोलाॅजी, आउटर स्पेस समेत कुल 22 समझौता कर आपसी सहयोग की नींव को मजबूत की है। इतिहास गवाह है कि भारत और बांग्लादेश के बीच प्रगाढ़ सामाजिक और सांस्कृतिक रिश्ता है जिससे चाहकर भी खत्म नहीं किया जा सकता। उचित ही है कि दोनों देशों ने इस मधुर रिश्ते को और मजबूती देने के लिए कोलकाता से खुलना के बीच बस एवं रेल सेवा और राधिकापुर-बीरोंल रेललिंक को जनता को समर्पित कर दिया। इस पहल से दोनों देशों के बीच आवाजाही तेज होगी और सांस्कृतिक-भाषायी संबंद्धता मजबूत होगी। नागरिकों के बीच अंतःक्रियाएं बढेंगी और उच्च स्तरीय विनिमय के अलावा जनता से जनता का संबंध और संवाद प्रगाढ़ होगा। शिक्षा, विज्ञान और तकनीकी सहयोग के अलावा व्यापार-कारोबार में वृद्धि होगी।

 

गौरतलब है कि दक्षिण एशिया क्षेत्र में बांग्लादेश भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक सहयोगी है। बांग्लादेश में भारतीय निवेश व्यापक स्तर पर होता है। ये क्षेत्र हैं-टेक्सटाइल्स, निर्माण उद्योग, रसायन, पेंट, फार्मास्यूटिकल, अस्पताल, यात्रा, बैग, आइटी, आयुर्वेदिक उत्पाद, गरी का तेल, आॅटोमोबाएल तथा सफेद सीमेंट इत्यादि। भारत की कई कंपनियां बांग्लादेश में काम कर रही हैं। जनवरी 2005 में भारत-म्यांमार और बांग्लादेश के बीच यांगून में एक त्रिपक्षीय बैठक हुई जिसमें बांग्लादेश से होकर पाइपलाइन द्वारा तटीय गैस को भारत ले जाने पर विचार विमर्श हुआ। इसे अमलीजामा पहनाने की जरुरत है। भारत बांग्लादेश संबंध इस बात का जीवंत उदाहरण है कि भारत अपने पड़ोसियों को हरसंभव यहां तक कि अपनी कीमत पर भी मदद करना चाहता है। यही वजह है कि दोनों देशों के बीच व्यापारिक और कारोबारी गतिविधियां बढ़ी हैं। फिलहाल दोनों देशों के बीच व्यापार संतुलन भारत के पक्ष में है। बांग्लादेश प्रायः यह शिकायत करता रहता है कि बांग्लादेशी सामान जब भारतीय बाजारों में पहुंचता है तो उन्हें गैर-प्रशुल्क बाधाओं का सामना करना पड़ता है। लेकिन सच्चाई यह भी है कि भारत द्वारा प्रस्तावित मुक्त व्यापार समझौते पर बांग्लादेश ने कोई रुचि नहीं दिखायी। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह भी है कि बांग्लादेश लगातार भारतीय वस्तुओं को पारगमन की सुविधा देने से इंकार करता रहा है जिससे उसे राजस्व की हानि होती है। बांग्लादेश की राजस्व हानि का एक महत्वपूर्ण कारण तस्करी की समस्या भी है। दोनों देशों को मिलकर इस समस्या का हल ढूँढ़ना होगा। बांग्लादेश अपनी जरुरत की चीजों-खाद्य, तेल मसाले, इत्यादि की आपूर्ति भारत के लोगों को गैर जरुरी या आराम के साधनों-जापानी कैमरा, टेपरिकार्डर इत्यादि की तस्करी द्वारा करता है। सच तो यह है कि दोनों देशों के बीच व्यापार के बजाए तस्करी खूब फल-फूल रही है जिससे दोनों देशों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है। भारत को भी बांग्लादेश से शिकायत है कि उसकी भूमि तेजी से इस्लामी कट्टरपंथियों का अड्डा बन रहा है। वहां पर अंतर्राष्ट्रीय आतंकवादी संगठनों से संबंधित अनेक गुट सुरक्षित अभ्यारण्य पाते हैं। इसके अतिरिक्त पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आइएसआइ ने बांग्लादेश को भारत विरोधी कार्यवाहियों को अंजाम देने के लिए अपना अड्डा बनाया है। भारत की दूसरी चिंता यह है कि बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हिंदुओं पर लगातार हमले हो रहे हैं। हिंदुओं की तादाद लगातार घट रही है। उनके अधिकार सीमित हो रहे हैं। कट्टरपंथी ताकतें उन्हें जबरन इस्लाम स्वीकारने को विवश कर रही हैं। पिछले कुछ वर्षों में हिंदुओं के पूजास्थलों पर हमले बढ़े हैं। शेख हसीना सरकार को इसे गंभीरता से लेते हुए अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित कर कट्टरपंथी ताकतों पर लगाम लगाना चाहिए। बेहतर होगा कि बांग्लादेश आतंकी संगठनों पर भी कड़ाई से प्रहार करे ताकि भारतीय उपमहाद्वीप में शांति की स्थापना हो सके। बांग्लादेश को आतंकवाद के मसले पर भारत के प्रति इसलिए भी ज्यादा संवेदनशील होना चाहिए कि पाकिस्तान से अलग होकर 1971 में वजूद में आया बांग्लादेश के निर्माण की प्रक्रिया में भारत की विशेष भूमिका रही है। भारत ने बांग्लादेश की आजादी के लिए लड़ने वाली मुक्तिवाहिनी के जवानों को प्रशिक्षण और हथियार ही नहीं दिए बल्कि एक करोड़ शरणार्थियों का भरण-पोषण भी किया। भारत पहला देश था जिसने बांग्लादेश की स्थायी सरकार बनने से पहले ही उसे 6 दिसंबर, 1971 को मान्यता प्रदान की। 10 दिसंबर, 1971 को भारत ने बांग्लादेश के तत्कालीन कार्यवाहक राष्ट्रपति के साथ समझौता किया जिसके आधार पर भारतीय सेना व मुक्तिवाहिनी की संयुक्त कमान बनाकर बांग्लादेश को पूर्ण आजादा कराने का प्रयास किया गया। इसके अलावा आवश्यक नागरिक सेवाएं स्थापित करना, शरणार्थियों को वापस लौटाने, विदेश नीति तथा सामान्य स्थिति बहाल करने के बारे में भी दोनों के बीच सहमति हुई। भारत ने शेख मुजीबुर्रहमान की पाकिस्तान से रिहाई के लिए प्रयास किया और 10 जनवरी, 1972 को इसमें सफलता मिली। निःसंदेह ताकतवर व समृद्ध होने के नाते भारत की जिम्मेदारी भी है कि वह अपने पड़ोसी देश बांग्लादेश की आर्थिक तरक्की और सुरक्षा का ध्यान रखे। भारत इस भूमिका का सार्थक निर्वहन कर रहा है।

 

मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा बांग्लादेश की जनता की खुशहाली एवं समृद्धि के लिए पांच अरब डाॅलर की वित्तीय मदद देने का एलान उसकी सार्थक भूमिका को ही रेखांकित करता है। निःसंदेह भारत के आर्थिक मदद से बांग्लादेश की ढांचागत परियोजनाओं को मजबूती मिलेगी और विकास की रफ्तार तेज होगी। लेकिन कुछ ऐसे विवादित मसले भी हैं जिन पर अभी तक दोनों देशों के बीच सहमति नहीं बन पायी है। इनमें सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण विवाद का विषय नदियों के पानी के बंटवारे की समस्या है। दोनों देशों के बीच 54 सांझी नदियां है। परंतुु सबसे अधिक विवाद का विषय गंगा के पानी के बंटवारे को लेकर है। अच्छी बात है कि दोनों देश विवादित मसले को सुलझाने के प्रति संवेदनशील हैं और देर-सबेर इसका हल निकलना तय माना जा रहा है। अच्छी बात है कि भारत यात्रा पर आयी बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तीस्ता जल बंटवारे संधि पर जल्द अंतिम फैसले लेने का आश्वासन दिया है। अन्य विवादों को भी शीध्रता से निपटाया जाना चाहिए। इसमें तनिक भी आशंका नहीं कि शेख हसीना की यह यात्रा भारत-बांग्लादेश संबंधों में नया ऐतिहासिक मोड़ लाने की दिशा में मील का पत्थर साबित हो सकती है।

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