तिब्बत पर मुखर होने की जरुरत/-अरविंद कुमार सिंह

तिब्बती धर्मगुरु दलाई लामा के अप्रैल माह में अरुणाचल प्रदेश के दौरे को लेकर जिस तरह चीन द्वारा प्रतिकार जताते हुए द्विपक्षीय संबंधों में खटास उत्पन होने और विवादित सीमा क्षेत्र की शांति भंग होने का राग अलापा गया है वह कुल मिलाकर उसकी छल-कपट की कुटनीति को ही उजागर करता है। अच्छी बात है कि भारत ने चीन की आपत्ति को दरकिनार कर धर्मगुरु दलाई लामा के कार्यक्रम में किसी तरह के फेरबदल से इंकार कर दिया है। समझ से परे है कि चीन क्यों नहीं समझता है कि भारत एक लोकतांत्रिक व धर्मनिरपेक्ष देश है और धर्मगुरु दलाई लामा को देश के किसी भी हिस्से में आने-जाने का अधिकार है। चीन का यह कहना कि दलाई लामा चीन विरोधी अलगाववाद को हवा दे रहे हैं और भारत उन्हें संरक्षण दे रहा है बिल्कुल गलत है। सच तो यह है कि चीन ही ऐसे लोगों को प्रश्रय दे रहा है जो भारत विरोधी गतिविधियों में लिप्त हैं। जैश-ए-मुहम्मद के सरगना अजहर मसूद को किस तरह चीन का वरदहस्त प्राप्त है कि किसी से छिपा नहीं है। अब समय आ गया है कि भारत चीन पर कुटनीतिक दबाव बनाने के लिए तिब्बत की स्वतंत्रता पर मुखरता बढ़ाए ताकि वह अंतर्राष्ट्रीय मंचों से भारत विरोध के एकसूत्रीय एजेंडे से पीछे हटे। इसलिए कि चीन न केवल कश्मीर मसले पर पाकिस्तान से गलबहियां किए हुए है बल्कि सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सदस्यता का भी विरोध कर रहा है। अगर भारत तिब्बत में मानवाधिकारों के हनन को मुद्दा बनाकर इस मसले को अन्तरराष्ट्रीय कुटनीति की तीव्र आंच पर रखता है तो निःसंदेह चीन की मुश्किलें बढ़ेगी। तिब्बत की स्वतंत्रता का मसला चीन की कमजोर नस है और उस पर भारत द्वारा प्रहार किया जाना चाहिए। लेकिन आश्चर्य है कि आजादी के बाद अभी तक किसी भी सरकार ने तिब्बत के मसले पर चीन से मनोवैज्ञानिक युद्ध लड़ने में दिलचस्पी नहीं दिखायी। यह सही है कि चीन ने भारत के पूर्व सत्तासीन अधिष्ठाताओं से समय-समय पर कुबुलवा रखा है कि ताईवान और तिब्बत चीन का हिस्सा है। लेकिन चीन की बढ़ती आक्रामकता और दुस्साहस को देखते हुए आज की तारीख में पूर्व की स्वीकारोक्ति से बंधे रहना उचित नहीं होगा। इसलिए और भी कि चीन जम्मू-कश्मीर और अरुणांचल प्रदेश पर अपनी गिद्ध दृष्टि लगाए हुए है। वह हर दिन इस इलाके में अपनी सीमा विस्तार में जुटा रहता है। वह कुलमिलाकर इन दोनों इलाकों में अपना प्रत्यक्ष या परोक्ष वर्चस्व देखना चाहता है। उसकी कोशिश है कि जम्मू कश्मीर और अरुणाचल प्रदेश में भारतीय प्रभुसत्ता को अवैध ठहरा दिया जाय। इसी रणनीति के तहत वह पिछले कुछ वर्षों से जम्मू-कश्मीर में तैनात भारतीय सैन्य अधिकारियों को वीजा देने से इंकार करता रहा है। अभी चंद रोज पहले ही उसने प्रस्ताव रखा है कि भारत अगर अरुणाचल के तवांग इलाके को चीन को सौंप देता है तो वह भी बदले में उसे अक्साई चीन का इलाका दे सकता है। भारत ने चीन के इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया है। लेकिन कश्मीर में चीन की दुस्साहसपूर्ण गतिविधियां चिंता पैदा करने वाली है। इसलिए और भी कि पाकिस्तान जम्मू-कश्मीर का आंगन चीन के लिए खोल दिया है। उसी का नतीजा है कि आज इस्लामाबाद से चीन के उरुमची तक आवागमन तेज हो गया है। अगर भारत सतर्कता नहीं बरतता है तो बीजिंग-इस्लामाबाद का नापाक गठजोड़ भारत की संप्रभुता के लिए खतरनाक साबित हो सकता है।

 

याद होगा गत वर्ष न्यूयार्क टाईम्स के हवाले से कहा गया कि गुलाम कश्मीर में सामरिक रुप से महत्वपूर्ण गिलगित-बल्तिस्तान क्षेत्र पर चीन अपना वर्चस्व बढ़ा रहा है। यहां तकरीबन 10000 से अधिक चीनी सैनिकों की मौजूदगी बराबर देखी जा रही है। चीन इन क्षेत्रों में निर्बाध रुप से हाईस्पीड सड़कें और रेल संपर्कों का जाल बिछा रहा है। सिर्फ इसलिए की युद्ध के समय वह भारत तक अपनी आसान पहुंच बना सके। चीन अरबों रुपये खर्च करके कराकोरम पहाड़ को दो फाड़ करते हुए गवादर के बंदरगाह तक रेल डालने के प्रयास में भी जुटा है। अरुणाचल प्रदेश में भी चीन की चालबाजी विगत कई सालों से देखी जा रही है। जब भी भारत विरोध जताता है तो उसकी ओर से धौंसपट्टी दी जाती है। वह आज भी अरुणांचल प्रदेश को भारत का हिस्सा मानने को तैयार नहीं है। या यों कहें कि भारत द्वारा तिब्बत को चीन का हिस्सा स्वीकारने के बावजूद भी वह अरुणंाचल प्रदेश पर अपना दावा छोड़ने को तैयार नहीं है। वह एक कुटनीति के तहत भारत के साथ सीमा विवाद हल करने के बजाए उलझाए रखना चाहता है। इसलिए कि भारत के उपर उसका मनोवैज्ञानिक दबाव बना रहे। वह अरुणाचल प्रदेश के 90,000 वर्ग किमी पर अपना दावा आज भी छोड़ने को तैयार नहीं है। यही नहीं वह अरुणाचल प्रदेश के चुने गये किसी भी जनप्रतिनिधि को भी चीन जाने का वीजा नहीं देता है। जबकि भारत सीमा विवाद सुलझाने के लिए 1976 से ही प्रयास कर रहा है। उधर, चीन आज तक दस्तावेजों के आदान प्रदान में अपने दावे के नक्शे को भारत को उपलब्ध नहीं कराया है। जबकि इसके बावजूद भी भारत चीन की तमाम शर्तों को स्वीकारते हुए सीमा विवाद को सुलझाने के लिए तैयार है। अब भारत को चीन के आगे दबने के बजाए अपने रुख में कड़ा बदलाव लाने की जरुरत है।

 

भारत को समझना होगा कि उसकी दोस्तानी नीति से चीन के खतरनाक इरादों में बदलाव आने वाला नहीं है। इसलिए कि चीन का पारंपरिक इतिहास ही पीठ में छूरा भोंकने वाला रहा है। उचित होगा कि भारत भ्रम से बाहर निकले और तिब्बत पर मुखरता बढ़ाए। तिब्बत पर शुतुर्गमुर्गी रवैए के कारण ही चीन के मामले में भारत की विदेशनीति भटकाव का शिकार रही है। कहना गलत नहीं होगा कि चीन के जवाब में भारत के पास सौदेबाजी की नेहरु काल की बची हुई सीमित ताकत यानी तिब्बत का मसला परवर्ती हुक्मरानों ने मुफ्त में गंवा दी है। सिर्फ इस उम्मीद में की इससे चीन के रुख में बदलाव आएगा और दोनों देशों के संबंध सुधरेंगे। गौर करें तो देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरु से लेकर मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक सभी ने तिब्बत को स्वशासी क्षेत्र स्वीकार किया है और उसी का नतीजा है कि चीन बेफिक्र होकर कश्मीर और अरुणाचल प्रदेश के मसले पर भारत पर दबाव बनाने में सफल रहा है। यहीं नहीं वह खुलकर कश्मीर मसले पर पाकिस्तान के साथ खड़ा है। यहां ध्याान देना होगा कि चीन जब भी भारत से सीमा विवाद पर वार्ता करता है सबसे पहले भारत से कुबुलवा लेता है कि तिब्बत चीन का हिस्सा है। विडंबना यह कि भारत कभी भी चीन से यह कुबुलवा नहीं पाता है कि कश्मीर भी भारत का अविभाज्य अंग है। इसी कमजोरी का लाभ उठाकर चीन भारत को चारो ओर से घेरने में जुटा है। भारत की ढ़ुलमुल नीति का ही नतीजा है कि चीन भारत के पड़ोसी देशों मसलन नेपाल, बंगलादेश और म्यांमार में अपना हस्तक्षेप बढ़ा रहा है। भारत समेत संपूर्ण दुनिया इस तथ्य से भलीभांति परिचित है कि वह श्रीलंका में बंदरगाह बना रहा है। अफगानिस्तान में अरबों डाॅलर निवेश कर तांबे की खदानें चला रहा है। म्यांमार की गैस संसाधनों पर कब्जा जमाने की जुगत में है। खबर तो यहां तक आ रही है कि वह कोको द्वीप में भी नौ सैनिक बंदरगाह बना रहा है। सामरिक हित को ध्यान में रखते हुए वह नेपाल में रेलवे लाईन बिछाने और बेहतरीन सड़कों के निर्माण में जुट गया है। इसके अलावा वह नेपाल के अन्य क्षेत्रों मसलन शिक्षा, बिजली में भी भरपूर धन खर्च कर रहा है। वह नेपाल के लोगों को प्रभावित करने के उद्देश्य से वहां पुस्तकालय, विज्ञान प्रयोगशाला के अतिरिक्त हजारों की संख्या में स्कूल खोल रहा है।

 

महत्वपूर्ण बात यह कि चीन को माओवादियों का खुला समर्थन मिल रहा है। नेपाल में माओवादियों की एक विशाल आबादी वैचारिक रुप से स्वयं को चीन के निकट पाती है। चीन इस वस्तुस्थिति से सुपरिचित है इसीलिए वह उसका भरपूर फायदा उठा रहा है। साथ ही वह वैचारिक निकटता का हवाला देकर भारत विरोधी माओवादियों को भड़का भी रहा है। दूसरी ओर नेपाल के माओवादी नेता भी स्वयं को भारत विरोधी प्रचारित करने से बाज नहीं आ रहे हैं। चीन की शह पर ही वे 1950 की भारत-नेपाल मैत्री संधि का विरोध कर रहे हैं। जबकि यह संधि भारत के लिए सामरिक लिहाज से अति महत्वपूर्ण है। उचित होगा कि भारत नेपाल में चीन के बढ़ते हस्तक्षेप पर अंकुश लगाए अन्यथा भारत की संप्रभुता और सुरक्षा को खतरा उत्पन हो सकता है। इसलिए और भी कि चीन अपनी रक्षा बजट में लगातार इजाफा कर रहा है। गत वर्ष प्रख्यात पत्रिका फोब्र्स द्वारा खुलासा किया गया कि 2020 तक भारत और चीन एक बार फिर आमने-सामने हो सकते हैं। देखा जा रहा है कि चीन रक्षा क्षेत्र में 70 अरब डालर सालाना खर्च कर रहा है। उसके पास 32 लाख सक्रिय सैनिक भी हैं। जबकि भारत का रक्षा बजट चीन की तुलना में आधे से भी कम है। चीन को अर्दब में रखने के लिए भारत को चाहिए कि वह तिब्बत का मसला उठाकर चीन विरोधी देशों का लामबंद करे। अगर भारत तिब्बत मसले पर अपनी कुटनीतिक धार को पैना करता है तो चीन को भी अरुणाचल और कश्मीर के मसले पर टुटते देर नहीं लगेगी।

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