तीस्ता की गोद और बौद्ध के पालने में जवां होता प्रकृति का अनिंद्य सौन्दर्य ‘गंगटोक’

यह मंगोलियन, चीनी, बांग्ला, पहाडी, नेपाली, हिंदू मिश्रित संस्कृतियों का अद्भुत और अकल्पनीय भारतीय प्रदेश है। तिब्बत के पठारों से निकलती तीस्ता सिक्किम के लिए जीवनरेखा है। इसकी घाटी में पहाडी जीवन पैदा और जवां होता है। इस लिए तीस्ता यहा के जनमानस के लिए केवल एक नदी भर नहीं है, बल्कि उनके जीवन की वह गंगा है, जो जीवन की तरह अविरल-निष्कलंक और शाश्वत प्रवाहित होती है। उनके सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन के साथ-साथ पीढ़ियों से पीढ़ियों तक रक्तसंबंधों की तरह चलती आयी है और शायद चलती जायेगी। यहां का लोक जीवन अपने सुख दुख के साथ तीस्ता को अपना जीवन आधार मानता है। गंगटोक के जिन रास्तों से आम जीवन की रफ़्तार चलती है, तीस्ता उनके साथ चलती है और चलती हुई यह प्रकृति के अनिंद्य सौन्दर्य का हिमालयन जीवन से मिलन है या सूर्य की दुधिया रौशनी में नहाई दुनिया की तीसरी सबसे ऊँची पर्वत माला कंचनजंघा के बदलते रंगों का अद्भुत, आलौकिक, अविस्मरणीय और अकल्पनीय अनुभूति। यह गांतोक से ‘सेवन सिस्टर’ झरने के फेन को अपलक निहारने और उसके ऊँचाई की कल्पना करने का प्रदेश है, या ‘तासी व्यू प्वाईंट’ से समूचे हिमालयन संसार के अद्भुत और आलौकिक सौन्दर्य को नंगी आँखों में हमेशा हमेशा के लिए कैद कर लेने वाली राख से जी उठी जिजीविषा का। यह बौद्ध के पालने में प्रकृति के साथ जवां होते उस मानस का देश है जिसने इस संसार को बचाने के लिए, संसार को ही ड्रैगन के सुरक्षा घेरे में कर दिया है और इन धार्मिक आस्थाओं को ‘तासी व्यू प्वाईंट’ की सबसे ऊँची पहाड़ी पर मूर्ति के रूप में स्थापित कर बौद्ध की मान्यताओं को बल दे दिया है।

यह मंगोलियन, चीनी, बांग्ला, पहाडी, नेपाली, हिंदू मिश्रित संस्कृतियों का अद्भुत और अकल्पनीय प्रदेश है। तिब्बत के पठारों से निकलती तीस्ता सिक्किम के लिए जीवनरेखा है। इसकी घाटी में पहाडी जीवन पैदा और जवां होता है। इस लिए तीस्ता यहा के जनमानस के लिए केवल एक नदी भर नहीं है, बल्कि उनके जीवन की वह गंगा है, जो जीवन की तरह अविरल-निष्कलंक और शाश्वत प्रवाहित होती है। उनके सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन के साथ-साथ पीढ़ियों से पीढ़ियों तक रक्तसंबंधों की तरह चलती आयी है और शायद चलती जायेगी। यहां का लोक जीवन अपने सुख दुख के साथ तीस्ता को अपना जीवन आधार मानता है। गंगटोक के जिन रास्तों से आम जीवन की रफ़्तार चलती है, तीस्ता उनके साथ चलती है और चलती हुई पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग एवं जलपाईगुड़ी जिलों से दक्षिण-पूर्व दिशा में प्रवाहित होती हुई पूर्वी पाकिस्तान (बंगलादेश) के रंगपुर जिले में ब्रह्मपुत्र नदी में मिल जाती है। 18वीं शताब्दी के उत्तरार्ध तक इसका संगम गंगा नदी से होता रहा, किंतु सन 1787 ई. की बाढ़ में इसकी धारा दक्षिण-पूर्व को मुड़कर ब्रह्मपुत्र नदी में मिल गई है।।
आकाश में तैरती ये खुबसूरती बडी पेशेवर हैं
यह नवम्बर की 8वीं तारिख है। भोर के कोई 4 बजे हैं। अवध की सुबह बडी शांत है चूँकि शाम उतनी ही जवां थी। माल एवन्यू के फ्लैट से मेरे साथ दो बुजुर्ग टैक्सी में बैठ गएं। हम सरपट जेल रोड़ होते हुए आलमबाग पहुँच रहे थें, अगले दस मिनट में राजधानी लखनऊ की यह सड़क, नवनिर्मित मेट्रो के नीचे-नीचे भागतीे हमें चौधरी चरण सिंह हवाई अडडा पहुँचा दी। टैक्सी ड्राइवर को किराया देकर हम टर्मिनल के भीतर पहुँचे। लगेज की बुकिंग करके इंडिगो की उड़ान हेतु सुरक्षा जाँच के बाद हम ऊपर लाउंज में प्लेन के इंतजार में बैठ गयें। निर्धारित समय सुबह 6.25 बजे हमारी उड़ान लखनऊ से दिल्ली के लिए ‘टेक आफ’ (उडान)करने को तैयार है। जहाज के भीतर ‘क्रू मेंबर’ और उडान दल ने अपना और कप्तान का परिचय कराते हुए सुरक्षा और आपात स्थिति के लिए जानकारी दी। और यह बताया कि सभी यात्री अपनी सीट पर लगी सुरक्षा पेटी को बाँध लें प्लेन अब ‘रनवे’ छोड़ उडान भर चुकी है। सभी यात्री शांत और अनिश्चित पडें हैं। प्लेन आगे से उठी है जैसे तिरछे आकाश में घुसती चली जा रही हो। बाहर खिडकी के शीशे सेे झांकने पर जैसे प्लेन पहाड़ों से गुजर रही हो,लेकिन यह आभासी दुनिया है,दरअसल यह बादलों का झुंड है, जो पहाडों की तरह दिख रहा था। थोडी देर में सीधा होने पर, सीट बेल्ट का, इशारा से ‘एयरहोस्टेज’ ने सामान्य स्थिति होने की घोषणा की। खुबसूरत और आकर्षक रूप और सौन्दर्य राशि से लबरेज,ऊँचे आकाश में तैरती जहाज के भीतर यात्रियों के सेवा में लगी इन ‘उड़न परियों’ के चेहरों से जैसे कभी मुस्कान जाती ही नहीं हो। जलपान से लेकर किसी भी मदद के लिए तैयार ये खुबसूरत ‘क्रू-मेंबर’ इस उडान की सबसे महत्वपूर्ण कडी हैं। शायद इंडिगों उडान सेवा भी इस बात को बेहतर समझती है,तभी इन्हे खास तकनीकि और मानवीय संवेदनाओं से प्रशिक्षित किया है। या फिर उनका यह व्यवहार और संवेदना भी, आज के बाजार की जरुरत हो। और उसी जरूरत के मुताबिक ये खुबसूरत बालाएं अपने पेशे में ढ़ली हों। अंत में खुबसूरत और मुस्कान बिखेरते इन चेहरों मे से एक ने यह घोषणा की, कि…‘हम आप के अभारी हैं कि आप ने हमें सेवा का अवसर दियाकृ।’ यह उडान अब दिल्ली में लैंड (उतरना)करने वाली है। कृपया अपने अपने सीटबेल्ट बाँध लें।
जहरीली दिल्ली से स्वच्छ और शांत बागडोगरा तक …
सुबह के कोई साढ़े सात बजे हैं। दिल्ली अपने रौंव में है। उसकी गति प्रगति तो रायसीना से तय होती है। आज कल राजनीति की तरह यहां की प्राकृतिक आबो हवा भी जहरीली हो गयी है। आँड-इवेन फारमूले के लिए केजरीवाल लोगो के अंदर एक सुंदर प्रयोगधर्मी के रूप में आज भी उसी शिद्दत के साथ बैठे हैं। इंदिरा गांधी अंतररष्ट्रीय हवाई अड्डे पर भी दिल्ली की जहरीली हवा और कुहरे का असर स्पष्ट दिख रहा है मेरे साथ दूरदर्शन के पूर्व निदेशक उदयभान मिश्र जी हैं जो टर्मिनल एक पर पहुँचते ही तीसरे सहयात्री एस०एन०सहाय जी से, जो उम्र में उनसे 8-9 बरस छोटे हैं, यह कहना नहीं भूलते कि अगर अरविंद जी नहीं होतें तो हम दोनों बुजुर्गों के लिए यह यात्रा कष्टकारी हो जाती। हाँलाकि मेरे लिए इनका साथ ही प्रेरणादायी है। अस्सी पार श्री मिश्र अपने जवानी के दिनों में एक शख्त प्रशासक रहें हैं। उन्होंने अपने बुलंद इरादों से गोरखपुर में दूरदर्शन और आकाशवाणी केन्द्रों की न केवल स्थापना की बल्कि दोनों को सुचारू रूप से चलाया भी। एक दबंग प्रशासक की छवि के दर्शन उनमें आज भी,सेवानिवृत्ति के इतने साल भी देखा जा सकता है।
हमारी अगली उडान ‘गोएयर’ सेवा से है लेकिन उसकी सेवा अब टर्मिनल एक पर उपलब्ध नहीं है। प्रधानमंत्री जी के उडान के कारण उसकी आफिस और उड़ान दोनों परिवर्तित कर दी गयी है। अब हमें कोई 7-8 किमी दूर ‘गोएयर’ के लिए टर्मिनल दो पर जाना है। लेकिन चिंता की कोई बात नहीं है ‘गोएयर’ की बससेवा अपने यात्रियों के लिए इस टर्मिनल पर लगी है। हम तीनों यात्री ठाठ से बस में बैठ गए और अगले दस मिनट में हम टर्मिनल दो पर थें। यहाँ से हमें आगे की यात्रा यानि बागडोगरा के लिए उड़ान भरनी है। कोई 11.30 बजे से सुरक्षा जाँच के लिए हमें जाना था लेकिन फ्लाइट कोई डेढ़ घंटे विलंब हो गई। श्रीमिश्र जी का प्रस्ताव है कि हम कुछ नाश्ता ले लें लेकिन एक शर्त है पेमेंट मैं करूगा और पसंद अरविंद जी की होगी। हमने एक एक पनीर पराठे और दही लिए साथ में काफी की चुस्कियों ने जैसे रात्रि जागरण की थकान को कम कर दिया। अचानक से लाउंज के अंदर से बागडोगरा की उडान के बोडिंग की घोषणा हुई। हम सभी अगले कुछ पलों में ‘गोएयर’ उड़ान दल के साथ अपने आप को पाया फिर वही हवा में तैरती खुबसूरती ओर उनकी हृदयस्पर्शी मुस्कान…और हवा में खुबसूरती ..। जो हमे दार्जिलिंग और सिक्किम के प्रवेश द्वार ‘बागडोगरा’ तक कब पहुँचा दिया पता ही नहीं चला।

नील की कोठियों और चाय की बागानों में कितनी त्रासद भरी कहानियां जन्मी और उनकी चित्कार निर्वात में विलीन हो गयीं..
दिन के कोई तीन बजे हैं हवा में तैरती जहाज से पश्चिम बंगाल का दार्जिलिंग और सिलीगुडी का विशाल मैदान ऐसे लग रहा है जैसे हरे-हरे पत्थरों की चिप्पियां बडे करीने से काट कर सतह पर चिपका दी गई हों। जहाज के धीरे-धीरे नीचे आने पर स्पष्ट हुआ कि ये तो चाय की बागाने हैं जो परतदार खेतों में लहलहा रही है। नील और चाय की खेती अंग्रेजी राज की याद दिलाती हैं। नील की कोठियों और चाय की बागानों में कितनी त्रासद भरी अंतहीन कहानियां जन्मी और अंग्रेजी बूटों तले उनकी चित्कार निर्वात में विलीन हो गयीं यह देखते ही एक बार फिर आप उन स्याह स्मृतियों में खो जायेंगे। हम अब सिक्किम और दार्जिलिंग के प्रवेश द्वार यानि ‘बागडोगरा’ में हैं, ‘रनवे’ पर फ्लाइट से उतरते ही ऐसा लगा जैसे असीम शांति हो यहां, दिल्ली और लखनऊ के कोलाहल से दूर पूर्वोत्तर भारत का यह क्षेत्र न केवल शांत है बल्कि प्राकृतिक सौन्दर्य ने भीे यहां अपनी छटा बिखेर रखी हो। जिस समय हम यहां प्रकृति के अनुपम सौंदर्य को महसूस कर रहे हैं ठीक इसी समय 1500 किमी दूर देश की राजधानी दिल्ली जहरीली हवा में सांस ले रही है। गुजरात और हिमाचल में राजनीति अपनी सत्ता के लिए झूठ,व्यभिचार और धोखा का मायाजाल बुन रही है। जनता को सुनहरे सपने दिखा कर उसे भरमाने के सर्वोत्तम अदाकारी में लगी है। उत्तर प्रदेश सरकार कमंडल थामें मंदिर-मंदिर पूजा पाठ में लगी है, राजस्थान सरकार छिपाने और गोपनीयता का काला कानून बनाने में लगी है, गुजरात में सीडी लांच कर राजनीति में तूफान मचाया जा रहा है तो छत्तीसगढ़ में ऐसी ही एक सीडी रखने के आरोप में नोएडा के एक वरिष्ठ पत्रकार की गिरफ्तारी की जाती है और भारत के मुख्य धारा की मीडिया, सियासत के इन्ही कर्म कांडों को साधने में सियासदांओं की ही सहायक बनी नजर आती है। उसे पूर्वोत्तर भारत या ग्रामीण भारत की ना तो कभी याद आती है और नहीं ये उसके एजेंडें में ही रहे हैं। भारत के विकास का पैमाना जिस रायसीना की चोटी से तय होता है वह स्वयं जहरीले आबो हवा में कैद है। शायद दिल्ली को सिखने के लिए इधर पूर्वोत्तर भारत की ओर भी रूख करना चाहिए। जीवन यहां कितना सौंदर्य और प्रकृति से घुला मिला है, वह प्रकृति के साथ-साथ कैसे चलता है,वह कितना निस्पृय और निष्कलंक है। इसके रहस्य का उद्घाटन करने तो जरूर आना चाहिए । यहां का आम आदमी कितना मौलिक और ईमानदार है कि उसे दिल्ली की सियासत और उसकी सड़ान से घिन्न आती है। उसे दिल्ली जैसा विकास माडल नहीं चाहिए बल्कि नैसर्गिक सौन्दर्य और हिमाच्छादित चोटियों के बीच प्राकृतिक विकास और जीवन में उत्सव चाहिए। खेतों के क्यारियों के बीच अनिंद्य सौन्दर्य में लिपटी चाय की बागानों में चाय की पत्तियां चुनती खुबसूरती चाहिएं। उसे बलखाती तीस्ता का कल कल निनाद चाहिए।

हम जैसे ही बागडोगरा उतरे हमारे नामों की तख्तियां लिए बीएचइएल के अधिकारी हमारी अगवानी में हवाई अड्डे पर मिले। बुके, स्वागत और फोटो के बाद हम तीनों मैं, डा०एस०एन०सहाय और डा०उदयभान मिश्र जी एक साथ इनोवा गाडी में बैठ गये। साथ मे एक बंगाली अधिकारी हमारे मार्गदर्शन के लिए भी बैठ गए। शायद यह तरपदार साहब हैं। बागडोगरा, नागरिक हवाई अड्डा नहीं है बल्कि यह एक सैन्य हवाई अड्डा है। लेकिन सिक्किम और दार्जिलिंग का प्रवेश द्वार है। अब हमारी गाडी चल दी। थोडी देर चलने के बाद हम एक होटल में पहुँचे। दरअसल यह हमारी पहली लंबी सड़क यात्रा की शुरूआत होने से पूर्व विश्राम और तैयारी की जगह है। पनीर पकौडे और काफी का आर्डर कर हम फ्रेश होने चले गये। थोडी देर में हम चाय की राउंड टेबल पर थें और गर्मागरम पनीर पकौडों की तीन प्लेट हमारे सामने। हल्की भूख तो पहले से ही लगी थी ऊपर से स्वादिष्ट पकौड़े के साथ काफी की चुस्कियां हमारी अब तक की थकान को दूर करने के लिए काफी थी। कोई आधे घंटे के बाद हम अगली यात्रा यानी गंगटोक के लिए चल पड़े। यह एक दुर्गम और पहाड़ी रास्ता है। बलखाती नागिन की तरह पहाड़ों के बीच घुमती सड़क पर फर्टाटेदार रफ्तार पकड़ती इनोवा के चालक को देखकर लगा कोई भोटिया या मंगोलियाई है,जो इन रास्तों पर आंख बंदकर भी चलने का अभ्यस्त है। पहाड़ी रास्तों पर चलना हम मैदानी लोगों के लिए रोमांचकारी और आश्चर्यजनक भरा होता है लेकिन यहां तो यह सब, जीवन की सामान्य दिनचर्या है। ऐसी दिनचर्या कि यहां जीवन या तो ऊपर चढ़ता है या फिर नीचे गहराई में उतरता है। हर 10-20 मीटर सीधे चलने के बाद यह एहसास होने लगता है कि हम चढ़ रहें हैं या फिर उतर रहे हैं। समतल वाली दूरी बहुत कम ही तय करते हैं। शाम के समय सिलीगुडी से होते हुए हम आगे बढ़ रहे थे। चालक ने बताया कि इन्ही रास्तों पर कई जंगली जानवरों से मुलाकात हो जाती है। सड़कों पर हाथी का टहलते हुए मिल जाना सामान्य सी बात है। थोडी देर चलने के बाद हमारे साथी यात्रियों को निद्रा ने अपने आगोश में ले लिया, लेकिन मुझे थकान के बाद भी रास्ते के रोमांच और नये परिवेश के रहस्यों ने आंखे खोले रखने को बाध्य किया। चलते चलते कई जगह ऐसी सकरी सड़क मिल रही है जिससे एक साथ दो वाहन नहीं निकल सकते हैं। सड़क के ठीक नीचे तीस्ता नदी की विशाल जलराशि कल कल करते हमारे साथ चल रही है। इस नदी की जलधारा इतनी धवल और चंचल है मानो कोई सुंदरी अपने अंकपाश में विशाल जलराशि को लिए पहाड़ी नागीन की तरह घुमावदार रास्तों से बढ़ती चली जा रही है। कैसा मनोरम दृश्य है, दोनों ओर गगनचुंबी पहाड़ और बीच घाटी में गहराई तक तीस्ता का अथाह जलधार एक तरफ सांप की तरह सड़क पर रेंगती इनोवा में बैठे बैठे हम आगे सिक्किम की ओर बढ़ रहे थे। दूसरी ओर गहरे घाटी में बहती तीस्ता के पार पहाड़ पर जलती हुई बत्तियां। पहले तो इसे देखकर आश्चर्य हुआ लेकिन बहुत जल्दी ही मेरे संशय को चालक ने दूर कर दिया। दरअसल यह पहाडी गांव हैं जो छोटे छोटे मजरों या पुरवों में ऊचे नीचे बसे है और ये टिमटिमाती हुई बत्तियां व उनकी हल्की रौशनी इन्ही घरों से आ रही है। तीस्ता के साथ चलते चलते हम सिक्किम राज्य के प्रवेश द्वार पर पहुँच गयें। यहां एक विशाल सिक्किम शैली में निर्मित प्रवेशद्वार है जिसपर मोटे अंग्रेजी अक्षरों में लिखा है, वेलकम टु सिक्किम’ यानि ‘आप का सिक्किम में स्वागत है’।

यहां पुलिस का चेकपोस्ट है। जहां पर गाडियों की चेकिंग होती है। यहीं से पश्चिम बंगाल की सरहद को छोड़ सिक्किम राज्य में प्रवेश कर जाते हैं। दरअसल यह एक पर्वतीय राज्य है। सिक्किम की जनसंख्या भारत के राज्यों में न्यूनतम है तथा क्षेत्रफल गोआ के पश्चात न्यूनतम है। सिक्किम नामग्याल राजतन्त्र द्वारा शासित एक स्वतन्त्र राज्य था, परन्तु प्रशासनिक समस्यायों के चलते तथा भारत से विलय के जनमत के कारण 1975 में एक जनमत-संग्रह के अनुसार भारत में विलीन हो गया। उसी जनमत संग्रह के पश्चात राजतन्त्र का अन्त तथा भारतीय संविधान की नियम-प्रणाली के ढाचें में प्रजातन्त्र का उदय हुआ। अंगूठे के आकार का यह राज्य पश्चिम में नेपाल, उत्तर तथा पूर्व में चीनी तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र तथा दक्षिण-पूर्व में भूटान से लगा हुआ है। भारत का पश्चिम बंगाल राज्य इसके दक्षिण में है। अंग्रेजी, नेपाली, लेप्चा, भूटिया, लिंबू तथा हिन्दी आधिकारिक भाषाएँ हैं परन्तु लिखित व्यवहार में अंग्रेजी का ही उपयोग होता है। हिन्दू तथा बज्रयान बौद्ध धर्म सिक्किम के प्रमुख धर्म हैं। गंगटोक राजधानी तथा सबसे बड़ा शहर है।

गंगटोक से लौटकर अरविंद कुमार सिंह

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