तो कांग्रेस की ओवरहालिंग का सबसे मुफीद समय है राहुल युग ?

कांग्रेस: गांधी से गांधी तक

वह पीढ़ी आज भी कांग्रेसी कल्चर में ही सोचती और जीती है। हाँलाकि इस कालखंड में गंगा, यमुना, सतलज, झेलम, साबरमती और ब्रह्मपुत्र में ना जाने कितनी जलराशि बह गयी। उस दौर में पैदा हुए बच्चे आज बुढ़ापे के दिन गिन रहे हैं। देश को सात प्रधानमंत्री देने वाली पार्टी, स्खलन के उस चरम तक पहुँच गयी कि आज सत्तर दशक बाद भी, वह भारतीय राजनीति में अपने को एक संवैधानिक विपक्ष की भूमिका तक में नहीं पाती है, तो सवाल तो उठेंगे

अरविंद कुमार सिंह

यह भारतीय दलीय सियासी इतिहास के एक नये युग की शुरूआत है या देश के सबसे प्राचीनतम दल कांग्रेस के युवराज की बागडोर पर उनकी पकड़ और ताजपोशी का कालखंड, या आजादी के दौर से गांधी की प्रतिछाया में चली कांग्रेस, आज सात दशक बाद फिर गांधी पर ही आकर अटक गई। आखिर 132 बरस पहले (1885) कैलेंडर के आखिरी महिने दिसंबर में बीसी बनर्जी से शुरू हुई कांग्रेस अब ‘राहुल युग’ में प्रवेश कर गयी है। यह वही कांग्रेस है जो भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की आवाज थी, जिसे आजादी के बाद स्वयं महात्मा गांधी ने भंग करने की बात कही थी। यह वही कांग्रेस है, जो अपने स्थापना काल (1885) से गांधी के भारत आगमन (1915)से पूर्व भारतीय समाज के कुलीन वर्गों की प्रतिनिधि थी, जिसकी बागडोर संभालते (1921) ही महात्मा गांधी ने इसे कुलीनों की प्रतिछाया से निकाल, आम भारतीयों की कांग्रेस बना दिया था। उसे सामाजिक परिवर्तन और स्वराज अभियान का वाहक बना दिया था। यह वही कांग्रेस है जिसने स्वतंत्रता संग्राम में राष्ट्र नायकों को पैदा किया। यह वही कांग्रेस है, जिसने देश के हर गांव और मोहल्लों में खादी और गांधी को पहुँचा दिया। यह वही कांग्रेस है जिसने देश में एक ऐसी पीढ़ी तैयार की जो आज भी हर गावं और हर घर में सिर पर गांधी टोपी, शरीर पर खादी और हाथ में छाता थामे, घर के कोने में सिसकते नजर आ जायेंगे।
दरअसल वह पीढ़ी आज भी कांग्रेसी कल्चर में ही सोचती और जीती है। हाँलाकि इस कालखंड में गंगा, यमुना, सतलज, झेलम, साबरमती और ब्रह्मपुत्र में ना जाने कितनी जलराशि बह गयी। उस दौर में पैदा हुए बच्चे आज बुढ़ापे के दिन गिन रहे हैं। देश को सात प्रधानमंत्री देने वाली पार्टी, स्खलन के उस चरम तक पहुँच गयी कि आज सत्तर दशक बाद भी, वह भारतीय राजनीति में अपने को एक संवैधानिक विपक्ष की भूमिका तक में नहीं पाती है, तो सवाल तो उठेंगे। सवाल तो तब भी उठे थें जब महात्मा ने कुलीन कांग्रेसी कल्चर को समाप्त कर उसे आम हिन्दुस्तानियों की कांग्रेस बना दिया था और उसे सीधे स्वतंत्रता संग्राम की रणभूमि में उतार दिया था। और सवाल आज 96 बरस बाद भी उठेंगे जब राष्ट्रपिता महात्मा गांधी (1921) के हाथों पोषित कांग्रेस, आज राहुल गांधी(2017) के हाथों चली गई। और दूसरी तरफ भारतीय लोकतंत्र में गोधरा के खलनायक की छवि के बावजूद नरेंद्र मोदी हिंदुस्तान के दिलों के नायक बने हुएं हैं और उनके भारत विजय के अभियानों को रोक पाने की क्षमता शायद आज के ‘बटोर के विपक्ष’ में भी नहीं दिखती है। तो सवाल तो उठेंगे। कल, आज और आने वाले कल में कांग्रेस का स्वरूप क्या होगा, क्या महात्मा गांधी से पूर्व की कांग्रेस ही, ‘राहुल युग’ की कांग्रेस होगी या फिर कुलीन कांग्रेसी कल्चर से निकाल वह उसे सड़क और संघर्ष की कांग्रेस बना पायेंगे। सत्ता की कांग्रेस और वातानुकूलित कमरों की कांग्रेस को जमीन की कांग्रेस बना, जनता से सीधे जोड़ पायेंगे। या फिर चरणा वंदना और गणेशपरिक्रमा वाली कांग्रेस ही रह जायेगी। आज यदि भाजपा के लिए स्वर्णकाल है और वह केंद्र सहित 18 राज्यों को भगवा रंग में रंगने में सफल है तो ठीक यही समय, कांग्रेस के संगठनात्मक तैयारियों और जन नेतृत्व को उभारने और उसे अपने से जोड़ने के लिए भी स्वर्णयुग है। यह इतना मुफीद समय है कि आज, जन असंतोष और जन आकांक्षाएं ना केवल चोटिल हैं बल्कि धोखे की शिकार भी हुई हैं। समाज के कई स्तरों पर असंतोष और सांप्रदायिकता का नंगा नाच हो रहा है। विकास,रोजगार और रोटी के सवाल पर धर्म और अधर्म की सियासत हो रही है। देशभक्त और देशद्रोह के खांचे में समाज को बाँटने का खेल और इस खेल में अपना सियासी फायदा देखा जा रहा है। सच तो यह है कि जिस तरह भारतीय लोकतंत्र में मोदी की आमद हुई और उन्होंने हिंदुस्तान को जो सपने दिखाये, लोगो की भावनाओं को भड़का कर उसे अपने पक्ष में किया, आज साढ़े तीन साल बाद जब उनकी उम्मीदों पर तुसारपात होता है और जनता सवाल खड़ा करती है तो मोदी सरकार जनता को जवाब न देकर उसे दूसरे मुद्दे पकड़ा देती है। जुमले इतने आत्मविश्वास से उछाले जातें हैं कि वह सच होने के भ्रम पैदा करते हैं। ऊपर से नोटबंदी और जीएसटी की मार ने भीतर ही भीतर एक असंतोष का परिवेश बना दिया है। गुजरात चुनाव में 22 साल के विकास के दावे के बाद भी, यह चुनाव ना तो गुजरात माॅडल पर लड़ा जा रहा है और नहीं मोदी जी के कथित विकास पर, बल्कि हिन्दू मुस्लिम,मन्दिर-मस्जिद और पाकिस्तान को मुद्दा बना कर राजनीतिक स्खलन की चरमसीमा पार गयी। अब यदि ऐसे परिवेश का फायदा उठाना है तो कांग्रेसी कल्चर और संगठन में आमूल परिवर्तन करना ही होगा। वातानुकूलित कमरों और गणेश परिक्रमा की संस्कृति से कांग्रेस को निकाल जनता के बीच लाना होगा। कांग्रेस को भीतर और बाहर दोनों ओर से ओवरहालिंग करनी होगी। कांग्रेस के अंदर पनप रहे कई कांग्रेस को खत्म कर, उसे आंदोलन की कांग्रेस बनानी होगी। इंदिरा कांग्रेस और राजीव कांग्रेस के जमाने के चुक चुके मोहरों को स्थायी आराम देकर हर राज्य और जनपद में अपने हार्दिक और जिग्नेश पैदा करने होगें। संघर्ष और जन आंदोलन से निकले नेतृत्व को प्रोत्साहित करने होंगे। एक बार पूरी कांग्रेस की ओवरहालिंग करनी पड़ेगी और संयोग से वर्तमान जलवायु उनके पक्ष में है, अन्यथा गांधी(बापू नहीं)के बाद..गांधी और…इस बार एक और गांधी से कांग्रेस का कोई खास भला नहीं हो सकता है।

print

Post Author:

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *