बिसराम के बिरहे और भाष्यकार मुखराम की लोकदृष्टि

बिरह और वीरता भोजपुर के निवासियों के अभिन्न अंग हैं। शताब्दियों से इस अँचल की वीरप्रसू धरित्री अपने क्रोड़ में वीरता और विपन्नताओं को छिपाए हुए सिसक रही है। वीरता और प्रेम का अन्योन्याश्रम संबंध होता है। वीर अपने अवकाश के क्षणों में प्रेम की शीतल छाया में विश्राम करता है। प्रेमाश्रुओं का पानी तलवार की धार तेज करने में सर्वदा सहायक रहा है। किंतु भोजपुर के रणबाँकुरों के जीवन में प्रेम की मादकता के लिए स्थान नहीं रहा, वे तो अपनी प्रेमिकाओं की स्मृतियों को सँजोए हुए कर्मक्षेत्र में निरंतर आगे बढ़ते रहें हैं। इस मार्ग का संबल रहा है, उनकी प्रेमिकाओं के गीले नैनों का मूक उन्मेष, वृद्धा माताओं का करूणासिक्त आशीर्वाद और बहन बेटियों की स्नेहिल किंतु साथ ही व्यथा से पिरोई हुई कल्याण की आकांक्षा।

-अरविंद कुमार सिंह
मुखराम सिंह एक कुशल शिक्षक थें, प्रखर पत्रकार थें। यह सभी जानते हैं लेकिन वह एक आंचलिक चितेरा और लोक साहित्यकार भी थें, बहुत कम लोग ही जानते होंगे। उनका साहित्यकार बहुत ही संवेदनशील है और ‘जन’ के प्रति जागरूक भी हैं। वह कुलीन वर्ग के क़लमकार नहीं, बल्कि लोक या जन की अभिव्यक्ति के पैरोकार हैं।
लोक कवि बिसराम के बिरहे उन्हें कंठस्थ थे और वे उन्हें मंचों से सुनाया भी करते थें। अर्थात् कवि हृदय मुखराम के व्यक्तित्व का भावुक पक्ष उन्हें श्रृंगार प्रेमी भी बनाता है। स्वयं ‘आज’ हिंदी दैनिक के सहायक संपादक ईश्वरचंद्र सिंहा उनके कविहृदय के बारे में बताते हैं,-‘बात संभवतः1960 की है। आजमगढ़ के जिला संवाददाता संघ के वार्षिकोत्सव में भाग लेने वहां गया हुआ था। उस अवसर पर आयोजित कवि सम्मेलन में जब सब कवि अपनी रचना सुना चुके, श्री दानबहादुर सिंह सूँड ने घोषणा की कि अब मुखराम सिंह बिसराम के बिरहे सुनाएंगे।’
श्री मुखराम सिंह से पुराना संबंध होते हुए भी मैंने कभी उन्हे बिरहा गाते नहीं देखा था। पहले तो मैंने समझा की सूँड जी ने विनोद किया है, किंतु मैं आश्चर्य में पड़ गया जब मुखराम सिंह जी माईक्रोफोन के पास पहुँच गयें। मुखराम सिंह ने कुल दो तीन बिरहें जो उन्हें याद थे, गाकर सुनाएं। उन बिरहों की एक एक पंक्तियाँ सीधे हृदय को छू रही थीं। वे इतनी मार्मिक थीं कि वहां उपस्थित अनेक लोगों की आँखे भर आयीं। ये बिरहें पहले पहल सुनने को मिले तो अपने आँसुओं को छिपाने के लिए रूमाल का सहारा लेना पडा।
ईश्वरचंद्र सिंहा अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहते हैं कि,-‘कवि सम्मेलन के बाद ही मैंने श्री मुखराम सिंह से उन बिरहों के संबंध में पूछ-ताछ की, उन्होंने बताया कि वे बिसराम के कुल बाइस बिरहों का संग्रह कर पाये थें, जो कही खो गयें हैं। ये बिरहे लापता हो जाने के बाद भी डा.परमेश्वरी लाल गुप्त और श्री मुखराम सिंह द्वारा विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में लिखे गये लेखों में सुरक्षित थें। मेरे अनुरोध पर श्री मुखराम सिंह ने उन्हें साज सँवार कर वर्तमान रूप में प्रस्तुत किया।’
मुखराम सिंह की इस श्रम साधना और लोक के प्रति लगाव को देखते हुए स्वयं राहुल सांकृत्यायन ने भी उनकी प्रशंसा की थी।
मुखराम की भाषा और भाव की अपनी विशिष्ट शैली है,जो सीधे हृदय की अतल गहराईयों तक उतर जाती है। कम शब्दों में अधिक मारक क्षमता वाले शब्दों का चयन और उसका जादुई सा प्रकटीकरण उनकी पत्रकारिता की विशिष्ट शैली है। उनकी भाषा में गजब का प्रवाह है। वे समूची भोजपुरी पट्टी को व्यापक रूप से ‘भोजपुर’ के रूप में संबोधित करते हैं। उनके अनुसार,-‘बिरह और वीरता भोजपुर के निवासियों के अभिन्न अंग हैं। शताब्दियों से इस अँचल की वीरप्रसू धरित्री अपने क्रोड़ में वीरता और विपन्नताओं को छिपाए हुए सिसक रही है। वीरता और प्रेम का अन्योन्याश्रम संबंध होता है। वीर अपने अवकाश के क्षणों में प्रेम की शीतल छाया में विश्राम करता है। प्रेमाश्रुओं का पानी तलवार की धार तेज करने में सर्वदा सहायक रहा है। किंतु भोजपुर के रणबाँकुरों के जीवन में प्रेम की मादकता के लिए स्थान नहीं रहा, वे तो अपनी प्रेमिकाओं की स्मृतियों को सँजोए हुए कर्मक्षेत्र में निरंतर आगे बढ़ते रहें हैं। इस मार्ग का संबल रहा है, उनकी प्रेमिकाओं के गीले नैनों का मूक उन्मेष, वृद्धा माताओं का करूणासिक्त आशीर्वाद और बहन बेटियों की स्नेहिल किंतु साथ ही व्यथा से पिरोई हुई कल्याण की आकांक्षा।’

मुखराम सिंह हिंदी पट्टी के विरह वेदना के पीछे का कारण यहां का अभावग्रस्त जीवन और संसाधनों की कमी मानते हैं। यहां प्रतिभा तो हर खित्ते में है लेकिन संसाधनों ने उन्हे तोड़ कर रख दिया है। लिहाजा यहां पलायन की एक पूरी की पूरी परंपरा रही है। स्वयं मुखराम के शब्दों में,-‘इस क्षेत्र के लक्ष लक्ष निवासियों ने उस युग में अपने पेट की ज्वाला को शांत करने के लिए दक्षिणी अफ्रिका, मारिशस, ब्रिटिश गायना, फिजी, ब्रह्मा, हिंदेशिया और मलाया में गिरमिटिया मजदूरों के रूप में जाकर, इन्हे आबाद किया जबकि शेष भारत में विदेश की यात्रा करना धर्म को तिलांजलि देने का कारण माना जाता था। आज भी रोटी की खोज में बाहर जाने का वह क्रम भोजपुर में निरंतर जारी है। आज भी गांवों में नित्य सायंकाल और प्रातः काल विरह का मेला लगा करता है। भोजपुर के गाँवों का वातावरण आज भी नारीकंठ से निकले करूणस्वर से प्रतिध्वनित होता रहता है। अब भी भोजपुर की माताएं कौआ मामा से अपने लाड़लों के घर आने की अवधि पूछती रहती हैं। अब भी भोजपुर की ललनायें सँझवाती का दिया जलाकर तुलसी के चैरे पर प्रिय के कल्याण की याचना करती रहती हैं। अब भी भोजपुर के बूढ़े किसान और मजदूर आकाश की ओर अपनी सूनी आँखे उठाए हुए कुल देवता से अपने प्रवासी पुत्रों के सुरक्षित रहने की प्रार्थना करते हैं।
यह मुखराम सिंह ही हैं जिन्हें अपने लोक की इतनी चिंता और लगाव है। उसकी संस्कृति में घुल मिल जाने की तड़प है। आजमगढ़ के भोजपुरी साहित्य, विशेष कर श्रृंगार के विरह पक्ष की तो यह ऊर्वर माटी रही है।यहाँ आज से लगभग ढाई सौ साल पहले विरह के गीत मिले हैं। मुखराम सिंह के अनुसार,-आज से लगभग दो सौ वर्ष पूर्व(1965में)आजमगढ़ के नरेश महावत खाँ के समय में रज्जब नामक मुसलमान बिरहियाँ हुए थे। जिन्होंने ‘सुग्गा सनेस’ नामक खंडकाव्य बनाया था। इनका यह खंडकाव्य एक प्रकार का प्रेमाख्यान काव्य था। लिखित न होने के कारण यह काव्य कवि की शिष्य परंपरा में निरंतर मौखिक रूप में चलता रहा।

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