मैं व्यंग्य नहीं लिखता/अमन कुमार त्यागी

मित्रों! मैं मन की बात कह रहा हूँ। मुझे व्यंग्य लिखना नहीं आता है। प्रयास करता हूँ लिखने का मगर सोचता रहता हूँ ‘क्या लिखूँ’ और मेरी ‘सोच के दायरे’ बढ़ते जाते हैं। मैं इतना अधिक सोच डालता हूँ कि कुछ भी लिखना तुच्छ ही जान पड़ता है। व्यंग्य ही क्या कुछ भी नहीं लिख पाता हूँ, सोचता हूँ कि आखिर लिखने से समय खराब करने के अतिरिक्त क्या होने वाला है। कुछ विद्वान लेखन को पूजा या तपस्या मानते हैं मगर मैं इसे समय काटने का सबसे अच्छा साधन मानता हूँ। एक लेखक से अधिक समय भला होगा भी किसके पास? इतना समय तो अब पाठक के पास भी नहीं है कि वह किताबों में दिमाग खपाता रहे। महीनों या सालों में तैयार की गई किताब को पाठक मिनटों या फिर घंटों में समाप्त कर डालता है। यही नहीं वह लेखक को प्रमाणपत्र भी इसी अवधी में दे देता है। लिखने के लिए समय ही नहीं बल्कि विषय भी आवश्यक होता है, व्यंग्य लिखने का विषय क्या हो? यह सवाल व्यंग्य सा नहीं लगता है। जिज्ञासु के लिए हर बात सवाल की तरह होती है, जितने भी व्यंग्य पढ़े हैं उनसे तो यही लगता है कि व्यंग्यकार किसी जवाब से संतुष्ट नहीं होता है। हो भी क्यों? संतुष्टि आदमी की तरक्की को रोक देती है फिर व्यंग्यकार की तो औकात ही क्या है? यदि व्यंग्यकार संतुष्ट हो गया तो अखबार, अखबारिकाएं, किताब और किताबिकाएं छपना बंद हो जाएंगी। और साहित्य के लिए यह अच्छे संकेत नहीं होंगे।

एक दिन मैंने भी व्यंग्य लिखने का मन बनाया। विषय था डाॅक्टर साहब। कुछ अधिक जानकारी के लिए मैं डाक्टर साहब के पास पहुंचा। किंतु यह क्या? उन्हें तेज बुखार था और पेट दर्द से कराह रहे थे। उनका आठवीं पास कंपाउंडर क्लिनिक पर दवाई दे रहा था। मन तो हुआ कि उनकी इस स्थिति पर ही कुछ लिखूं मगर अधिक सोचने के कारण लिख न सका। अब मास्टर साहब शीर्षक पर लिखने का मन हुआ। एक स्कूल में गया तो पता चला कि वह दो दिन से छुट्टी पर गए हुए हैं, उनकी एप्लीकेशन चपरासी की जेब में है और उसे सख्त निर्देश हैं कि वह उसे तभी रजिस्टर में रखे जब कोई अधिकारी वहां आए। उनका यह गणित मेरी अकल से बड़ा था, समझ नहीं पाया तो वापिस चला आया, सोचा सड़क पर ही कोई व्यंग्य लिख डालूं। सड़क मुख्यमंत्री जी का बड़ा मुद्दा था। उन्होंने सड़क से गड्ढे गायब करने के लिए अपने अधिकारियों को सख्त ताकीद कर दी थी। मुख्य मार्ग पर पहुँचा मन प्रसन्न हो गया। अब वहां सड़क थी ही नहीं दूर तक झीलनुमा गड्ढे नजर आ रहे थे और गड्ढों पर मैं कुछ लिखना नहीं चाहता था। किस पर लिखूं? सवाल ज्यों का त्यों मेरे सामने था।

एडिटर की तो बात ही छोड़िए। उससे अच्छा व्यंग्य तो आज के भारत में दूसरा कोई हो ही नहीं सकता। उसकी बुरी हालत है। यहाँ तक कि मुझ जैसे कमजोर दिल वाले को भी उस पर रहम आ रहा है। यह भी समझ सकते हैं कि यदि मैंने एडिटर पर व्यंग्य लिखा तो छोगा कौन? छोड़िए जी कोई काम का विषय तलाशते हैं। नेता जी पर इतना लिखा पढ़ा गया है कि मन ही नहीं करता मगर फिर भी इस विषय में कुछ बात तो है कि हर कोई नेता जी पर पढ़ना चाहता है। इसलिए हर लेखक नेता जी पर कुछ न कुछ लिखता ही है। नेता जी पर लिखे बिना कोई लेखक बन भी कैसे सकता है। एक नेता जी को अच्छी तरह जानता हूँ, नेतागिरी के लिए उनके हावभाव और कृत्यों पर नजर रखना आवश्यक था। पूरे एक महीना प्रयत्न करने के बावजूद मैं सफल नहीं हो सका तो इसका रहस्य नेता जी से जानना चाहा। नेता जी ने मुस्कुराते हुए बताया- यही रहस्य तो है जिसकी वजह से यह कारोबार नवजवान बना रहता है। खुदा कसम व्यंग्य लिखने का स्वप्न टूटता नजर आने लगा। खुदा से बात समझ में आने लगी थी। खुदा या भगवान के नाम पर हमारा समाज कितना बंटा हुआ है। कितने धर्म हो गए हैं, यहां तक कि धर्म अब सड़क पर भांगड़ा करने लगा है। यह विषय चिंता का है, मुझे लगा कि व्यंग्य के लिए कोई अन्य विषय होना चाहिए। कितने मौलवी और बापू हैं? जिन्हें व्यंग्य का विषय बनाया जा सकता है लेकिन उनसे दुश्मनी कौन मोल ले? डर लगता है बाबाओं और मौलवियों से क्योंकि उन्हें तो खुदा या भगवान ने कुछ भी करने की खुली छूट दे रखी है। एक हम ही हैं कि कुछ लिखने की छूट नहीं है। सरकार के खिलाफ लिखो तो देशद्रोही, पक्ष में लिखो तो चमचे। व्यंग्यकारों ने दूसरों की पत्नियों को निशाना बनाते हुए अपनी पत्नी को भी विषय बनाया है। इससे समझ में आता है कि हर कमजोर आदमी कम से कम अपनी पत्नी पर तो राज कर ही सकता है किंतु अब ऐसा नहीं है। अब पत्नियां भी व्यंग्य करने लगी हैं। रात और दिन पर भी कोई अच्छी सी बात नहीं निकलती है। रात को होने वाले काम अक्सर दिन में होने लगे हैं और दिन में किए जाने वाले कामों के लिए रात को समय निकालना पड़ता है। जमीन और आसमां को व्यंग्य का विषय बनाना महान मूर्खता लगती है।

धत्ततेरे कि। मैं व्यंग्य क्यों नहीं लिख पा रहा हूँ यह बात मेरी समझ में अब आ रही है। सुबह से बीस चाय पी ली और दस बार शौचालय हो आया हूँ। पेट खराब है इसलिए नहीं, बल्कि इसलिए कि तमाम लेखकों का मानना है शोचालय में अच्छी तरह सोचा जाता है। चलो अच्छा भी है वाचनालय तो अब रहे भी नहीं, जहां बैठकर कुछ पढ़ा जा सके। चलो एक बार फिर प्रयास करता हूँ। अबकी बार चुनाव को विषय बनाता हूँ। किसी मित्र ने चुनाव का बड़ा अच्छा सा अर्थ बताया था। जो पहले समझ में नहीं आया परंतु अब आ रहा है। दरअसल आव एक प्रकार की बीमारी होती है जो मीठे मीठे दर्द के साथ चूती है। मन करता है कि बस बैठे ही रहो। बाहर से दरवाजा खटखटाया जाता है- बहुत देर कर दी, क्या बात है? तब जवाब देने के बजाए मुँह से जो आवाज निकलती है वह किसी चुनाव की हुंकार सी ही होती है। वैसे मुझे चुनाव पर भी नहीं लिखना चाहिए। आम आदमी को चुनाव में ही तो अपने बल की याद आती है और चुनाव का दिन आते आते अपनी मर्जी से मतदान करना भूल भी जाता है। खैर छोड़िए। मेरे बस में लिखना नहीं है। मैं लिख नहीं पाऊँगा, जानता हूँ आप भी मेरे लिखे को लीलावती कलावती की कहानी की तरह समझ नहीं पाएंगे।

print

Post Author:

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *