आज कुछ लिखने का मूड है /अमन कुमार ‘त्यागी’

मित्रों मूड भी अजीब चीज होती है। कब किस चीज के लिए हो जाए पता नहीं। शुक्र है कि आज मेरा मूड कुछ लिखने का है, मगर क्या? यह शोचनीय है। कुछ बड़े लेखकों की तरह घंटे भर शौचालय में भी बैठ आया मगर समझ में ही नहीं आया, क्या लिखू? एक दो मित्रों से अपनी परेशानी बताते हुए विषय सुझाने का आग्रह किया मगर सब व्यर्थ। अब मूड है तो है, कब बदल जाए कहा नहीं जा सकता? मूड में रहकर जितना लिखा जाए उससे अच्छी क्या बात है। बहुत से बड़े लेखकों को यह बात कहते सुना है कि मूड में ही लिखा जाता है। यह बात उनके श्रीमुख से कभी नहीं सुनी कि मूड होने पर विषय कहाँ से लाया जाए? या फिर विषय तलाशने पर मूड बनाया जाए। ओह… मैं भूल गया मूड बनाने की बात मुझे नहीं सोचनी चाहिए थी। मैं न तो दारू ही पीता हूँ और न ही किसी धूम्रपान के चक्कर में पड़ा हूँ। ले देकर एक अदद बीवी है जिससे बता सकता हूँ कि आज मूड बन रहा है। बीवी की बात पर ध्यान आया कि कितने ही लेखक ऐसे हुए हैं विशेषकर व्यंग्य के लेखक, जिन्होंने अपनी बात ‘श्रीमती जी’ से शुरू की और श्रीमती जी पर ही समाप्त भी। लेकिन क्या श्रीमती जी को सिर्फ व्यंग्य की विषयवस्तु बनाए रखना उचित है? नहीं ऐसा ठीक नहीं है। व्यंग्य तो व्यंग्य की ही तरह होना चाहिए। व्यंग्य का विषय भी व्यंग्य सा लगना चाहिए।
भाइयो और बहनो! मूड खराब नहीं होना चाहिए। अब आप ही बताएं, होना चाहिए कि नहीं होना चाहिए? ठीक कहा, नहीं होना चाहिए। मन की बात तो होनी ही चाहिए, वह चाहे हवा में हो या फिर बंद कमरे में। मन होगा तभी विचार आएंगे और जब विचार आएंगे तभी कुछ लेखन हो पाएगा। यह गलती मुझसे भी हो गई। मूड बना और विचारों को दावत दे दी। विचार क्या आ रहे हैं मानों किसी डाम का फाटक तोड़कर प्रलय करता हुआ अथाह जल कल-कल करता हुआ चला आ रहा हो। और मुझे हर विचार किसी भूखे शेर का खुला मुँह सा लग रहा है। गोया मुझे खा जाना चाहता हो। विचारों की भयानकता भी वही समझ सकता है जिसके पास विचार दौड़कर आते हों, नहीं तो प्रायः यही पाया गया है कि विचार आयातित किए जाते हैं। लेनिन, माक्र्स, अरस्तु, प्लेटो न जाने कितने ही विचारों का आयात किया गया है। जबकि महावीर, बुद्ध, विवेकानंद, दयानंद, गांधी, टैगोर आदि न जाने कितने ही विचार यहाँ भी थे जिन्हें प्रासंगिक कहा जा सकता है मगर आयातित विचारों की बात ही कुछ और है। खूबसूरत पैकिंग इन्हें और मनभावन बना देती है।
मित्रों विचार उलझाकर रख देते हैं। जैसे मैं उलझ गया हूँ और मेरी उलझन में आप भी उलझ कर रह गए हैं। अभी तक आपको मेरे साथ कुछ भी नहीं मिला है और आगे भी कुछ नहीं मिलेगा, किंतु यह बात भी पक्की है कि जब तक मैं उलझा रहूंगा आप भी उलझे रहेंगे। जानते हैं क्यों? क्योंकि हमें कुछ लिखने के लिए विषय जो तलाशना हैै, आपकी मदद के बिना यह संभव भी तो नहीं है। मदद पर याद आ रहा है ‘हिम्मते मर्दां मदद ए खुदा’, क्या बात है, भला हिम्मत कैसे छोड़ी जा सकती है। जब तक मूड है हिम्मत करते रहना चाहिए। और फिर विषय के लिए इधर-उधर अधिक भटकने की आवश्यकता भी क्या है, हमारे चारो और विषय ही विषय हैं। चाय, पानी, खाना, गाना, रोना, हंसना आदि ही को विषय बनाया जा सकता है।
चाय-पानी के चक्कर में भूल गए खाना।/क्या मेरा रोना-हंसना क्या मेरा गाना।।
अरे यह क्या? ये सारे विचार दो पंक्तियों में ही समा गए। जैसे अमीर खुसरो ने कमाल दिखा दिया था और चरखा, कुत्ता, खीर, ढोल को दो पंक्तियों में समेट कर रख दिया था। जानता हूँ कुछ विद्वानों को इन दोनों पंक्तियों में वैट हटा, जीएसटी लगा दिख रहा होगा। कुछ को काला धन और कुछ को सफेद धन दिखाई दे रहा होगा। कुछ को मुद्रा योजना तो कुछ को मेक इन इंडिया नजर आ रहा होगा। एक मैं ही हूँ जिसे कुछ भी नजर नहीं आ रहा है? अब तो डर रहा हूँ कि कहीं मूड चेंज न हो जाए। अजी हो क्या जाए, लगता है होने लगा है, तभी तो व्यंग्य लेखन से कविकर्म पर उतारु हो गया है। प्रार्थना करता हूँ कि यह मूड अभी स्थिर रहे और कुछ ढंग का लेखन हो जाए। ऐसा कि जिससे कोई पुरस्कार या सम्मान झोली में आ गिरे। कोई बता रहा था कि सम्मान के लिए भी आवेदन करना होता है। समझ में नहीं आता कि जिस सम्मान को पाने के लिए आवेदन और जोड़-तोड़ किए उसे वापिस करने से क्या हासिल हो सकता है? क्या यही त्याग और राष्ट्रभक्ति है? मैं एक ऐसे समाजसेवी को जानता हूँ जो समाज के लिए जब खर्च करता है तो फोटो खिंचवाता है और अखबारों में समाचार छपवता है मगर जब कमाता है तो ….. बस वही जाने क्या करता है, कोई नंबर देना अच्छा नहीं लग रहा है। मूड विचलित न हो जाए और विचार खो न जाए। खोएंगे तो तब, जब आएंगे। अभी तो आए ही नहीं हैं और हम खोने लगे हैं। मेरे साथ आप भी। आप भी सोच रहे होंगे कि आखिर यह लेखक लिखना क्या चाहता है। है न यह भी व्यंग्य की बात कि जिसने अभी कुछ लिखा ही नहीं आप उसे भी लेखक समझने लगे हैं और बिना लिखे को पढते-पढते पाठक बन गए हैं। अब आप मेरी बात पर असहमति जताते हुए कह सकते हैं कि यह कैसे संभव है?
खैर छोड़िए। न तो मेरे पास लिखने के लिए कोई विचार है और न ही आपके पास पढ़ने के लिए। तभी तो मैं लेखक बनने का दंभ भर रहा हूँ और आप पाठक बनने का। कैसा साथ है ये अलेखक और अपाठक का? लगता है हम दोनों ने एडिसन की तरह नई खोज कर डाली है। एक मित्र बता रहे थे जो व्यक्ति अपने जीवन में कुछ नहीं कर पाता, वही नई खोज कर पाता है। हमने भी अपने जीवन में कुछ नहीं लिखा इसलिए अलेखक के रूप में ही सही आप अपाठक बन मेरे अलेखन को पढ रहे हैं। यदि धोखे से कुछ आपकी समझ में आ जाए तो मुझे भी बताइए। आप समझने का प्रयास कीजिए, मेरा मानना है कि जब तक आप इस कशमकश से बाहर आएंगे तब तक हमारे मस्तिष्क में कोई न कोई विचार आ ही जाएगा। जिनका आपको भी बेसबरी से इंतजार है।
-अमन कुमार ‘त्यागी’
द्वारा- परिलेख प्रकाशन, निकट साहू जैन काॅलेज, कोतवाली मार्ग, नजीबाबाद-246763 बिजनौर (उप्र), मौ. 9897742814, 9410890390

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