अच्छा बताओ क्या लिखूं?/अमन कुमार त्यागी

यह राजनीति कम ही लोगों की समझ में आती है। जिनकी समझ में आती है वही तो गाड़ी में बैठते हैं और जिनकी समझ में नहीं आती उनके पैर गाड़ी के पहिए के नीचे दबकर टूट जाते हैं। लेकिन नेता जी की बात उस आदमी की समझ में आ जाती है और वह घर में ऐसा छुपकर बैठा जाता है कि मतदान वाले दिन भी घर से नहीं निकल पाता। परिणामस्वरूप नेता जी चुनाव हार जाते हैं। चुनाव हारने के कारणों को जानने के लिए मंथन चलता है, विपक्ष की कार्यशैली पर चर्चा होती है, जिन लोगों ने दूसरे दलों को मतदान किया, उनका पता लगाया जाता है और उन्हें गद्दार की उपाधि दे दी जाती है, मगर इस चर्चा में वह डरा हुआ मतदाता नहीं होता जिसकी औकात गाड़ी के पहिए के नीचे दबकर मर जाने की होती है।

ब आप ही बताइए क्या लिखूं? कई मित्रों के सुझाव आए हैं और सभी के अलग-अलग विषय हैं। लेखक एक और विषय अनेक, यह कैसे संभव हो सकता है? सारे मंत्रालय तो प्रधानमंत्री भी नहीं संभाल पाता। एक प्रोफेसर भी एक ही विषय को पढ़ाता है। एक व्यापारी भी एक समय में एक ही व्यापार कर पाता है, गति भी एक बार में एक ही दिशा में होती है और राजनीतिक पार्टियां भी एक बार में एक ही निशाना साधती प्रतीत होती हैं, कुर्सी प्राप्त करने का लक्ष्य उनके लिए परम लक्ष्य होता है और जब सिंहासन पर विराजमान होती है तो वही सब तिनके, जिन्हें जोड़-जोड़कर कुर्सी प्राप्त की है, अति तुच्छ जान पड़ने लगते हैं। उनके लिए नए-नए कानून और सिद्धांत बनने लगते हैं और महान कार्य यह होता है कि विरोधी अपने से लगने लगते हैं, जबकि अपनों को इसलिए बेगाना कर दिया जाता है कि वह कहाँ जाने वाले हैं? सच बात भी है, अपने कहीं नहीं जाते, बस घर में छुपकर बैठ जाते हैं और परिणाम फूलपुरिया सा होता है।
मित्रों! मैं राजनीति पर नहीं लिखना चाहता। राजनीति मेरे स्वभाव में भी नहीं है और राजनीति का मैं खास जानकार भी नहीं हूँ। गलती से कुछ उलट-पुलट लिख दिया तो खामखा लोग नाराज़ हो जाएंगे और मैं किसी की नाराजगी मोल नहीं लेना चाहता हूँ। राजनीति मेरी रोजी-रोटी का साधन भी नहीं है और मेरे लिए संपर्क का माध्यम भी नहीं। मैं तो अदना सा वह लेखक हूँ जिसने अभी तक कुछ लिखा ही नहीं है। अभी तो लिखने के बारे में सोच रहा हूँ, जान रहा हूँ और कलम पकड़ना सीख रहा हूँ। अब यह मत कहना कि मैं झूठ बोल रहा हूँ। देखो यह इल्जाम मत देना, मैं कोई राजनीतिज्ञ नहीं हूँ कि कल कुछ कहा और आज कुछ कह दिया। न ही मेरी स्थिति ऐसी है कि मैं तुरंत पार्टी की तरह अपना विषय ही बदल दूँ। राजनीति का गणित ही ऐसा है कि किसी भी आम आदमी की समझ में नहीं आ पाता कि सुबह नेता जी जिस दल को कोस रहे थे उसी में शाम को उनका प्रवेश कैसे हो गया है? और अपने, जिनमें कोई सिद्धांत बचा होता है, वह जरा सी आवाज उठाते हैं तो अनुशासनहीनता के नाम पर उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है।
अजब तमाशा है। यहाँ कौन अपना है और कौन पराया? किसी का कब दम घुटने लगे और कौन कब घर वापसी कर जाए कहा नहीं जा सकता? बड़े-बड़े साहित्यकारों को विधाओं में प्रयोग करने की बात सुनी और पढ़ी है परंतु जब कोई नेता जी प्रयोग करते हैं तो हाहाकार मच जाता है। अब यह बात कोई क्यों नहीं समझता कि राजनीति एक शास्त्र है? यह बात अलग है कि यहाँ बिना अध्ययन के लोग एक्सपर्ट हो जाते हैं। राजनीतिशास्त्र के अध्ययन की बात छोड़ो, राजनीति में प्रवेश से पहले कोई संविधान पढ़ना भी उचित नहीं समझता है। संविधान छोड़ो कई अनपढ़ भी भारतीय राजनीति में धुरंधर कहे गए हैं। हमारे राजनेता नए-नए कानून तो बनाते हैं मगर स्कूलों में भरतीय संविधान या दंड संहिता पढ़ाने की कोई व्यवस्था नहीं है। जिससे आम आदमी को पता ही नहीं चल पाता कि क्या उचित है और क्या अनुचित? उस पर तुर्रा ये कि संविधान का पालन करो, जो नहीं करता वो अपराधी कहलाएगा।
हद हो गई है। संविधान न स्वयं पढ़ते हैं और न ही आने वाली पीढ़ी को पढने देते हैं। कई सांसद गुस्से में कहते सुने गए हैं, हम कानून का पालन नहीं बल्कि कानून बनाते हैं। अब कानून के बारे में विद्युत की तरह कोई नहीं कहता कि यह अपने बनाने वाले को भी नहीं छोड़ता। अक्सर कानून को इन राजनीतिज्ञों के डर से बदलता देखा गया है।
कुल मिलाकर राजनीति पर लिखना मेरे लिए मुश्किल काम है। मैं न तो अपने प्यारे संविधान के बारे में कोई खास जानकारी रखता हूँ और न ही दंड संहिता के बारे में, ऐसे में राजनीतिक लेखन से किसकी भावना आहत हो जाए कहा नहीं जा सकता। मेरा क्या मैं तो इस देश का अदना सा आदमी हूँ, मेरी भावनाएं रोज आहत होती हैं, किंतु किससे कहा जाए? सुनने वाले की भावनाएं आहत हो गईं तो क्या होगा? एक मित्र ने एक नेता जी से एक दिन बस इतनी सी बात कही थी कि आपके ड्राइवर ने मेरे पैर पर आपकी गाड़ी का पहिया चढ़ा दिया। नेता जी इतना सुनते ही भन्नाते हुए बोले- मूर्ख आदमी! तुझे जब इतनी बड़ी गाड़ी दिखाई नहीं देती तो अपना भविष्य क्या दिखाई देगा, शुक्र मना कि गाड़ी तेरे ऊपर नहीं चढ़ी। नहीं तो हो जाता राम नाम सत। दोबारा गाड़ी देखकर हट जाना।
यह राजनीति कम ही लोगों की समझ में आती है। जिनकी समझ में आती है वही तो गाड़ी में बैठते हैं और जिनकी समझ में नहीं आती उनके पैर गाड़ी के पहिए के नीचे दबकर टूट जाते हैं। लेकिन नेता जी की बात उस आदमी की समझ में आ जाती है और वह घर में ऐसा छुपकर बैठा जाता है कि मतदान वाले दिन भी घर से नहीं निकल पाता। परिणामस्वरूप नेता जी चुनाव हार जाते हैं। चुनाव हारने के कारणों को जानने के लिए मंथन चलता है, विपक्ष की कार्यशैली पर चर्चा होती है, जिन लोगों ने दूसरे दलों को मतदान किया, उनका पता लगाया जाता है और उन्हें गद्दार की उपाधि दे दी जाती है, मगर इस चर्चा में वह डरा हुआ मतदाता नहीं होता जिसकी औकात गाड़ी के पहिए के नीचे दबकर मर जाने की होती है।

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