थोपाथोपी का खेल/अमन कुमार त्यागी

भारत की ही नहीं बल्कि दुनिया की परंपराएं बड़ी अजीब हैं। विभिन्न देशों एवं विभिन्न संस्कृतियों वाली इस दुनिया को निराली दुनिया वैसे ही नहीं कहा जाता है। विभिन्न बोलिया, आदमियों के विभिन्न रंग-रूप, विभिन्न खान-पान, विभिन्न रहन-सहन, सभी कुछ विभिन्न होते हुए भी उनके अपने विचार किसी थोपे हुए व्यक्ति के विचार बन जाते हैं। फिर भी दुनिया में महान लोगों की कमी नहीं है।
अपने देश में तो हाल कुछ अलग है। यहाँ तो थोपने की बीमारी सी चल निकली है बल्कि महामारी कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। जैसे थोपाथोपी का खेल चल रहा हो। आपको पता भी नहीं चलता और कुछ न कुछ थोप दिया जाता है। विचार थोप दिए जाते हैं, आचार थोप दिए जाते हैं और तो और समाचार थोप दिए जाते हैं। यह खेल बड़ा अजीब है और इसकी लीला न्यारी है। टीवी खोलकर बैठो, कोई मर्जी का चैनल लगाओ तो विज्ञापन थोप दिए जाते हैं। दुकान से अपनी मर्जी का सामान लेने जाओ तो दुकानदार अपनी मर्जी का सामान थोप देता है। कपड़े खरीदो तो, दवाई खरीदो तो, कूलर हो या वाशिंग मशीन सबकुछ थोप दिया जाता है यहां तक कि स्कूल में अध्यापक और संसद में नेता भी थोप दिया जाता है। लड़की की शादी के लिए लड़का थोप दिया जाता है, मतलब एक बच्चे पर बाप थोप दिया जाता है।
चुनाव अब ऐसी चीज नहीं रही है जिसके बारे में कुछ जानना चाहिए। देश में कहीं न कहीं चुनाव चलते ही रहते हैं। चुनने की स्वतंत्रता है मगर आप चुनेंगे उन्हें जिन्हें आप नहीं चाहते हैं। पिछले दिनों अखबार में एक खबर पढ़ी थी कि एक पार्टी के कार्यकर्ता सड़क पर उतर आए और उन्होंने अपने जनप्रतिनिधित्व के लिए किसी बाहरी व्यक्ति का विरोध किया था। उन्होंने नारे भी लगाए थे ‘बाहरी नहीं चलेगा, नहीं चलेगा’। लेकिन हुआ क्या? पार्टी अध्यक्ष ने कार्यकर्ताओं को चेताया और पदाधिकारियों को धमकाया। कुलजमा परिणाम वही हुआ जो अकसर होता रहा है। जनप्रतिनिधि थोप दिया गया। हराने के लिए भीतरघात प्रारंभ हो गई मगर जब यह जनप्रतिनिधि चुन लिया गया तो विरोध करने वाले लोग उसके दरबार में हाजिरी लगाने को आतुर दिखने लगे।
अब क्या कहा जाए जनाब यहाँ क्या-क्या थोपा जाता है। एक मित्र थे, उनके पेट में दर्द हुआ तो वह डाॅक्टर साहिब के यहाँ चले गए। चैकअप किया गया दवाई दी गई और चलते हुए तीमारदार के कान में कह दिया गया कि अभी और चैकअप कराने होंगे, आपके मरीज को कैंसर का खतरा है। लो हो गया इलाज, मरीज से पहले तीमारदार मरने को तैयार। पैसे जुटाए गए, मरीज का परहेज प्रारंभ हो गया। चैकअप हुआ, एक जगह नहीं बल्कि दो दो जगह। कुछ नहीं आया तो डाॅक्टर ने राहत की सांस लेते हुए तिमारदार से कहा -शुक्र है सब नार्मल है।
और तीमारदार देख रहा था कि किसी पैथोलाजी लैब से आए एक मोटे से लिफाफे को खोलकर डाॅक्टर ने झांका और दराज में रख लिया। अब उस मरीज की समझ में आने लगा था कि सांसद/विधायक निधि से होने वाले काम उन्हीं के लोग क्यों कराते हैं?
आखिर यह थोपने की बीमारी कब दूर होगी? यह सवाल लाख टके का है मगर उससे भी महत्वपूर्ण है कि लालच कब खत्म होगा? अभी सोच ही रहा था कि तभी मेरे मन की बात एक बच्चे ने सुन ली और झट से बोल उठा। एक बात बताओ अंकल आग से तेज आँच कब लगती है? मैंने जवाब दिया जब आग लाल होती है। तब बच्चे ने पूछा ‘‘आग लाल हो और आँच न लगे यह संभव है क्या?’’ मैंने सरलमना जवाब दिया ‘‘नहीं तो।’’ तब बच्चे ने मुस्कुराते हुए कहा- ‘‘यह लाल आँच ही तो लालच है।’’ बच्चे की बात मेरी समझ में नहीं आई। मैंने सवालिया निगाहों से उसे देखा तो वह समझाने वाले अंदाज में बोला- ‘‘देखो अंकल, बात साफ सी है। हमारे पास जो चीज होती है हम उसी का व्यापार करते हैं, करते हैं कि नहीं?’’ उसने पूछा ही इस अंदाज में था कि मुझे ‘‘हाँ’’ में गर्दन हिलानी पड़ी। उसने फिर समझाया- ‘‘आप जानते हैं, बिजनेस कोर्स में यह भी समझाया जाता है कि गंजे को कंघा कैसे बेचना है?’’ मैंने ‘‘नहीं’’ में गर्दन हिला दी तो वह किसी दार्शनिक की ही तरह बोला- ‘‘क्योंकि कंपनी बनाती ही कंघा है।’’
बच्चे की बात अब मेरी समझ में कुछ-कुछ आने लगी थी। और अपने आप पर शर्मिन्दगी भी होने लगी थी। जो रहस्य बच्चे ने समझाया है वह मैं क्यों नहीं जानता था। मेरे दिमाग में यह बात क्यों नहीं आई कि प्रोडक्शन के हिसाब से जरूरतें पैदा होने लगी हैं न कि जरूरतों के हिसाब से प्रोडक्शन। अब कंपनियाँ और पार्टियाँ जो प्रोडक्शन करती हैं वही तो मार्केट में पहुँचेंगी और बिकेंगी तभी जब थोपने वाले इस कला में माहिर होंगे। लगता है यह कला भी सीखनी ही पड़ेगी, मगर कैसे? मैंने तो लिखने के अलावा कुछ सीखा ही नहीं है। क्या इसी बच्चे को अपना गुरु बना लूं? शर्म कैसी अष्टावक्र ने भी तो इसी तरह सीखने के लिए अपने गुरु बनाए थे और फिर सीख तो कहीं से भी मिल सकती है।
अभी कुछ खास समझ पाता कि वही बच्चा मेरे पास आया और बोला – ‘‘अंकल आप व्यंग्य मत लिखो, कहानी लिखा करो वही अच्छी लगती है।’’
बच्चे की बात आप समझे क्या?
मेरी समझ में जरा धीरे से आएगी, क्योंकि अभी व्यंग्य वाली डाई मशीन पर लगी हुई है और राॅ मैटिरियल चल रहा है, कम से कम यह लाॅट तो पूरी हो जाए तब कहानी शुरू करूंगा। आखिर मैं अपनी चीज किसी पर क्यों थोपूं, लेकिन लग रहा है कि इस बच्चे ने अपनी इच्छा मुझ पर थोप दी है और मैं समझ भी नहीं पाया।
हत्तेरेकी, यही तो है थोपाथोपी का खेल।

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