आजमगढ़ में संपन्न हुआ मीडिया समग्र मंथन

आजमगढ़ में संपन्न हुआ मीडिया समग्र मंथन

तीन दिशाओं से घिरे तमसा के जिस पौराणिक तट पर आजमगढ़ नगर बसा है, उसके हृदय स्थल पर हर दूसरे बरस ख़बरनवीसों और अदीबों का जलसा होता है। यहां मीडिया और साहित्य के विद्वानों और पत्रकारों का जमघट होना एक नई दिशा की ओर संकेत करता है कि अब आजमगढ़ की पहचान और परंपरा में बदलाव की आहट सुनाई देने लगी है। इसकी सूरत और सीरत में इसके पुराने कलेवर और तेवर के सुर फिर सुनाई देने लगे हैं। क़लम और कौपीन की धरती अब मीडिया मंथन और विश्वविद्यालय की मांग करती नज़र आती है। बदलते दौर की शिक्षा और तकनीक ने आजमगढ़ियों के मानस को भी बदला है। बदलाव के इसी दौर में मीडिया मंथन-2018 ने एक नई रेखा खिंची है। जनपद मुख्यालय के नेहरू हाल में ‘मीडिया समग्र मंथन-2018’ का आयोजन कुछ विशेष संकेत दे गया। सात और आठ अप्रैल को आयोजित इस कार्यक्रम में देश के जाने माने विद्वान और पत्रकारों ने भाग लिया। प्रथम दिवस कार्यक्रम का उद्घाटन कार्यक्रम अध्यक्ष डाॅ. योगेन्द्रनाथ शर्मा अरूण और मुख्य अतिथि पूर्व डीजीपी प्रकाश सिंह ने अन्य अतिथियों महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा से आए प्रो. देवराज, दैनिक देशबंधु दिल्ली के कार्यकारी संपादक जयशंकर गुप्त, गोपाल जी राय, विजयनारायण, गोपाल नारसन, आदि सभी ने मां सरस्वती के समक्ष दीप प्रज्ज्वलित कर और ऐतिहासिक हरिहरपुर घराने के मिश्राबंधुओं शीतला मोहन मिश्रा ने सरस्वती वंदना तथा वेद विद्यार्थियों ने वेदमंत्रों का वाचन कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया।
‘मीडिया समग्र मंथन 2018’ के उद्घाटन सत्र के बाद ‘लोकतंत्र, मीडिया और हमारा समय’ विषय पर अत्यंत गंभीर व सार्थक संवाद के आयोजन के साथ-साथ ‘शार्प रिपोर्टर’ मासिक पत्रिका के उत्तर प्रदेश एवं उत्तराखंड विशेषांक का विमोचन भी किया गया। उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता रुड़की से आए साहित्य अकादमी के पूर्व सदस्य डाॅ योगेन्द्रनाथ शर्मा अरुण ने की और मुख्य अतिथि के रूप मे उत्तर प्रदेश और आसाम के पूर्व डीजीपी प्रकाश सिंह रहे। महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के वरिष्ठ प्रोफेसर डाॅ. देवराज, उत्तराखण्ड के स्वतंत्र पत्रकार श्रीगोपाल नारसन, दिल्ली से आए गोपाल जी राय तथा आजमगढ़ के वरिष्ठ पत्रकार विजय नारायण ने लोकतंत्र व मीडिया पर अपने सारगर्भित विचार रखे। दिल्ली से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के चर्चित पत्रकार पुण्य प्रसून वाजपेयी ने लाइव टेलीकास्ट के माध्यम से इस संवाद उत्सव को संबोधित किया और पत्रकारों द्वारा पूछे गए सवालों के बेबाकी से जवाब भी दिए। इस संवाद उत्सव में दो प्रस्ताव भी पारित किए गए। जिनमें केंद्र व राज्य सरकारों से यह मांग की गई कि पत्रकारों की राष्ट्रव्यापी सुरक्षा के लिए केंद्र व राज्यों की सरकारें तुरंत प्रभावी कानून बनाए साथ ही अपना दायित्व निभाते हुए पत्रकार की हत्या पर या मौत पर उसके परिवार को शहीद सैनिकों की भाँति ही सुविधा दी जाए। भोजपुरी गायिका चंदन तिवारी की लोक आधारित गीत संध्या विशेष आकर्षण रही तो दूसरे दिन के अंतिम सत्र के रूप में कवि सम्मेलन व मुशायरे ने आयोजन को नई ऊँचाई दी। सम्मान सत्र में देश के विभिन्न क्षेत्रों के दस कलमकारों को महान विभूतियों की स्मृति में सम्मानित किया गया। कार्यक्रम का सफल संचालन अमन त्यागी ने किया तो शार्प रिपोर्टर पत्रिका के संपादक अरविंद सिंह व संस्थापक वीरेंद्र सिंह ने अतिथियों का भावपूर्ण स्वागत किया।
महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा से आए विद्वान प्रोफेसर देवराज ने मीडिया समग्र मंथन-18 के दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यक्रम में प्रथम दिवस सात अप्रैल को ‘मीडिया, लोकतंत्र और हमारा समय’ विषय का प्रवर्तन करते हुए कहा कि मरना जिसको आता हो है जीने का अधिकार उसे ही। आजमगढ़ के अतीत को याद करते हुए कहा कि कला, साहित्य और संस्कृति की धरती से गंभीर पत्रकारिता का हस्तक्षेप किया जाना सकारात्मक पहल है। लोकतंत्र के बारे में लोहिया, अंबेडकर और नरेंद्रदेव के बड़े योगदान को भी उन्होंने स्मरण किया। उन्होंने तीनों विद्वानों के बारे में बताया कि वे ऐसा लोकतंत्र चाहते थे, जिसमें व्यक्ति महज मत न होकर मूल्य होना चाहिए। पिछले सात दशक में आम आदमी को मत बना दिया गया है। दुनिया का अधिकांश सौंदर्य श्याम है, आचार्य नरेंद्रदेव कहते थे कि विचार की आवश्यकता और उसकी स्वतंत्रता अनिवार्य है। पिछले सात दशकों में विचार की कितनी रक्षा और सुरक्षा हम कर पाए हैं यह देखना होगा। पहले हमने व्यवस्था को मततंत्र में बदला बाद में यही स्वार्थतंत्र में बदल गया। लोकतंत्र के नाम पर हम एक ऐसी व्यवस्था की ओर बढ़ रहे हैं जो सिर्फ औपचारिकता रह जाएगी। मीडिया आज लिखित से मशीन की ओर गया है। प्रोद्यौगिकी के आने से मीडिया के सरोकार कमजोर हुए हैं। हमारी प्रतिबद्धताएं और प्राथमिकताएं बदल गई हैं। लोकतंत्र में लोक की भागीदारी कम हुई है। पिछले सात दशक में सबसे अधिक उपेक्षा शिक्षा और संस्कृति की हुई है। संस्कृति, संस्कार, और परिष्कार का नाम है। संस्कृति जीवनशैली, विचार प्रधान, बौद्धिक बनाने का नाम है तो हमें मानना होगा कि जीवन का हर पहलू उसका अविभाज्य अंग है। संस्कृति हमारे लिए उत्सव हो गया है, जीवन नहीं। भाषा का लोकतंत्र और मीडिया से गहरा संबंध है। हिंदी पत्रकारिता या कहें भाषाई पत्रकारिता हाशिए पर है। अंग्रेजी पत्रकारिता की शुरुआत साम्राज्यवाद को स्थापित करने के लिए हुई थी। 1857 के स्वाधीनता संग्राम को अंग्रेजी मीडिया ने महज एक विद्रोह करार दिया। स्वतंत्रता संग्राम में समाज का हर वर्ग शामिल था। उस संग्राम से प्रेरित होकर नोआखाली में अनुशीलन समिति बनी थी। उस संग्राम में वो उत्तरपूर्व की महिलाएं एवं बालिकाएं भी थीं जो कपड़ों में छिपाकर हथियार पहुंचाया करतीं थीं। इस संग्राम में तमाम वो साधु भी थे, जिन्होंने आंदोलनकारियों के शवों का अपमान न हो इसलिए अपनी झोपड़ी में रखकर उसको आग के हवाले कर दिया था। देशी भाषाओं की मिशनरी पत्रकारिता को नमन किए जाने की जरूरत है। पत्रकारिता के मूल चरित्र की बात क्यों नहीं होती। पत्रकारिता का काम आज सत्ता प्रतिष्ठानों को गाली देने का काम रह गया है। हिंदी की पत्रकारिता अनुदित बन चुकी है। यह हमारे विचार का विषय होना चाहिए कि भाषाई पत्रकारिता को मूल चरित्र पर लौटाए जाने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र, मीडिया और बौद्धिक जगत के बीच कई दीवारें हैं। लोकतंत्र के रक्षक एक तरफ हैं, बौद्धिक बिरादरी एक तरफ है। बुद्दिजीवियों और पत्रकारों को अलग खांचों में बांट दिया गया है। बुद्धिजीवियों और लेखकों में भी बंटवारा कर दिया गया है। बुद्धिजीवियों और शिक्षकों को अलग कर दिया गया है। पहले की पत्रकारिता ही बौद्धिकता थी। माखनलाल चतुर्वेदी में सभी तत्व एक ही इकाई में समाहित थे। इस देश में बौद्धिक जगत ने उत्तर आधुनिकता के नाम पर भूचाल खड़ा कर दिया है। विचार, मूल्य, कला, संस्कृति और लेखन का अंत कर दिया है। सिर्फ बचे हैं तो प्रश्न और विचार का अंत हो चुका है। उत्तर आधुनिकता निकारगुआ के विचारकों ने स्थापित की थी। पश्चिम के जिस बुद्धिजीवी वर्ग से हम बहुत अधिक प्रभावित रहते हैं, उसने हमें खोखला बना दिया है। हमने अपने अभावों और कुंठाओं से मुक्त होने के नाम पर तथाकथित बौद्धिकता का आडंबर ओढ़ लिया। हमारे बुद्धिजीवियों ने तीसरी दुनिया के देश नामक शब्द गढ़ा। पूरी दुनिया को उत्तर आधुनिक, आधुनिक और पिछड़े राज्यों में बांट दिया गया। भारतीय उपमहाद्वीप को पिछड़े देशों में रखा गया है। जो मीडिया अंग्रेजी और पश्चिमी साजिशों को समझती है, उसके संवर्धन की जरूरत है। उन्होंने कहा कि जब मीडिया ने अपनी रखवाली करने की कोशिश की तब उसे सकारात्मक बने रहने के नाम पर उद्देश्य से भटका दिया गया है। सकारात्मक मीडिया के नाम पर मीडिया भटकाव की राह पर है। सकारात्मक या नकारात्मक कुछ नहीं होता जो आप देते हैं वही जरूरत है। आज सकारात्मक वह है जो सत्ता को सुख पहुंचाए। फिल्मों का मूल्यांकन बॉक्स ऑफिस के कलेक्शन से किया जाना चिंताजनक है। फिल्म की कसौटी रचनात्मकता, कथानक, विचार और मूल्य होने चाहिए। मीडिया को अपने गिरेबां में झांकने की जरूरत है। लघु, मध्यम पत्रकारिता आज भी मूल्यपरक और वास्तविक पत्रकारिता से जुड़ी हुई है। इस धरती की गरमाई को संजोने के लिए कुछ बड़ा काम करने की जरूरत है। जिस जमीन ने हिंदी के भाषिक चरित्र को परिभाषित किया। उस धरती की धरोहर को संजोने के लिए राहुल सांकृत्यायन के नाम पर विश्वविद्यालय बनाने का प्रस्ताव यह सभा पारित करती है।
इस अवसर पर कार्यक्रम के मुख्य वक्ता और उत्तर प्रदेश, आसाम के पूर्व पुलिस महानिदेशक प्रकाश सिंह ने कहा कि हिंदुस्तान के लोकतंत्र पर हम सभी को अभिमान है। इसके साथ ही हमने यदि अपनी कमजोरियों का निदान नहीं किया तो लोकतंत्र मजबूत नहीं हो पाएगा। पिछली लोकसभा में 34 फीसदी सांसद आपराधिक पृष्ठभूमि के थे। यह संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। देश में ऐसे लोगों से राष्ट्रीय सुरक्षा की उम्मीद कैसे की जा सकती है। संसदीय व्यवस्था का जिस तरह से चरित्र बदल रहा है। लोकतंत्र स्टेट की ओर से क्या हम क्रिमनल स्टेट की ओर तो नहीं बढ़ रहे हैं। जनप्रतिनिधि आज लोकतंत्र की कब्रें खोद रहे हैं। इस स्थिति में देश में कोई तानाशाह आएगा और इनकी छुट्टी कर देगा। ऐसे में क्या हम तानाशाही के लिए रास्ता तो नहीं तैयार कर रहे। इलेक्शन में विदेशी फंडिंग नहीं किया जा सकता है, यह फंडिंग सभी पार्टियां कर रही हैं। इसे दिल्ली उच्च न्यायालय में गैरकानूनी ठहराया जा चुका है। 1976 में दोनों पार्टियों ने कानून बनाकर विदेशी निवेश को वैध बना दिया। इस कानून के अस्तित्व में आने के बाद देश औपनिवेशिक व्यवस्था की ओर बढ़ रहा है। लोकतंत्र से दीमक का सफाया नहीं किया गया तो इसका चरित्र विकराल हो जाएगा। उन्होंने मीडिया को लेकर टिप्पणी करते हुए कहा कि मीडिया के मुंह आज खून लग गया है। पी साईनाथ कहते हैं कि मीडिया के नैतिकता का दायरा खत्म होता जा रहा है। संस्थान चलाने के लिए पैसे चाहिए पर कितना चाहिए यह सीमा तो तय करनी पड़ेगी। क्या पैसे कमाने के लिए हम कपड़े उतारकर नंगे हो जाएंगे। एक बड़े अखबार का मालिक व्यभिचारी है उससे आप क्या उम्मीद करेंगे। उन्होंने मौजूदा समय के संदर्भ में बताया कि विकास के साथ हो रहे मूल्यों के ह्रास को कोई देख नहीं रहा है। परिवार और समाज से परिवार और रिश्तों में आदर का भाव खत्म होता जा रहा है। धर्म की जय करके हम अपने आपको संतुष्ट कर रहे हैं। लगातार अधर्म का दायरा बढ़ता जा रहा है। प्राणियों में सद्भाव के स्थान पर मारकाट होती जा रही है। अंग्रेजों ने संप्रदायों में वैर कराया। हम तो उनको जाति, भाषा, क्षेत्र, लिंग और परंपराओं के नाम पर लड़वाने का काम कर रहे है। कुछ ऐसी खबरें होती हैं, जो जान बूझकर फैलायी जाती है, जिससे दुर्भावना बढ़ती है। देश को तोड़ने का षड़यंत्र है, हिंदू धर्म को तोड़ने का षड़यंत्र है बड़े कैनवास में देखें तो यह देश तोड़ने की षड़यंत्र है। पैसे लेकर ब्रेकिंग इंडिया मुहिम चलाई जा रही है। कथित बुद्धिजीवी देश तोड़क अभियान चला रहे हैं।
कार्यक्रम में भौतिक रूप से न आ सके पुण्यप्रसून वाजपेयी नेवीडीओ कांफ्रेंसिंग के माध्यम से समारोह के उद्घाटन सत्र को संबोधित किया। एबीपी न्यूज चैनल के कार्यकारी संपादक पुण्यप्रसून वाजपेयी ने प्रश्नकर्ताओं के सवालों का जवाब भी दिया। उनहोंने कहा कि भारत में राजनीतिक सत्ता ही सब कुछ नियंत्रित करना चाहती है। जो चीजें संविधान के दायरे में नहीं बंधती वो लोकतंत्र को मजबूत करती है। अधिकतर राजनीतिक दलों में,संविधान में,संविधान को कॉपी पेस्ट किया हुआ माल होता है। संवैधानिक संस्थाओं पर सत्ता का दबाव लोकतंत्र को कमजोर करता है। मीडिया उस राजनीतिक सत्ता से ही प्रभावित हो जाती है। पूरी की पूरी मीडिया सरकार केंद्रित हो जाती है। संसदीय बहसों में 62 प्रतिशत किसानों और मजदूरों पर बहस होती है, पर बजट में महज 5 फीसदी ही आ पाती है। मुस्लिम तुष्टिकरण, हिंदू ध्रुवीकरण, दलित राजनीति और पिछड़ों का खेल हमेशा खेला जाता रहा है। गांव के व्यक्ति को वोट बनाने के लिए शहर तैयार है, शहर के व्यक्ति को वोट बनाने के लिए मार्किट तैयार है। हिंदुस्तान की संस्कृति अगर सत्ता के इर्दगिर्द चलती रहेगी तो यही लोकतंत्र की परिपाटी बन जाएगी। आजमगढ़ का जिक्र कैफी आजमी या राहुल सांकृत्यायन के नाम पर किया जाए या मुस्लिम चरमपंथ के नाम पर किया जाए। सत्ता, शक्ति यह कभी नहीं चाहेगा कि संवैधानिक संस्थाओं में उनके लोगों की भर्ती न हो। हिंदुस्तान में अब यह बताना पड़ेगा कि दलित, पिछड़ों, मुसलमानों की आबादी कितनी है। आप बताते इसलिए नहीं हैं कि आपको खुद कहने की हिम्मत नहीं है।
एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा, पत्रकार को पत्रकार रहने दीजिए, जज को जज रहने दीजिए। हमको नेता कहता है कि आप क्यों नहीं चुनाव लड़कर देख लेते। लोकतंत्र को वोटतंत्र में बदलने का षड़यंत्र बना दिया गया। चुनाव और मतदाता ही लोकतंत्र नहीं है। अब मीडिया को यह भी बताना पड़ेगा कि लोकतंत्र है या नहीं है, है तो उसके सही मायने क्या हैं। हमें उस जज का बायकॉट करना पड़ेगा जो अपनी ताकत का बेजा इस्तेमाल करता है।
हमने किताबों का कल्चर विकसित नहीं किया। न्यूनतम समर्थन मूल्य डेढ़ गुना देने की घोषणा को हवा देते रहे, वास्तविकता यह है कि किसान की आय दोगुना होने के बावजूद हैंड टू माउथ है। इसका मतलब यह मान लिया जाए कि क्या लोकतंत्र को खत्म कर लेने के लिए मीडिया टूल बन चुकी है।
आजतक चैनल से नौकरी छोड़ने के सवाल पर जवाब दिया, हमने लोकमत समाचार से नौकरी शुरू की। यह सफर सहारा, एनडीटीवी, जी न्यूज, आजतक होकर एबीपी न्यूज में पहुंचे हैं। पहले कभी किसी ने यह सवाल नहीं पूछा। पिछली सरकार या उससे पिछली सरकार का दबाव बराबर ही रहा है। यह वक्त का हेरफेर है यह परफेक्शन पर डिपेंड करता है। हमें इस स्थिति को रोकने के लिए बात करनी चाहिए। डॉ मनमोहन लेफ्ट समर्थन लेकर सरकार चलाते हैं। एनडीए प्रचंड बहुमत के बाद वही करती है। इलेक्शन में हिंदुस्तान सबसे अधिक रकम न्योछावर करता है। कारपोरेट को पता रहता है कि कौन सरकार आने वाली है। इसलिए 2014 के चुनाव में 80 फीसदी चंदा बीजेपी को मिला था।
किताब लिखने के सवाल पर बताया, किताब तो लिखनी चाहिए थी आरएसएस पर, पॉलिटिकल प्रॉसेस पर, उच्च शिक्षा पर, उसके बाजारीकरण पर,सामाजिक असमानता पर लेकिन हम अभी उस पर काम कर नहीं पाए हैं। काम करते हुए किताबें लिख पाना संभव नहीं है। हमने अब तक ‘आदिवासियों पर टाडा’, ‘संसद: लोकतंत्र या नजरों का धोखा’, ‘राजनीति मेरी जान’, ‘डिजास्टर: मीडिया एंड पॉलिटिक्स’ लिखीं है। यह सभी हमारे आलेखों के संग्रह हैं मूल तौर पर किताब नहीं कह सकते हैं। आरएसएस पर किताब लिखने की योजना है। आम आदमी को आज उपभोक्ता और यूजर बना दिया गया है। पत्रकारिता के सवाल पर वाजपेयी कहते हैं, मान लीजिए किसी पत्रकार को काम नहीं करने दिया जाएगा। ऐसे हालात में भी पत्रकार काम तो करें, क्योंकि मीडिया के लिए कई माध्यम हैं। हिंदुस्तान की राजनीति आज सबसे करप्ट है यह हम नहीं कह पा रहे हैं। हम यह भी नहीं बता पा रहे हैं कि मूल विषयों को किस तरफ धकेलने की साजिश चल रही है। मीडिया की विश्वसनीयता काफी समय से दांव पर है। आप मेनोफेस्टो लागू करने की बात क्यों करते हैं। संविधान को लागू करने की बात तो कीजिए। हमारे देश के राजनीतिक दलों ने संविधान को ही मेनिफेस्टो बना लिया। नेहरू ने 100 पिछड़े जिलों का जिक्र किया था, मोदी उन्हीं जिलों को संवेदनशील जनपद घोषित कर रहे हैं।
देश का संविधान और कानून नजरों का धोखा है, गैर लोकतांत्रिक है। इस सवाल के जवाब में उन्होंने बताया कि गांधी जी ने यह बात तो 1947 में में ही कह दिया था कि देश आजाद नहीं हुआ केवल सत्ता का हस्तांतरण हुआ है।
सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के डीएवीपी विभाग में प्रशासनिक अधिकारी गोपाल जी राय ने कहा कि मीडिया पर आरोप लगाना आसान है। सर्वोच्च न्यायालय तक न्याय मांगने मीडिया के पास आते हैं। वर्तमान मीडिया भी विदेशी फंडिंग से चल रही हैं। पत्रकार को बिकाऊ कहने वाले उसकी हकीकत नहीं जानते। जनता ने मीडिया को टिकाऊ बनाने के लिए कभी कोई आंदोलन ही नहीं किया। देश के किसी भी सदन में पत्रकारों के कल्याण को लेकर कोई सवाल नहीं उठाया गया।
रुड़की उत्तराखंड से आए स्वतंत्र पत्रकार श्रीगोपाल नारसन ने कहा कि मीडिया हमारे लोकतंत्र का सच्चा कवच है। यह आत्ममंथन और विवेचन भी करती है।
डॉ योगेंद्र नाथ शर्मा ‘अरुण’ ने अध्यक्षीय भाषण में कहा कि हम संविधान के नाम पर जातियों को बांट रहे हैं। हम माइंड गिनने के बजाय सिर गिनने की नीतियों का पालन कर रहे हैं। हम आरक्षण के नाम पर बाबा साहब का मजाक उड़ा रहे हैं। दस वर्ष के लिए आपने अंग्रेजी को संपर्क भाषा बनाए रखने की वकालत की थी आज राष्ट्रभाषा बनती जा रही है। प्रजातंत्र के पहले 25 वर्ष लोकतंत्र, अगले 25 वर्ष भीड़तंत्र, फिर 25 वर्ष अराजकतंत्र और अंतिम 25 वर्ष अधिनायकतंत्र के होंगे। हमने विज्ञान बनाया और उसके दास बन गए। विज्ञान ने हमारी नैतिकता ले ली, मूल्य ले लिए, संवेदनाएं ले लीं। कथित सोशल मीडिया सर्वेंट की जगह मास्टर बन गया है। नकारात्मकता हमने अपने दिल से लगा रखा है, तो सकारात्मकता कैसे आएगी। हमें वो नहीं चाहिए जो हमें अनर्थ सिखाए हमें वो चाहिए जो हमें अर्थ सिखाए। अंग्रेजी के अखबार रद्दी में बेंचे जाते हैं, हिंदी के अखबार पढ़े जाते हैं। कर्तव्य निभाते हुए पत्रकार का निधन होता है तो उसके परिवार के भरण पोषण के लिए मुआवजे की व्यवस्था करें।
सात अप्रैल के कार्यक्रम के अंतिम सत्र में शाम को बोकारो से पधारी लोकप्रिय भोजपुरी गायिका चंदन तिवारी का रंगारंग कार्यक्रम हुआ। भोजपुरी और हिंदी पट्टी के मानस को समझते हुए चंदन ने माटी के दर्द और विरह की वेदना को अपना स्वर दिया जिसे लोगों ने मंत्रमुग्ध होकर सुना।

मीडिया मंथन के दूसरे दिन मीडिया से जुड़े लोगो ने ‘मीडिया से उम्मीदें’ के सवाल पर अपने अपने अनुभव बांटे। आज तक के पत्रकार रामकिंकर ने कहा कि मीडिया की उसकी निष्पक्षता को लेकर कितनी भी आलोचना क्यों न करें लेकिन जब ऐसे लोग संकट मे होते हैं तो वे अपनी आवाज उठाने के लिए मीडिया के पास ही आते है।
मीडिया मिरर के संपादक प्रशांत राजावत ने कहा कि मीडिया में जो सच्चाई परोसना चाहता है उनकी आवाज मीडिया के लोग ही निजी स्वार्थ की चाहत में दबा देते हैं। वरिष्ठ पत्रकार अखिलेश अखिल ने बिहार मे सत्ताधीशों द्वारा पत्रकारों की आवाज दबाने के लिए अपनाये जाने वाले हथकंडांे की जानकारी दी और अपने उत्पीड़न की दास्तां सुनाई।
हैदराबाद से आए प्रोफेसर ऋषभदेव शर्मा ने “लोकतंत्र, साहित्य और हमारा समय” विषयक इस सत्र में मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित करते हुए कहा कि भारत में लोकतंत्र अभी प्रयोग की दशा में है तथा उसे असफल घोषित करना जल्दीबाजी माना जाएगा। हर चुनाव में भारतीय जनता निरंतर परिपक्वता के प्रमाण देती है और संसदीय लोकतंत्र के निजी प्रादर्श की उसकी तलाश अभी जारी है। उन्होंने आगे कहा कि हमारा समय निस्संदेह खतरनाक समय है जिसमें सारी दुनिया आतंक, युद्ध और तानाशाही की ओर बही जा रही है लेकिन सृष्टि का इतिहास गवाह है कि खतरों के बीच ही मनुष्यता ने सदा नई राहें खोजी हैं। वर्तमान में मीडिया और साहित्य को इस चुनौती का सामना करना है और लोकतंत्र के विकेंद्रीकरण द्वारा जनपक्ष को मजबूती प्रदान करने की जिम्मेदारी निभानी है। उन्होंने विरुद्धों के सामंजस्य के भारतीय दर्शन को व्यावहारिक रूप देने का आह्वान करते हुए समकालीन साहित्य के जुझारू तेवर की प्रशंसा की।

वर्धा हिंदी विश्वविद्यालय से आए प्रोफेसर देवराज ने हिंदी को क्षेत्रीय भाषाओं को आगे बढ़ाने वाली राष्ट्र भाषा के रूप में प्रतिष्ठित जन जन की भाषा बताया और स्वयं के द्वारा गैर हिंदी भाषी क्षेत्रो में किए गए हिंदी अभियान के अनुभव बांटे। व्यंग्यकार गिरीश पंकज ने बड़े ही प्रभावी ढंग से मीडिया मंे हो रहे परिवर्तन को लेकर चर्चा की तो वरिष्ठ पत्रकार जयशंकर गुप्त ने मीडिया को कमजोर करने के लिए सरकार द्वारा बनाए जा रहे मनमाने कानूनों पर सवाल उठाए।
साहित्य केंद्रित सत्र के विषय प्रवर्तक मदन मोहन मालवीय हिंदी पत्रकारिता संस्थान, काशी विद्यापीठ के निदेशक डॉ. ओमप्रकाश सिंह रहे। डॉ. ओमप्रकाश सिंह ने कहा कि समाज के कल्याण के लिए लिखा गया साहित्य ही श्रेष्ठ होता है। उन्होंने कहा कि आजादी से राजसत्ता तो मिली मगर विचारसत्ता को भुला दिया गया। उन्होंने यह भी कहा कि नागरिक आचरण गिर रहा है। उस पर संवाद आखिर कब होगा? नागरिक ही पत्रकार, साहित्यकार व मतदाता होता है। उसका आचरण खराब होगा तो लोकतंत्र कैसे आएगा? इस पर जब अभी संवाद ही नहीं हो रहा है तो सुधार कैसे होगा? पत्रकार अतुल मोहन सिंह ने कहा कि पत्रकार को खबरों के साथ न्याय करना चाहिए।
पत्रकार यशवंत सिंह ने कहा कि टेक्नालाजी से क्रांति आयी है, विचार से नहीं। टेक्नालाजी से ही क्रांति लाया जा सकता है और लोकतंत्र को बचाया जा सकता है। अखिलेश अखिल ने कहा कि जो निडर, निष्पक्ष व बेबाक नहीं है, जिसके पास मिशन नहीं है, वह पत्रकार नहीं हो सकता है। उन्होंने कहा कि आज देश में लोकतंत्र नहीं गिरोहतंत्र व गुंडातंत्र है। यह इस देश का दुर्भाग्य है कि लोकसभा में 250 अपराधी हैं। सभी प्रदेशों के विधानसभा की भी यही स्थिति है। अनामी शरण बबल ने कहा कि हम काफी खतरनाक दौर से गुजर रहे हैं। लोकतंत्र किसी को पसंद नहीं है। उन्होंने कहा कि हम अंतहीन महाभारतकाल में जी रहे हैं। समाज नपंुसकता की ओर जा रहा है। हम खुद गुलाम बन गए हैं। वरिष्ठ पत्रकार जयशंकर गुप्त ने कहा कि एकमात्र पत्रकार और पत्रकारों का ही संगठन है जो आत्म अवलोकन करता है। वह अपनी बुराई पर खुद चर्चा करता है और समाज का कोई भी व्यक्ति पत्रकारिता की खामियां गिनाता है तो वह उसका स्वागत करता है। यही वजह है कि आज भी समाज में इस पेशे के लोगों का सम्मान है। उन्होंने कहा कि मीडिया को हमेशा नियंत्रित करने की कोशिश की गयी मगर कोई कर नहीं पाया। जिसने यह कोशिश की वह सत्ता से जरूर चला गया। श्री गुप्त ने कहा कि पत्रकारिता आईना है। कोई इसके चाहे जितने भी टुकड़े करे, पत्रकार उसके चेहरे की कालिख दिखा ही देगा। हजारों टुकड़ों में भी उसका काला चेहरा ही दिखेगा। ऐसे में आईना तोड़ने की बजाय वह अपने चेहरे की कालिख साफ करे। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे गिरीश पंकज ने कहा कि साहसी पत्रकार कभी समझौता नहीं करता है। उन्होंने कहा कि पत्रकार की कलम वह होती है जो किसी भी परिस्थिति में न रूके, न झुके और न ही बिके।
कार्यक्रम के दूसरे सत्र में आयोजक व शार्प रिपोर्टर के संपादक अरविन्द कुमार सिंह ने पत्रकारिता व साहित्य के क्षेत्र की दस विभूतियों को सम्मानित किया। सम्मानित किए गए लोगों में डाॅ. योगेन्द्रनाथ शर्मा अरूण को ‘महापंडित राहुल सांकृत्यायन स्मृति साहित्य सम्मान-2018’, गिरीश पंकज को ‘मुखराम सिंह स्मृति पत्रकारिता सम्मान-2018’, जयशंकर गुप्त को ‘गुंजेश्वरी प्रसाद स्मृति पत्रकारिता सम्मान-2018’, प्रो ऋषभदेव शर्मा को ‘विवेकी राय स्मृति साहित्य सम्मान-2018’, पुण्यप्रसून वाजपेयी को ‘सुरेन्द्र प्रताप सिंह स्मृति टीवी पत्रकारिता सम्मान-2018’, यशवंत सिंह को ‘विजयशंकर वाजपेयी स्मृति पत्रकारिता सम्मान-2018’, विजयनारायण को ‘शार्प रिपोर्टर लाइफटाइम एचीवमेंट अवार्ड-2018’, सतीश सिंह रघुवंशी को ‘शार्प रिपोर्टर युवा पत्रकारिता सम्मान 2018’ व डा मधुर नज्मी को ‘अल्लामा शिब्ली नोमानी स्मृति अदबी अवार्ड 2018’ दिया गया।
दूसरे दिन के अंतिम सत्र में कवि सम्मेलन एवं मुशायरे का आयोजन भी किया गया। जिसमें महेन्द्र अश्क, हैदर किरतपुरी, डाॅ. मधुर नज्मी, ईश्वरचन्द त्रिपाठी, रूचि दुबे, गीता त्रिपाठी, शीला पांडे, अनामिका श्रीवास्तव, पुरुषार्थ सिंह, मैकश आजमी, प्रेमग़म आजमी, शिवकुमार सैनी उर्फ डंक जी, नागेश शांडिल्य, बालेदीन बेसहारा, राजाराम सिंह, भालचन्द त्रिपाठी, आनंद श्रीवास्तव आदि ने अपनी रचनाओं से कार्यक्रम का गरिमा प्रदान किया।
इस अवसर पर उपस्थित प्रमुख लोगों में एड. शत्रुघ्न सिंह, डाॅ. पंकज जायसवाल, डाॅ. अमित सिंह, डाॅ. खुशबू सिंह, रंजन राय, डाॅ. मधुर नज्मी, राजेन्द्र पाठक, महेन्द्र सिंह सुनील, एसके दत्ता, कृष्णमोहन उपाध्याय, उमाशंकर सिंह, संदीप अस्थाना, विवेक पांडे, दिग्विजय सिंह राठौर, संजय श्रीवास्तव, एसके सत्येन, अजय सिंह, प्रवीण सिंह, दीनपाल राय, सोनी पांडे, अभिषेक पंडित, अविनाश सिंह, आशुतोष द्विवेदी, पूनम श्रीवास्तव, निरूपमा श्रीवास्तव, स्वरमिल चन्द्रा, बृजेश यादव आदि रहे। आभार ज्ञापन शार्प रिपोर्टर पत्रिका के संस्थापक विरेन्द्र सिंह व संपादक अरविन्द सिंह ने किया। कार्यक्रम का संचालन अमन कुमार त्यागी ने किया।

print

Post Author:

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *