अखंडता, प्रेम और आक्रोश के कवि ऋषभ

‘तेवरी काव्य आंदोलन’ के प्रवर्तक ऋषभदेव शर्मा (1957) को प्रायः आक्रोश और व्यंग्य की चोट करनेवाली रचनाओं (तेवरी) के लिए जाना जाता है. साथ ही इन्होंने संतुलित पुस्तक-समीक्षा और शोधपूर्ण आलोचना के क्षेत्र में भी पहचान अर्जित की है. प्रतिष्ठित हिंदी-सेवी आचार्य ऋषभदेव शर्मा का जन्म पश्चिमी उत्तरप्रदेश के मुजफ्फरनगर जनपद के खतौली स्थित गंगधाडी गाँव में 04 जुलाई, 1957 को हुआ. मणिपुर विश्वविद्यालय से 1988 में इन्होंने अपनी पीएच.डी पूरी की. साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा विविध सम्मानों से इन्हें सम्मानित किया गया है. इन्हें प्राप्त सम्मानों की शृंखला इस प्रकार है – रामेश्वर शुक्ल अंचल सम्मान (2003), शिक्षा शिरोमणि पुरस्कार (2006), आंध्रप्रदेश हिंदी अकादमी पुरस्कार (2010), जनजागृति सेवा सद्भावना पुरस्कार (2011), रमादेवी गोइन्का हिंदी साहित्य सम्मान (2013), सुगुणा स्मारक सम्मान (2015), तमिलनाडु हिंदी साहित्य अकादमी जीवनोपलब्धि सम्मान (2015), वेमूरि आंजनेय शर्मा स्मारक हिंदी साहित्य सम्मान (2015), रूसी-भारतीय मैत्री संघ – दिशा (मास्को), हिंदी संस्थान – कुरुनेगल (श्रीलंका), साहित्यिक-सांस्कृतिक शोध संस्था (मुंबई) एवं सामाजिक संस्था – पहल (दिल्ली) द्वारा ‘अंतरराष्ट्रीय साहित्य गौरव सम्मान’ (2017) इत्यादि. इन्होंने बड़े पैमाने पर पाठ सामग्रियों का लेखन व संपादन तथा 24 साहित्यिक कृतियों और 8 साहित्यिक पत्रिकाओं का भी संपादन किया है. इनके 9 आलोचना ग्रंथ – कथाकारों की दुनिया (2016), कविता के पक्ष में (2016), हिंदी भाषा के बढ़ते कदम (2015), तेलुगु साहित्य का हिंदी अनुवाद : परंपरा और प्रदेय (2015), तेलुगु साहित्य का हिंदी पाठ (2013), कविता का समकाल (2011), साहित्येतर हिंदी अनुवाद विमर्श (2000), हिंदी कविता :आठवाँनवाँ दशक (1994), तेवरी चर्चा (1987) – और 9 काव्य संग्रह प्रकाशित हैं जिनमें इनकी एक काव्यकृति ‘प्रेम बना रहे’ के 2 भिन्न तेलुगु काव्यानुवाद भी सम्मिलित हैं. ‘तेवरी’ (1982), ‘तरकश’ (1996) और ‘धूप ने कविता लिखी है’ (2014) उनके चर्चित तेवरी संग्रह हैं. उनके अन्य काव्य संग्रह हैं – ‘ताकि सनद रहे’ (2002), ‘देहरी’ (स्त्रीपक्षीय कविताएँ, 2011), ‘प्रेम बना रहे’ (2012), ‘सूँ साँ माणस गंध’ (2013). डॉ. विजेंद्र प्रताप सिंह को दी एक साक्षात्कार में कवि ने अपने एक अप्रकाशित खंडकाव्य ‘वसुंधरा’ का भी जिक्र किया है जो ‘वराह’ अवतार पर केंद्रित है. इन्होंने 2017 में एक नया काव्य रूप ‘चतुर्पंच’ आरंभ किया जो व्यंजनापूर्ण मुक्तछंद मुक्तक है. इसमें चार पंक्तियाँ होती हैं. हर-एक पंक्ति में पाँच शब्द होते हैं और पंक्ति 1,2 तथा 4 में तुक का निर्वाह करना आवश्यक है. उदाहरण : “यह नदी पहाड़ी चटुल चपल/ पानी फिसला एक एक पल/ टेढ़ा मेढ़ा पत्थर मीलों लुढ़का/ भीतर तक चिकना गोल सजल”. (ऋषभ, चतुर्पंच ब्लॉग).

‘ताकि सनद रहे’: यह ‘पूर्णकुंभ’ मासिक में ‘ताकि सनद रहे’ शीर्षक के अंतर्गत नियमित रूप से प्रकाशित कविताओं का पुस्तकाकार रूप है. इसमें सम्मिलित कविताएँ विधा के स्तर पर नई कविता, मुक्त छंद और नवगीत के सम्मिश्रण से विकसित मौलिक काव्यरूप को सामने लाती हैं.अपनी इस कृति में कवि ने मिथकों और पौराणिक प्रसंगों के सहारे वर्तमान युग के सन्दर्भों को ही अभिव्यक्त किया है. कारगिल युद्ध के दौरान भारतीय जांबाजों के न पस्त होनेवाले हौसले और शहादत के नाम लिखी गई कविता का एक अंश यहाँ उल्लिखित है : “जल गए विमान/ पर जलने नहीं दिया/ उन्होंने अपना हौसला./ लौट गई मृत्यु भी करके प्रणाम उन्हें ;/ निखर आए आग में से/ मरजीवा पंछियों-से भारत माँ के बेटे.” (तब तुम कहाँ थे ?)

जिस वतन की रक्षा के निमित्त वतन के हर प्राणी ने अपना कुछ न कुछ होम किया. उसी वतन के कुछ बाशिंदे कैसे स्वार्थ की रोटी सेंकने के लिए वतन की एकता को खंडित करने चले हैं ! समूचा देश किसान, मजदूर, बुद्धिजीवियों, पूंजीपतियों, भाषा और धर्म के नाम पर बाँटा जा रहा है. ऐसे में कवि अपने कबीरी अंदाज में औरतों को एक होने का आह्वान करते हैं, देखें : “नौ मन काजर लाय,/ हाथी मार बगल में दीन्हें/ ऊँट लिए लटकाय !/ ….दुनिया भर की औरतों , एक हो !/ तुम्हारे पास कुछ भी नहीं है/ खोने को -/ सिवा मर्दों की गुलामी के !!” (औरतें)

औरतों की शक्ति के समक्ष बेबस देव समाज भी उन्हें तोड़ने की साजिशें रचता रहा है और यह पितृसत्ता भी कई हथकंडे अपनाकर उन्हें तोड़े रखना चाहती है. वास्तव में औरतें केवल आधी आबादी नहीं बल्कि बाकी आधी आबादी की भी प्रथम संरक्षक हैं. इनकी वास्तविक एकता के पास ही रुग्ण पितृसत्ताक समाज के इलाज की अचूक औषधि है. देखें : “बाकी आधी दुनिया भी/ छिपी है उनके गर्भ में,/ वे घुस पड़ीं अगर संसद के भीतर/ तो बदल जाएगा/ तमाम अंकगणित आपका ./ उन्हें रोकना बेहद जरूरी है,/ …..चुप रहो,/ हमारे विष्णु, हमारे इंद्र -/ वृंदा और अहिल्या के/ किलों की दीवारों में/ सेंध लगा रहे हैं;/ फोड़ने दो./ ….अलग अलग झंडियाँ/ अलग अलग पोशाकें/ बनवाकर बाँट दी जाएँ/ आरक्षण के ब्राह्म मुहर्त में/ इकट्ठा हुई इन औरतों के बीच !/ फिर देखना : वे भीतर आकर भी/ संसद के बाहर ही खड़ी रहेंगी. (आधी आबादी)

आधुनिक हाहाकारी और यांत्रिक जीवन शैली से बाहर निकलकर संकल्पवान होकर उद्देश्यपूर्ण जीवन जीने का आह्वान करते हुए कवि कहते हैं – “संकल्प की विद्युत तरंगों से/ काट फेंको/ आत्मनिर्वासन के सींखचों को/ और/ लौट आओ/ नशे के मरघट से/ जीवन के पनघट पर.” (कापालिक बंधु के प्रति). आधुनिकतम जीवन शैली और संबंध बनाने और निभाने की आज वाली फितरत जो मानव जाति को नित निराशा और मृत्यु के अंधकार की ओर धकेल रही है, आत्मनिर्वासित कर रही है ; घर, परिवार, मित्रता, प्यार, समाज और संसार की अहमियत बताते कवि के शब्द उस गति पर अंकुश की तरह हैं. जीवन का सारा अमृत आत्मीयता में ही बसता है. समय के साथ सब-कुछ बदल जाता है, कुछ नहीं बदलता है तो वह है नेह का नाता.

“ ‘यह नीम तेरे पिता की उमर का है.’/ …जब तुम घर में नहीं होते थे/ मैं अपनी नन्हीं उँगलियों से/ उसका तना छू-छूकर देखता था,/ अपना गाल रगड़ता था/ उसकी छाल पर./ उसकी पत्तियों का स्पर्श/ मुझे रोमांचित कर देता था,/ उसकी निंबोलियों की मिठास/ मुझे/ तुम्हारे चुंबनों का/ सुख देती थी./ मैं उसकी शाखों पर झूलता था,/ चढ़ जाता था डालों पर/ निर्द्वन्द/ निर्भय/ जैसे वे तुम्हारी भुजाएँ हों,/ तुम्हारे कंधे हों……पर टूटता कहाँ है नाता/ बचपन के नेह का ?/ इस सच को/ उस दिन जाना मैंने/ जब तुम/ सचमुच स्मृतिशेष हो गए.” (नीम).

पितृवत जानकर नीम के वृक्ष में पिता को, उनके स्पर्श को महसूस करना ; पिता-पुत्र के मध्य स्नेह भाव का इस रूप में अंकन समकालीन साहित्य की उस प्रवृत्ति की ओर इशारा है जिसमें पितृसत्ता के अप्रचारित पहलुओं को लगातार स्थान मिल रहा है. इसमें एक नवीन विमर्श के उभरने की संभावना भी छिपी हुई है.

‘देहरी’ : स्त्री अस्मिता और स्वतंत्रता की प्रबल पक्षधरता वाली कविताएँ इस काव्य संग्रह में शामिल हैं. ये कविताएँ सर्वप्रथम ‘स्त्री विमर्श’ नामक ब्लॉग पर प्रकाशित हुई थीं. भारतीय परंपरा में स्त्री की स्थिति का आरंभ से अब तक का अंकन करते हुए अपनी कविताओं के माध्यम से कवि ने कई मार्मिक उद्भावनाएं दी हैं. रत्नावली की लोकमर्यादित फटकार के फलस्वरूप तुलसी की गुरु-दीक्षा अवश्य घटित हुई. पर इसकी ओट में एक स्त्री का निरंतर फटता कलेजा छिपा रहा. रत्नावली ने लोकलाज के वशीभूत होकर सच क्या कहा कि तुलसी तो लौट ही गए फिर कभी न आने को. कवि ने ‘लाज न आवत आपको’ कविता में इस तथ्य को उभारा है. इसी प्रकार स्त्री मन को बिना समझे उसे रौंदने वाली हमारी अपनी परंपरा का दर्शन कराते ये शब्द हमें सोचने को विवश करते हैं :

“क्या है हमारा धर्म ???/ छोड़ आते रहे हैं हम उन्हें/ बियाबान में/ पंचतत्वों के हवाले,/ गर्भवती होने पर./ चढ़े चले जाते हैं हम/ कुत्तों की जंजीर थामे/ स्वर्ग के सोपान पर,/ छोड़कर उनके एक-एक अंग को/ बर्फ में गलता हुआ./ और जब वे आतीं हैं/ आधी साड़ी में लपेटे हुए/ हमारे अपने बच्चों की लाश को,/ वसूलते रहे हैं हम/ पूरा पूरा टैक्स/ मसान के पहरेदार बनकर/ बची खुची आधी साड़ी से./ और हम/ इसके लिए कतई शर्मिंदा नहीं हैं,/ आखिर यह हमारी परंपरा है -/ गौरवशाली परंपरा !” (परंपरा)

समय साक्षी है कि न्याय, धर्म, नीति और वचन की दुहाई देकर महज अपनी गौरव रक्षा के निमित्त पितृसत्ता ने बारंबार स्त्री की भावनाओं का गला घोंटा है, उन्हें अनदेखा किया है. यह चलन आज भी कायम है. माँ, पत्नी, बहन, बेटी – हर नाम, हर संबोधन छलावा भरा है :

“एक और नाम दिया – वेश्या/ और आरक्षित कर ली अपने लिए/ भूमिका पतितपावन, उद्धारक और मसीहा की/ धकेलते रहने को बार बार मुझे/ उनकी अपनी वासना के नरक में –”. (कई नाम दिए उन्होंने मुझे).

“मैं तुम्हारे निकट आई/ कुछ मांगने नहीं/ कुछ देने भी नहीं/ जीने और चुपचाप बहने/ पता ही नहीं चला/ कब तुम दाता बन बैठे/ और मैं भिखारी/ जीवन बेगार में बदल गया/ बहाव गंदगी झील में/ चुप्पी धीरे धीरे उतरती मौत में”. (निकटता).

जीवन साथी के मध्य ‘भिखारी और दाता’ वाले समीकरण का बनना अस्तित्व हंता से सामना होने जैसा है. यह आज के मुस्काते हुए उन्नत समाज की भीतरी सच्चाई है. स्त्री जीवन का एक और सच भी है, देखें : “नहीं !/ मैं गुडिया नहीं,/ मैं गाय नहीं,/ मैं गुलाम नहीं !!” (गुडिया-गाय-गुलाम). यह सशक्त स्त्री अपनी पारंपरिक छवि को तोड़ती है. वह अपने जीवन के फैसले स्वयं लेना चाहती है. वह बालिग होना चाहती है. इतना ही नहीं पितृसत्ता के लिए वह एक महत्वपूर्ण घोषणा करती है, देखें :

“वे तो जन्म से पुरुष हैं/ फिर उन्होंने आज तक तमाम गलत फैसले क्यों लिए ?/ …उन्हीं के फैसलों ने तो/ धरती को युद्ध और आतंक से भर छोड़ा है !/ …औरतों को उनसे आज भी वैसे ही डरना होता है/ जैसे भेड़ियों और लकड़बग्घों से ? अभी उनका सभ्य होना शेष है.” (मुझे भी बालिग़ होना है..).

एक माँ जो जीवन का हर पल अपनी संतान के लिए न्योछावर कर देती है उसी संतान के लिए माँ का कद जमीन-जाल के सामने बौना हो जाता है. इसी संदर्भ को द्योतित करती “अम्मा,गरज पडै चली आओ चूल्हे की भटियारी !” शीर्षक कविता जिसमें माँ सोचती है, “आज भी जिसका चूल्हा जलाऊँगी वह रोटी दे ही देगा”, बड़ी मार्मिक बन गई है. ‘स्वेच्छाचार’ शीर्षक कविता में स्वतंत्र स्त्री छवि का अंकन मीरा के माध्यम से किया गया है. सशक्तता और स्वतंत्रता आरंभ में भी थी और अब भी है, पर इनमें पूर्णता ही न सध सकी कभी !

‘प्रेम बना रहे’ : इस कृति में कवि की सृजनात्मकता का अब तक अपेक्षाकृत कम चर्चित आयाम प्रकट हुआ है, वह है – प्रेम का आयाम. आक्रोश और अखंडता के कवि की ये प्रेम कविताएँ उनकी भीतरी तरलता और सरलता का पता देती हैं. इस कृति के दो तेलुगु काव्यानुवाद 2013 में हैदराबाद के श्रीसाहिती प्रकाशन एवं चिनुकु प्रकाशन से प्रकाशित हुए हैं. प्रकाशित कृतियों और उनके अनुवादकों के नाम क्रमशः ‘प्रेमा इला सागिपोनी’ (जी. परमेश्वर) और ‘प्रिये चारुशीले’ (भागवतुल हेमलता) हैं.

प्रेम के आवरण में लिपटी हुई ये कविताएँ अनायास ही जीवन की दुखती रगों को टटोल जाती हैं. इनमें कहीं जीवन का वैषम्य उजागर हो रहा है तो कहीं समाज की वर्जनाओं का कच्चा-चिट्ठा खुल रहा है और कहीं जिंदादिली से जीवन जीने की प्रेरणा शामिल है. जिंदगी की सच्चाइयों से सामना कराती इन कविताओं का अंतस प्रेमानुभूतियों से लबालब है. एक अनकहे अहसास को कहने की अपनी चेष्टा में कवि ने स्पष्टोक्ति दी है कि प्रेम को सिर्फ आत्मीयता भरे मन द्वारा महसूसा जा सकता है. जीवन में आत्मीयता की महत्ता को रेखांकित करते कवि के शब्दों से उद्भूत मार्मिक भावाभिव्यंजना यहाँ देखें – “कहीं किसी बटिया पर बैठा/ रोकर दिवस बिता लेता मैं/ तुम न थमाते यदि उँगली तो/ अनगिन शूल चुभा लेता मैं.” (जितना प्यार दिया है तुमने). अकेलेपन के दंश से क्षत-विक्षत हो इंसान या अपने बनाम बेगानों की फ़ौज के मध्य फँसा ; दोनों ही सूरतों में जीवन में प्रेम का आगमन संजीवनी सरिस है. प्रेम ही है जो निराश मन में आशा का संचार करता है और निष्क्रियता को सक्रियता में तब्दील करता है. जीवन की कंटीली राहों को सुमनमय करने वाले साथी का साथ पाकर आश्वस्त हुए ; गहरे संतोष से भरे मन को चित्रित करते हुए कवि कहते हैं – “रक्षा-कवच बना दिया आँचल की छाँव से/ वरना मैं कैसे झेलता दिन-रात हादसे/ पाँव में शूल जो चुभे पलकों से चुन लिए/ वनवास की हर राह में हम साथ-साथ थे.” (जीवन समर).

इस प्रेम को सहेजने-संजोने की मानसी वृत्ति मृत्यु के उपरांत भी जीव के जेहन से नहीं जाती है. इस संग्रह की कविता ‘प्रेतानुभुति’ में एक प्रेत है जो अपने एक मित्र को चैन से सोया देखकर अत्यंत सुखी होता है परंतु अगले ही पल अपने विरह में बेचैन कबूतर के दुःख को देख कर उसका हृदय अधीर और अशांत हो उठता है. प्रेमानुभूति का अप्रतिम उदाहरण ! “धूप चढ़े मेरी खिड़की में चावल चुगने आता कबूतर/ बहुत बेचैन दिखा/ चोंच घायल कर ली थी तस्वीर से टकरा कर,/ मुझे बहुत खराब लगा/ मुझे कभी शांति नहीं मिलेगी ” (प्रेतानुभूति). अपनत्व का यह असीम प्रसार ही प्रेम है. अपनी विस्तृत चौहद्दी में समग्र ब्रह्मांड को अटा सकने की कूवत रखनेवाला प्रेम किसी सीमित दायरे का नाम नहीं है. हर किस्म के द्वैत से बेसुध यह प्रेम एक दूजे में परस्पर घुल-मिलकर एक होने का नाम है. इसी आशय से कवि कहते हैं – “गंगो-जमन से/ एक धार बन गए थे./ घुल गया/ तुम्हारे गौर वर्ण में/ मेरे कंठ का सारा नीलापन/ उतर आया/ हमारे भीतर आकाश का विस्तार” (संगम). ‘प्रेम’ जीवन के उस पायदान का आरंभिक बिंदु है जहाँ से ‘तेरा-मेरा’ वाली बेतुकी मानसिकता से इंसान स्वयं को मुक्त महसूस करता है. यही वह चैतन्य स्वातंत्र्य है जिसे आत्मा मुक्ति मानती है, सिर्फ महसूस की जा सकनेवाली मुक्ति ! द्रष्टव्य है – “और फिर से/ चेतना/ कैद हो जाये/ पोथियों के बीच !/ मुझे प्रतीक्षा है/ तुम्हारे संकेत की/ इससे पहले कि/ मर जाए हमारी मुक्ति/ या/ मिट जाए/ प्यार का ढाई आखर …” (पोथी पढि पढि जग मुआ).

बदलते समय के साथ चीजों के मायने बदल रहे हैं. कृत्रिमता की शौक़ीन बनती इस दुनिया से निरंतर लुप्त होती आत्मीयता से और पनपती अपरिचितता से उभरते दुनियावी कोलाहल में भरते सन्नाटे का चित्रण द्रष्टव्य है – “पी मन का सब अँधेर ले, वह गाँव खो गया./ आँसू सभी सकेर ले, वह गाँव खो गया./ यह ठीक है कि अब हमें, बँगले पुकारते/ बटिया में कभी टेर ले वह गाँव खो गया.” (वह गाँव खो गया).

वस्तुतः इस विषम स्थिति के लिए एक विकल्प की सृष्टि करने के उद्देश्य से ही कवि कल्पतरु उगाने की बात करते हैं, द्रष्टव्य है – “अब उगानी है फसल/ जो सृष्टि बनकर/ लहलहाए/ और भर दे/ सब दिशाएँ/ प्राणरक्षक वायुओं से.” (रोपता हूँ बीज तुममें).

गाँव से शहर की ओर की दौड़ में शामिल मनुष्य के अहसास को शब्दबद्ध करते हुए कवि माटी और मीत से बिछुडन की टीस और कसक का भी अहसास करा जाते हैं. “गोबर सनी हथेली की/ इस छाप का क्या करूँ/ जिसका रंग/ पीठ पर/ दिन-दिन गहराता जाता है !” (गोबर की छाप ). जहाँ एक ओर दूर रहने वालों को भी परस्पर जुड़ाव का अहसास दिलाता है प्रेम, वहीं दूसरी ओर प्रेम में साथी की बेरुखी असहनीय वेदना का कारण बन जाती है जो प्रायः सृजन के रूप में साकार होती है. द्रष्टव्य है – “जब सुपरिचित उष्ण स्पर्शों से बने अनजान तुम/ कुछ पिराते छंद उस पल, प्राण की खातिर लिखे” (अधूरी तृप्ति). अपनी ‘स्पर्श’ कविता में कवि ने स्पष्ट किया है कि प्रेम का अर्थ त्वचा के स्तर का संबंध नहीं है, यह संवेदना के स्तर पर आपसी पहचान और आत्मिक मिलन का नाम है. कभी-कभी उन्माद के क्षणों में अतिशय भावातिरेक के कारण ऐसा हो जाता है कि इंसान ‘कृपा’ जैसे भावों को भी प्रेम समझ लेता है और इस भुलावे में वह प्रिय के कृपा-कटाक्ष से भी हाथ धो बैठता है. प्रेम में प्रिय की घृणा भी सहर्ष स्वीकार्य है. आत्मदान की यह साधना बनी रहे और बना रहे यह प्रेम जिसमें संसार की समस्त समस्यायों को धराशायी करने का सामर्थ्य है.

‘सूँ साँ माणस गंध’ : यह संग्रह मनुष्य जीवन के प्रत्यक्ष व परोक्ष अनुभव से जुड़े विविध पलों और घटनाओं का जीवंत काव्यात्मक शब्द चित्र है. यहाँ जीवन से प्रायः विनष्ट हो रही लोकरीतियों एवं लोकमूल्यों की ओर ध्यान आकृष्ट करने वाली कविताओं की बहुतायत के साथ ही मनुष्यता को रौंदती तमाम दुरभिसंधियों के प्रति ललकार की ध्वनि वाली कविताएँ भी हैं. ‘इस कृति का केंद्रीय कथ्य मनुष्यता की शाश्वत गंध, लोकतंत्र और सृजन की बेचैनी है. इन कविताओं को काव्य सौष्ठव की दृष्टि से श्रेष्ठ रचनाओं की पंक्ति में रखा जा सकता है. मृत्यु और रचना प्रक्रिया से संबंधित कविताएँ इस संग्रह की विशेष उपलब्धि हैं.’ (प्रो.दिलीप सिंह). ‘हर पीढ़ी को अपनी आवाज बुलंद करने वाला एक कलमकार चाहिए और ऋषभदेव शर्मा ऐसे ही कलमकार हैं. इस संग्रह की कविताएँ आज के आतंक ग्रस्त माहौल में जलती हुई मशाल सी हैं.’ (गुरुदयाल अग्रवाल). आतंकियों के अंध उन्माद की भेंट सदा निहत्थे और निरीह मनुष्य ही तो चढ़ते हैं और जीते भी हैं तो दहशत में ही. अब इस दहशत से आँख मिलाकर उसके बढ़ते कदम को रोकने की बारी है. लोकतंत्र की रक्षा के निमित्त, शांति और सह-अस्तित्व के निमित्त ; डर की बेतहाशा दौड़ और प्रभुओं के शक्तिहीन सामर्थ्य पर एक अंकुश लगाने के लिए प्रतिबद्ध हुआ ‘आम आदमी’ कहता है, देखें –

“तुम्हारी हिट-लिस्ट का/ एक नाम-रूप-हीन निशाना हूँ./ हर दिशा में मेरा पीछा कर रही है/ तुम्हारी आर डी एक्स की दैत्याकार आँख -/ सूंघती हुई बारूदी नथुनों से/ ‘सूँ साँ माणस गंध’/ लगातार दौड़ रहा हूँ मैं/ ….लो,/ दौड़ना छोड़कर आ खड़ा हुआ हूँ/ तुम्हारे सामने/ निर्णायक युद्ध में,/ क्योंकि अर्थहीन हो गए हैं./ वे सारे देवता/ जिन्होंने लिया था भार भारत का,/ लोकतंत्र के योगक्षेम का,/…. मेरे और तुम्हारे इस युद्ध में …/ प्रासंगिक है तो केवल/ तुम्हारा आसुरी उन्माद,/ प्रभुओं की नपुंसकता/ और मेरे अभिमन्युपन की/ शाश्वत माणस गंध !!!” (सूँ साँ माणस गंध).

मत्स्य, कूर्म, वराह, वामन, परशुराम, राम, कृष्ण, बुद्ध, कल्कि इत्यादि अवतार केंद्रित ‘संभवामि युगे युगे’ शीर्षक कविता भी युगीन सत्य को अभिव्यंजित करती हुई मानवता के पथ को आलोकित और प्रशस्त करने वाली हैं. कवि स्पष्ट कहते हैं कि ‘युग प्रवर्तन’ का हेतु महज अवतार की दिव्य शक्तियां नहीं हैं, यह यौवन की जीवटता से ही हर युग में संभव हुआ है. उन्नति के चरमोत्कर्ष के समक्ष जब मनुष्यता एकदम बौनी हो जाती है और बर्बरता निभाने की रीति अति सभ्य होने की निशानी बन जाती है, और जनसाधारण खोने लगती है प्रतिकार की शक्ति तब यौवन आता है हारे मन में जीत का मंत्र फूँकने. वह जीतता है. जीने की राह प्रशस्त करता है और जतला जाता है चुपचाप शोषण सहना अपने अस्तित्व का आप ही अपमान करना है. वह आत्मबल के साथ जीवन के चिरंतन सत्यों का साक्षात्कार कराता है. जीवन के खोखलेपन से निजात पाने के लिए इन सचों को जानना बेहद जरुरी है जिनसे नई पीढ़ी को जोड़ने की कोई कोशिश नहीं की जाती है. अपने शब्दों से कवि नव पीढ़ी में बदलाव लाने का साहस भी भरते हैं और आशा भी जतलाते हैं, देखें – “जब कभी पुरातन पीढ़ी/ हाथों में पहन-पहन चूड़ी/ सत्ता की अंतरंग सखी बनकर/ अंतःपुर में/ शासन के चरण चाँपने लगती है ./ तब नव पीढ़ी के बौने बीजों से/ महाविराट अक्षयवट की/ सृष्टि हुआ करती है :.” (वामन, संभवामि युगे युगे) . “सावधान !/ मुक्त घूमते विनाशी नथुनों !/ सावधान !/ तुम्हें नाथने को यौवन आता है !!/ यौवन आ रहा है !!!” (कल्कि)

सृजन करना अपने आप को खोजने जैसा है. यह संसार ईश्वर की सृष्टि है जिसे बारंबार अनुभूत करके मनुष्य कुछ रचता है ठीक वैसा ही जैसा अपने मन में वह बसा पाता है, देखें – “अभिव्यक्ति की इच्छा/ सृजन की चाह/ अपनी अस्मिता की खोज है केवल”. (सृजन के पल)| मनुष्य के सृजनकर्म के साथ ही मानव जीवन के कई गूढ़ पक्ष और देश-दुनिया की दशाएं इस संग्रह में कविता के माध्यम से उद्घाटित हुए हैं. “भाषाहीन” शीर्षक कविता तो बेहद मर्मस्पर्शी है.

तेवरी काव्य आंदोलन : तेवरी, तरकश, धुप ने कविता लिखी है : हिंदी साहित्य की नव्यतम काव्यधारा तेवरी का प्रवर्तन 11 जनवरी 1981 को ऋषभदेव शर्मा ने कुछ मित्रों के साथ मिलकर किया. इसके एक वर्ष बाद इनके प्रथम तेवरी संग्रह ‘तेवरी (देवराज, ऋषभ)’ का प्रकाशन जून 1982 में हुआ. इस संग्रह की एक तेवरी यहाँ उद्धृत है, देखें – “हमलावर शेरों को चिंता में डाला है/ हिरनी की आँखों में प्रतिशोधी ज्वाला है/ सागर में ज्वार उठें, लहरें तेवर बदलें/ अवतरित हो रही जो यह जागृति-बाला है.” (हमलावर शेरों को चिंता में डाला है). इसी संग्रह के प्रकाशन के साथ ‘तेवरी’ की आधिकारिक घोषणा भी कर दी गई. इससे पहले जनवरी 1982 में तेवरी काव्यान्दोलन का घोषणापत्र जारी किया जा चुका था जिसके लेखक ‘डॉ. देवराज’ हैं. सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, धार्मिक, वैयक्तिक एवं अन्य परिस्थितिजन्य स्तर जहाँ कहीं मानवता पर संकट की संभावना है – तेवरी काव्यधारा में उसके लिए प्रतिरोध का स्वर उपस्थित है. अमेरिकन कांग्रेस की लाइब्रेरी के कैटेलॉग में इसे ‘पोएट्री ऑफ़ प्रोटेस्ट’ कहा गया है. इसकी शिल्पगत विशिष्टता यह है कि इसे किसी भी छंद में लिखा जा सकता है. तेवरी का छंद सम-पंक्तियों में तुकांत होता है. यह शिल्प-मुक्ति का आंदोलन भी है. यहाँ गीत और गजल परस्पर अपने-अपने शिल्प से मुक्त हैं. यहाँ प्रयुक्त भाषा सहज प्रवाहमय, संप्रेषणीय और तेवरदार है. सामंती मनोवृत्ति से इतर नए अर्थों में प्रयुक्त आम जीवन और जगत से सीधे उठाए गए प्रतीक और बिंब तेवरी के तेवर को बरक़रार रख कर इस जागृति आंदोलन में विशिष्ट भूमिका अदा कर रहे हैं. राजनैतिक कविता के उन्नायकों में से एक माने जाने वाले वेणुगोपाल ने तेवरी संग्रह ‘तरकश’ की ‘स्वतंत्र वार्ता’ में प्रकाशित समीक्षा में स्पष्ट किया था कि तेवरी मुख्यतः व्यंग्य की विधा है और व्यंजनाप्रधान है इसलिए उसकी जो सरलता है वह इस व्यंजना के साथ मिलकर चोट देने वाली अभिव्यक्ति का रूप लेती है. प्रस्तुत है इस संग्रह से यथार्थ की एक तेवरदार अभिव्यक्ति – “जनता के मुँह पर अंगारे, वर्दी वालों ने मारे/ कुर्सी वालों का कहना है, इसकी जांच नहीं होगी/ सरकारी मिल में कुछ ईंधन ऐसा ढाला जायेगा/ चमक-दमक तो लूक लपट सी लेकिन आंच नहीं होगी/ नाच रहा कानून जुर्म की महफ़िल में मदिरा पीकर/ उन्हें बता तो : किंतु दुपहरी तम की दास नहीं होगी ”|(गलियों की आवाज आम है माना खास नहीं होगी).

ऋषभ की सर्वश्रेष्ठ तेवरियाँ तेवरी संग्रह ‘धूप ने कविता लिखी है’ में संग्रहीत है. इसकी भूमिका में प्रो. देवराज लिखते हैं, “ ‘धूप ने कविता लिखी है’ की तेवरियाँ मुझे इस अहसास के सामने लाकर खड़ा करती हैं. इनकी आंच को मेरे लिए सहना कठिन है. ये कभी भी, कहीं भी जला सकती हैं. किसी भी बिंदु पर असहज कर देनेवाले सवालों के दायरे निर्मित करके मुझे उनके भीतर खींच सकती हैं. …आप भी इनके आसान शिकार बन सकते हैं,..”. आगे उद्धृत सभी तेवरियाँ इसी संग्रह से ली गई हैं. वास्तव में तेवरीकार ‘प्रकाश प्रहरी’ हैं जो एक नई क्रांति की आवश्यकता जताते हुए कपनी कलम शक्ति से एक विराट परिवर्तन चाहते हैं – मानवता के हित में, देश के हित में, समाज के हित में और विश्व बन्धुत्व के हित में !

“परखनली में नेता भरकर कब से यह जनता बैठी/ कुर्सी पर पधरे लोगों ने बहुत गुप्त व्यापार किया/ विश्वासों के हत्यारों को जीने का अधिकार नहीं/ यही फकीरा ने सोचा है जितनी बार विचार किया/ लोकद्रोह के सब षड्यंत्रों के हम शीश तराशेंगे/ लोकतंत्र की सान चढ़ाकर शब्द-शब्द हथियार किया.” (माला-टोपी ने मिल करके कुछ ऐसा उपचार किया).

कवि अपनी तेवरियों में स्पष्ट कहते हैं कि जो भूमि पर गिरेगा उसे भीड़ न उठाएगी, न ही उठ कर संभलने का मौका देगी. इसलिए सच के पक्ष में डट कर खड़ा होना ही श्रेयस्कर है. पर लोकतंत्र में चुनाव की स्वतंत्रता भी है. चयन अपना-अपना – स्वाभिमान या दुत्कार ! अलगाव या एकता ! विश्वास या अविश्वास! सत्य और भ्रम के मध्य आँख खोलकर चुनना है. धर्म, जाति, संप्रदाय, भाषा और न जाने कितने गढ़ों का निर्माण अपनी तुच्छ स्वार्थपूर्ति हित महत्वाकांक्षी और वोट के भूखे लोगों द्वारा किया गया है. देखें : “मस्जिद में अल्लाह न बोला , राम न मंदिर में डोला/ खून किया धर्मों ने अपना, आज शहर में कर्फ्यू है/ संप्रदाय की मदिरा पीकर, आदम आदमखोर हुआ/ छाया पर विश्वास न करना, आज शहर में कर्फ्यू है/ नोट-वोट का शासन बोले, अलगावों की ही भाषा/ इस भाषा को हमें बदलना, आज शहर में कर्फ्यू है”/ (घर से बाहर नहीं निकलना आज शहर में कर्फ्यू है ).

इस नोट- वोट की कुचाल से उबरने का आगाज करती हैं तेवरियाँ. प्रेमचंद का होरी, धनिया, झुनिया, गोबर इन तेवरियों में भी जीवित हैं. देखें : “गोबर कहता है – संसद को और नहीं बनना दूकान/ परचों पर अब नहीं लगेंगे, आँख मूंदकर और निशान” (गाँव गाँव से खबर मिल रही सुनियो पंचो देकर ध्यान ).

जनता का सेवक बन सत्ता में जाने वालों और उनके सहायक-तंत्र की संवेदनहीनता अपने चरम पर है. हर साल लोग बाढ़ की यंत्रणा झेलते हैं, सम्मानित शासकीय लोग कभी सरकारी तो कभी निजी विमानों में बैठ आपदाग्रस्त इलाकों का दर्शन कर लेते हैं. आश्वासन दे चले जाते हैं और अगले वर्ष फिर सामान्य जनता तबाही का सामना करती है किसी ठोस और असरकारी कदम के अभाव में. देखें : “खील बताशों का क्या कहिए, चना चबेना के लाले हैं/ उनका भोजन मुगलाई है, बाकी सब कुछ ठीक ठाक है/ डूब रहा नेल्लूर, महोदय, वायुयान से देख गए हैं/ बाढ़ प्रकाशम में आई है, बाकी सब कुछ ठीक ठाक है/ घोर तबाही चक्रवात में, टूट गए घर, खेत बह गए/ उनसे मेंढ़ न बंध पाई है, बाकी सब कुछ ठीक ठाक है” ( केवल कुर्सी पगलाई है, बाकी सब कुछ ठीक ठाक है ).

ऐसे विकलांग नायकों और संवेदनहीन व्यवस्था के प्रति तेवरी में मानवता के हित में मुखर प्रतिरोध है. दलितों और शोषितों के हित में यहाँ पूंजीवादी व्यवस्था से भी विरोध है. गरीब आदमी अपने बच्चों का कंकाल देख मन मसोसता है कि अपना रक्त और अपनी हड्डी गलाकर भी वह अपनी जरूरत नहीं पूरा कर पाता है और अमीरों के पालतू जानवरों के शौक पूरे हो रहे हैं. रक्तजीवियों के यहाँ सुविधा है, उल्लास है, पर्व की रौनक है और गरीब सपरिवार चिथड़ों की शरण में है.

सारा बवाल रोटियों का है. किसी के पास रोटी का एक टुकड़ा भी नहीं है और किसी ने अपनी सात पुश्तों के लिए रोटियों का इंतजाम अभी से कर रखा है. भाव और अभाव के सामाजिक द्वंद यज्ञ में बलिपशु कौन ? मानव और मानवता ही ना ! आदमी का वजन अब हवा से भी हल्का हो गया है, देखें – “ ‘कल धमाके में मरा जो, कौन था ?’ पूछा जभी/ यों सुबह बोली सहम कर, ‘एक भोला आदमी’/ हो गया साबित बहुत हल्का सभी के सामने/ यार ! जब सच की तुला में आज तोला आदमी”. (‘कल धमाके में मरा जो, कौन था ?’ पूछा जभी). संकट के इस घेरे में मनुष्य के अस्तित्व के साथ उसकी भाषाएँ और संस्कृति भी हैं. चतुर्दिक संकट की यह घड़ी और इससे जूझने को तैयार खड़ा आज का ‘हरिया’ साथ ही वे सारी गलियाँ जिनपर ‘आम’ होने का लेबल लगा है और वे सारे लोग जिनके रक्त-मांस और अस्थि को चूसा गया है किस कदर विराट एकता का परिचायक बनकर यह जनशक्ति मुखौटाधारियों का मुखौटा नोच सकने को उद्दयत और सक्षम है, देखें – “दरोगा ने दारु पीकर, दंगे वाले किये बरी/ ठाकुर के बेटे ने फूंकी, फूलमतिया की खोली है/ खद्दर की टोपी वालों के, चाँदी वाले चाकू से/ कट न सकेगी, हरिया कहता, सिली जीभ अब खोली है/ खंजर ले कर नाच रही है, सौदागर की महफिल में/ बापू की बेटी जवान है, पर न समझना भोली है /..गली कह रही गोलमहल से, पिचकारी में गोली है/ …रंगमंच की ओर बढ़ रही, मस्तानों की टोली है.” (होली है भइ होली है भइ रंग बिरंगी होली है).

लोकतंत्र की लंका में हावी चतुर्दिक आशंका, अविश्वास, मूल्यहीनता, चाटुकारिता, अवसरवादिता, अफसरशाही, पूंजीवादी तानाशाही और इन सबकी उपज जन के मन का घोर भय – उस भयाक्रांतता और उसके समस्त कारणों के अंतकामी अग्निधर्मा तेवरियाँ “धूप ने कविता लिखी है” तेवरी संग्रह में हैं. व्यर्थ की नारेबाजी की जगह ठोस हल खोजने की जरूरत की ओर हमारा ध्यान खींचती हुई तेवरी में धार्मिक उन्माद का भी विरोध है. तकनीकी उन्नति के दौर में अपने कुदाल-फावड़े के संग अपने को पिछड़ा महसूस करते हुए वे किसान हैं जो हमारे लिए अन्न उपजाते हैं. इस खाई का प्रतिरोध और समन्वय की कवायद जो आम आदमी के अस्तित्व रक्षण हित में है, यहाँ स्पष्ट उजागर हुई है.

काव्यभाषागत विशिष्टता : “सीधी, सरल और हृदयग्राही भाषा में लोक संवेदना की अभिव्यक्ति ; व्यंग्यपूर्ण लहजे और तीखे-तेवर के साथ सामाजिक विद्रूपताओं पर प्रहार तथा प्रतीकों, बिंबों, मुहावरों और लोकोक्तियों के अभिनव प्रयोग से कवि ऋषभदेव शर्मा की काव्यभाषा की जीवंतता नित्य नूतन उत्कर्ष पर है. लोककथा और पौराणिक-मिथकीय संदर्भों के साथ ही लोक भाषा के प्रयोग से कविता की सहज संप्रेषणीयता बढ़ी है. ‘ऋषभ संप्रेषणीयता को अगर कविता का मूल धर्म मानते हैं तो अपने लेखन में इसका निर्वाह भी करते हैं. उनकी रचनाएँ समय के अनुरूप हैं और उनके शब्द भावों के अनुरूप. यही गुण उनके काव्य संसार को निराला की त्रि-आयामी कसौटी पर खरा सिद्ध करता है : (आदर्श कविता वह है) जिसमें कविता का स्वाभाविक प्रवाह, कल्पना की उन्मुक्त गति और स्वतः स्फूर्त भाव गुंथे हुए हों.” (प्रो. दिलीप सिंह). तेवरी के विशेष संदर्भ में “ऋषभ के इस पूरे पाठ में वाग्वैदग्ध्य (विट), वक्रोक्ति (आयरनी), और व्यंग्य (सटायर) का फिंटा भाषारूप बनता-रचता रहता है. उनके शरारतपूर्ण सहसंयोजन में मात्र आक्रामकता नहीं है, उन्होंने अपने व्यंग्य को नया सामाजिक आशय भी दिया है इसीलिए वह गंभीर है और उसमें जीवित भाषा की गरमाई है. उन्होंने जनभाषा और साहित्यिक भाषा का भेद मिटा दिया है.”[वही]. प्रायः जो लयात्मकता छंदबद्ध कविताओं में दिखाई देती है, इनकी छंदमुक्त कविताएँ भी एक रागात्मकता से युक्त प्रतीत होती हैं. सामाजिक, मानसिक विसंगतियों को उभारने के क्रम में कवि की भाषाई दक्षता अपने चरम पर मालूम पड़ती है. डॉ. राधेश्याम शुक्ल के अनुसार ‘कवि की समग्र काव्ययात्रा रचनाधर्म के निर्वाह की दृष्टि से भारतीयता और लोकचेतना से अनुप्राणित है’. कुल मिलकर, कवि ऋषभदेव शर्मा का काव्य संसार अपने आप में वैविध्यपूर्ण और मानवीयता के ठोस धरातल की एक सार्थक खोज है. माटी की सोंधी गंध और भारतीय संस्कृति की परिचायक होने के साथ-साथ उनकी कविताएँ लोकतांत्रिक हित-रक्षण की प्रतिध्वनि जान पड़ती हैं.

संदर्भ ग्रंथ :

· शर्मा, डॉ.ऋषभदेव, तेवरी, 1982, खतौली : तेवरी प्रकाशन

· वही, तरकश, 1996, खतौली : तेवरी प्रकाशन

· वही, ताकि सनद रहे, 2002, खतौली : तेवरी प्रकाशन

· वही, देहरी, 2011, नई दिल्ली : अकादमिक प्रतिभा

· वही, प्रेम बना रहे, 2012, नई दिल्ली : अकादमिक प्रतिभा

· वही, सूँ साँ माणस गंध, 2013, हैदराबाद : श्रीसाहिती प्रकाशन

· वही, धूप ने कविता लिखी है, 2014, हैदराबाद : श्रीसाहिती प्रकाशन

· सिंह, डॉ. विजेंद्र प्रताप, ऋषभदेव शर्मा का कविकर्म, 2015, नजीबाबाद : परिलेख प्रकाशन

-डॉ. चंदन कुमारी

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