एक कहानी मैं कहूं/डा. वीरेंद्र पुष्पक

मैं एक शादी में जानसठ गया था। शादी मेरी पत्नी की भांजी की लड़की की थी। मेरे साथ मेरा बेटा शोभित और प्रियांशी भी थी। मंडप में थोड़ा पहले पहुँच गए हम लोग। पहुंचने पर दामाद ने दिल से स्वागत किया। लोगो से मुलाकातें हुईं। कुछ देर बाद मैं एक कुर्सी पर बैठ कर अपने समधी, दामाद, बेटी और धेवती आदि का इंतजार कर रहा था।

अचानक मुझे एक घटना की याद आ गयी। घटना किसी फिल्म की तरह मेरे सामने आने लगी। एक शादी ही में जा रहा था मैं। तब मेरी पत्नी भी साथ थी, शायद ये 26 वर्ष पहले की घटना होगी। सोनू मोनू गुड़िया तब बहुत छोटे थे। हां मिन्नी तो शायद दो माह की रही होगी । पत्नी की गोद मे थी। हमें झबरेड़ा जाना था एक शादी में।

अपने नगर से हम स्यालदा एक्सप्रेस से रुड़की के लिए चले। रुड़की पहुंचते पहुंचते ट्रेन दो घंटे लेट हो गयी। रुड़की स्टेशन पर पता चला कि शाम को सात बजे मुजफरनगर के लिए आखरी बस जाती है। जिससे हम नारसन उतर कर वहां से झबरेड़ा के लिए बस पकड़ सकते हैं। रुड़की रेलवे स्टेशन पर उतरते ही हमने जल्दी से रिक्शा की और बस अड्डे के लिए चल पड़े। रेलवे स्टेशन से बस अड्डा लगभग 3 किलोमीटर की दूरी पर है। बस अड्डे तक पहुंचते पहुंचते हमे रात होने लगी।

बस अड्डे पहुंचकर पता चला कि यहां से इस समय झरबेड़ा के लिए कोई बस नहीं जाती है। मुज्जफरनगर के लिए भी आखिरी बस शाम को जाती है। लोगो ने बताया कि रास्ते मे लूट आदि की घटनाएं अधिक होती हैं। इस लिए इस रूट पर शाम के बाद कोई वाहन नहीं चलता है। बड़ी असमंजस की स्थिति थी। मन मे सैकड़ो ख्याल आया रहे थे। इस से अच्छा तो ये था कि हम रेलवे स्टेशन पर ही रात्रि में रुक जाते और सुबह बस अड्डे आते।
खैर अब तो हम बस अड्डे पर आ ही गए थे। बस अड्डे पर न बैठने की जगह थी। न ही कहीं अन्य जगह पर कोई बैठने आदि की जगह ही थी। मेरी पत्नी, मेरी 16 वर्ष की बहन लाली, सातआठ वर्ष के तीन सोनू, मोनू, गुड़िया और दो माह की एक मिनी, और मेरी पत्नी के मामा का 11 वर्ष का लड़का बिटू साथ में, अनजान जगह, अब कहां जाएं समस्या थी। रुड़की में कोई जानपहचान भी नहीं थी। बच्चों के साथ सड़क पर खड़े सोच रहा था। क्या वापस रेलवे स्टेशन जाएं या किसी होटल में ठहरा जाए समझ मे नहीं आ रहा था।

मैं शायद कुछ अधिक ही इरिटेट हो गया था। इधर बच्चे परेशान हो रहे थे। किसी को भूख लगी थी। किसी को टॉयलेट जाना था। बेहद परेशान था अपनी परेशानी की खीज मिटाने के लिए अपनी पत्नी को शादी में आने के लिए ताने दे रहा था। और पत्नी बेचारी हर ताने पर चुप, निरीह गाय सी, जैसे स्वीकार कर रही थी कि हां गलती हो गयी।

‌आखिर श्रीमती जी ने एक सुझाव दिया कि क्यों न हम किसी वाहन से मंगलोर चले जाएं। वहां उसके कोई रिस्तेदार रहते थे। बाजार के बीच सड़क पर इसी कसमकश में खड़े हुए ये तय किया कि चलो मंगलोर ही चलते हैं, लेकिन तब तक रात के दस बज चुके थे । बाजार भी बंद हो रहा था। कोई वाहन नहीं था बस कुछ ट्रक आदि आ जा रहे थे। रात में दो महिलाएं व बच्चों के साथ ट्रक में जाने का तो सवाल ही नही था।

समय धीरे धीरे बढ़ता ही जा रहा था। रात गहराने लगी थी। अब तो ऐसी दशा की वापस रेलवे स्टेशन भी नहीं जा सकते थे। क्योंकि तीन किलोमीटर का सुनसान रास्ता था जंगल मे से होकर रेलवे स्टेशन जाना वो भी शादी में जा रही महिलाओं जो अपने कपड़ों और आभूषणों थीं और बच्चों के साथ बड़ा रिस्की था।

अंत में निर्णय किया कि जब ट्रक में जाना और अंधेरे जंगल के रास्ते से रेलवे स्टेशन दोनो में ही बराबर रिस्क है तो क्यों न किसी ट्रक में ही सवार होकर मंगलोर ही जाया जाए। मंगलोर जाकर किसी से मालूम करते हुए पत्नी के रिस्तेदार के घर पहुँच ही जायेंगे। कम से कम रात सुरक्षित गुजर जाएगी।

जी पक्का करके मैं सपरिवार सड़क पर खड़े होकर मंगलोर की ओर जाते वाहनों को देख रहा था तभी एक ट्रक मेरे पास आकर रुका। जिस में पत्थर भरे थे। ट्रक का ड्राइवर बेहद नशे में था। शराब की बदबू दूर से ही उसके मुंह से आ रही थी। उसने मुझ से पूछा सर,चल रहे हैं। ट्रक किनारे पर रोक कर नीचे उतर कर आया। उसने मुझसे मालूम किया कि आजकल कहाँ हैं। आज तो परिवार के साथ हैं। शायद वो मुझे कोई और समझ रहा हो। उसके मुंह से आ रही बदबू के कारण मैं उससे बात करना तो नहीं चाहता था। लेकिन मेरे पास उस समय कोई दूसरा विकल्प भी नहीं था। अतः मैंने ट्रक ड्राइवर से कहा कि मुझे जाना तो झबरेड़ा है। लेकिन इस समय कोई वाहन नहीं है। इस लिए हम मंगलोर तक चलेंगे वहां किसी के यहां रुक जाएंगे। ड्राइवर ने मुझे बताया कि उसके ट्रक में पत्थर हैं। जिन्हें लेकर वह मुजफ्फरनगर जा रहा। रास्ते मे उसे खाना खाने के लिए भी रुकना है। नारसन के पास उसका गांव है। इसलिए वो नारसन में अपना ट्रक खड़ा करके अपने गांव जाकर सो जाएगा। उसने मुझे आश्वस्त करते हुए कहा कि साहब मैं आपको झरबेड़ा तक पहुचा दूंगा चाहे मुझे नारसन से ट्रक लेकर ही जाना पड़े।

उसने अपने परिचालक को आगे से उतरकर पीछे की भेज दिया। मुझे, मेरी पत्नी, मेरी बहन, तथा मिनी को आगे की सीट पर बैठा दिया। आगे और जगह न होने के कारण सोनू, मोनू, गुड़िया, को पीछे पत्थरों पर बैठ दिया। बिटू उपर बैठ गया। हमारे पास ट्रक में बैठने के अलावा कोई विकल्प था ही नहीं। मन में हजारों विचार आ रहे थे। मैं ड्राइवर की पास वाली सीट पर बैठा था। ड्राइवर के मुंह से शराब की इतनी बदबू आ रही थी कि मुझसे वर्दाश्त तक नहीं हो रही थी। मन मे ख्याल आया रहे थे कि कैसे ट्रक ड्राइवर अकेले सवारी और महिला के साथ होने पर घटनाएं करते हैं। हजारों किस्से सुन रखे थे। पत्रकार होने के नाते अनेक किस्से तो मेरे द्वारा ही समाचार बने।

इस सब के बावजूद मैं ट्रक में था। वो शराबी ट्रक ड्राइवर बड़ा सम्मान दे रहा था। मुझे लग रहा था कि ये ऐसी मीठी मीठी बातें करके मुझे बलि का बकरा बना रहा है। जैसे ही रुड़की बस्ती से दूर हम जंगल मे पहुंचेगे ये मेरा और बच्चों का काम तमाम कर मेरी पत्नी और मेरी किशोर बहन के साथ न जाने क्या क्या करेंगे। ऊपर से मेरी पत्नी गले कान नाक आदि में सोने के जेवर पहने है।

ट्रक चलता रहा। ड्राइवर मुझसे बात करता रहा और मैं मन ही मन प्रभु को याद करता रहा। अपनी सपरिवार कुशलता की दुआएं करता रहा। ट्रक ड्राइवर ने कहीं ट्रक नहीं रोका। न उसने रास्ते में कहीं खाना ही खाया। पत्थर से भरा लोडेड ट्रक था। रफ्तर 35 किलोमीटर की रही होगी। रात बढ़ती जा रही थी। अब तो ये आस भी खत्म होने लगी थी कि मंगलोर में रुक जाएंगे। क्योंकि रात इतनी अधिक हो गयी थी कि रास्ते की सभी दुकाने बंद हो गयी थी। अब समस्या ये थी कि पत्नी के रिस्तेदार का घर उसे मालूम नहीं था। रिस्तेदार का शायद टैंट हाउस का काम करते हों।

जब ट्रक मंगलोर पहुंचा पूरा बाजार बंद था। पान बीड़ी चाय आदि की दुकान तक बंद थी। दूर तक कोई आदमी दिखाई नहीं दे रहा था। मैं सोच ही रहा था कि जब सड़क पर कोई है नहीं तो हम मालूम किस से करेंगे कि ट्रक ड्राइवर ने कहा कि अब आपका मंगलोर उतरना ठीक नहीं होगा। आप मेरे ट्रक से नारसन चलो। हो सकता है वहां से कोई वाहन मिल जाये। कोई चारा भी नहीं था। लेकिन तब ये लग रहा था कि अब ट्रक ड्राइवर अपने एरिया में आ गया है। अब खतरा बढ़ गया है। कभी भी कहीं भी कुछ हो सकता है। लेकिन अब तो कोई और रास्ता भी दिखाई नहीं दे रहा था। मुझे ट्रक ड्राइवर से कहना ही पड़ा कि चलो नारसन ही चलो। वहां मुझे किसी पुलिस चौकी पर उतर देना। वहां चौकी इंचार्ज को कहकर किसी वाहन का इंतजाम करा लिया जाएगा।

ट्रक चालक ट्रक लेकर चल पड़ा। रास्ते भर वो इस रास्ते पर होने वाली घटनाओं के किस्से सुनता चल रहा था। कैसे लोगो को लूटा जाता है। महिलाओं की इज्जत लूट कर बेरहमी से हत्या कर दी जाती है। रात को नारसन से झबरेड़ा जाने वाली बसों में भी लूट की जाती है। अंधेरी रात ट्रक की धीमी चाल सड़क सुनसान। हम ट्रक में बैठे दिल अंदर ही अंदर बैठने को तैयार। रास्ते भर ट्रक ड्राइवर मीठी मीठी बातें करता जा रहा था।

मैं समझ रहा था जैसे बलि से पहले बकरे को खिलाया पिलाया जाता है। ट्रक ड्राइवर भी मुझे फंसा रहा है। कब नारसन की पुलिस चौकी भी पीछे रह गयी पता ही नहीं चला। मेरे लिए तो नया रास्ता था। लेकिन ट्रक ड्राइवर को तो पुलिस चौकी का पता था। फिर भी उसने चौकी पर ट्रक नहीं रोका। शायद उसकी नियत में खोट था। खैर अब तो कुछ किया ही नहीं जा सकता था। धीरे धीरे चलता हुआ ट्रक नारसन आ कर रुका। ट्रक ड्राइवर ने बताया कि अगर रात में आपके जाने की कोई व्यवस्था नहीं हुई तो वह हमें अपने गांव अपने घर ले जायेगा। जहां रात को रुक कर सुबह झरबेड़ा की बस पकड़ लेना।

रात के साढ़े बारह बज चुके थे। नारसन में प्राइवेट बस अड्डे पर 50 से अधिक प्राइवेट बसे खड़ी थीं । दो तीन खाने के होटल खुले थे। होटल के सामने चारपाइयों पर ड्राइवर कंडेक्टर क्लीनर मिस्त्री आदि बैठे हुए मौज मस्ती कर रहे थे। कहीं दारू चल रही थी कहीं सल्फा गांजा के दम लगाए जा रहे थे । मैं मेरी पत्नी बहन बच्चे ट्रक से नीचे उतरे। माहौल इतना डरावना था कि दिल अंदर से बैठने को तैयार हो रहा था। बस आज बचना मुश्किल ही है। आज तो रजिया गुंडों में फंस गई। दूर दूर तक कोई बचने की किरण दिखाई नहीं दे रही थी।

वहां बैठे ड्राइवर, कंडेक्टर, किलिनर, मिस्त्री आदि सब हमें देख रहे थे। हमे लग रहा था जैसे बहुत सारे भेड़िये अपने शिकार को अपने बीच फंसा हुआ देख रहे हों। अभी मेरे विचारों में डर और भय की ये द्वंद चल ही रही थी कि अचानक ट्रक के ड्राइवर ने ट्रक एक तरफ खड़ा करके एक होटल वाले से कान में कुछ कहा। होटल पर से तुरंत सारे बैठने वालों को हटाकर हमारे लिए कुर्सी मेज लगा दी गयी। हमे कुर्सियां पर बैठकर ड्राइवर हमारे लिए चाय आदि का इंतजाम करने के लिए कहकर चला गया। मैं समझ गया कि ये सब चाल है अब ड्राइवर चला गया, अब ये भेड़िये हम पर हमला कर देंगे। आज मेरी पत्नी और बहन का क्या होगा। बच्चों का क्या होगा। दिमाग में बस ये ही फ़िल्म चल रही थी।

धीरे धीरे मैंने अपने आपको दिलासा दी कि जबतक मैं जिंदा रहूंगा कुछ होने नहीं दूंगा। ये हमला करेंगे तो मैं ऐसे मुकाबला करूँगा। लेकिन कुछ ही देर में हमारे लिए चाय और बिस्कुट, बच्चो के लिए दूध आदि आ गया। लेकिन उस ड्राइवर और किलीनर का कहीं पता नहीं था पता नहीं क्या प्लानिंग बना रहा होगा। अब दिमाग में ख्याल आया कि वो अपने कुछ साथियों के साथ हमें लूटने का प्लान बना रहा होगा।

इसी कसमकश में था कि ट्रक ड्राइवर आया और उसने बताया कि उसने एक बस ड्राइवर से बात की है। वह आपको झरबेड़ा छोड़ आएगा। बस में आने जाने में 130 रुपये लगेंगे। रास्ता खराब है इस लिए बस में आपके अतिरिक्त कुछ बस ड्राइवर और किलीनर भी जाएंगे। उस ड्राइवर हमसे रुड़की से नारसन लाने कोई किराया नहीं लिया था। मैंने सोचा कि इस ड्राइवर को तो हमें लूटने का मौका नहीं मिला। अब दस बारह अपने साथियों के हवाले करके अपने प्लान को अंजाम देगा। विस्वास करने के अलावा चारा ही नहीं थी। अब तो हमारी हालत आसमान से टपका खजूर में इटका वाली थी। मैंने ड्राइवर को 130 रुपये दिए। वो एक बस को लेकर आया। उसने हमें नमस्ते की। हम बस में बैठ गए। मैंने बस एक सुरक्षा की कि आगे की सीट पर अपने परिवार को बैठाया और उनके पीछे मैं स्वयं बैठ गया। पीछे की तरफ ड्राइवर कंडक्टर आदि जो शायद नशे में भी थे, एक दर्जन से अधिक लोगो हाथों में रॉड, डंडे आदि लेकर बैठ गए। बस में बैठकर वो अपने साथियों के साथ हंसी मजाक करते रहे। हमारी बस के चलने तक वो हमें देखता रहा। बस चलना शुरू हुई।

मेरा पूरा ध्यान बस में बैठे लोगों पर था। बस बहुत तेज चल रही थी। मोड़ और तंग गलियों में भी बस की स्पीड कम नहीं हो रही थी। एक विशेष गांव निकलने के बाद बस अपनी सामान्य स्पीड पर चलने लगी। एक ने बताया कि अब खतरे वाला गांव निकल गया। 40 मिनट के बाद हम झबरेड़ा में थे। बस रुकी। हम बस से उठे। बस में बैठे लोगों ने हमारा समान उतारा। हम बताया कि इससे आगे बस नहीं जा सकती है। बस के ड्राइवर को धन्यवाद देकर हमने उसे विदा किया। और अपना सामान लेकर हम अपनी मंजिल की ओर बढ़ने लगे।

अब मैं सोच रहा था कि वो ट्रक ड्राइवर जिसके बारे में मैं कितना गलत सोच रहा था। वो ड्राइवर तो उस दिन मेरे लिए भगवान का कोई दूत बनकर हमारी मदद करने आया था। उस हम कितने बुरे हैं कि उसके बारे न जाने क्या क्या सोच रहा था।अगर उस दिन वह ड्राइवर हमें लेकर न आता तो हम कितना परेशान होते, हमारे साथ क्या घटनाएं हो सकती थी।

मन ही मन मैं उस ड्राइवर को नमन कर रहा था उस समय मुझे ईश्वर को धन्यवाद देने का विचार तक नहीं आ रहा था। मैं सोच रहा था शायद मैं उस ड्राइवर को कोई पुलिस का अधिकारी लगा हूंगा। जो परिवार सहित झबरेड़ा थाने का चार्ज लेने जा रहा था। या शायद कोई और समझा हो उसने । ये भी हो सकता है कि कभी उस को कोई समस्या हुई हो और मैंने उसकी मदद की हो। चलो जो भी हो वो ड्राइवर हमारे लिए तो भगवान बनकर आया था। उसका धन्यवाद कैसे दूँ समझ मे नहीं आरहा था। रात में एक बजे हमारे शादी वाले परिवार में पहुंचने पर आश्चर्य और हर्ष का माहौल बन गया।
अभी मैं ये सोच ही रहा था कि मेरी धेवती नैनो और जिनी आकर मुझ से चिपट गयी। और मैं उस घटना की यादों से बाहर आ गया। मैंने आपको पूरी घटना सुना दी है। आपसे मालूम करना चाहूंगा कि आखिर वो ट्रक ड्राइवर कौन था। और मैं उसका आभार कैसे उतारूँ।

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