पीली सलवार / डा. वीरेंद्र पुष्पक

अब वो बिल्कुल नंगी थी। लोगों को गालियां दे रही थी जो भी हाथ आता उठा उठा कर मारने लगी। अब वो रौद्र रूप में थी। भीड़ में हवस के भूखे भेड़िये पास से हटकर दूर जाकर छिप छिप कर उस लड़की के अंगों को ताक रहे थे। मैं और मसहूर साहब दोनो उठकर आये। जो लोग दूर से भी तमाशा देख रहे थे उन्हें डांटा।
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मेरे नगर से कुछ दूरी पर एक कस्बा है। एक दिन किसी ने मुझे बताया कि वहां एक 16- 17 वर्ष की लड़की की लाश मिली है। उसके बदन पर पीले रंग का सलवार कुर्ता है। जो तुम्हारी लड़की जैसा है। लाश बहुत ही बुरी हालत में है। सुनकर मैं कुछ देर के लिए तो सन्न रह गया।

फिर याद आया कि मैंने वो सूट कल ही एक पागल लड़की को जिस ने बीच चौराहे पर गुस्से में आकर अपना सलवार कुर्ता फाड़ कर चिथड़े कर दिया था, को पहनवाया था।

अचानक मेरे सामने उस लड़की का चेहरा आ जाता है। हां वो पागल लड़की थी, जिसका नाम तो मुझे इस समय याद नहीं आ रहा है। उसका रंग गोरा, नयन नक्ष अच्छे, बाल काले, कटे, उलझे हुए, कद 5 फिट के लगभग और उम्र तो मैं पहले ही बता चुका हूं, होगी लगभग 16 या शायद 17 वर्ष की। अगर उसके बाल तरतीब से कटे होते, उलझे न होते तो उसकी खूबसूरती किसी फिल्मी हीरोइन को मात दे रही होती। उसने नारंगी रंग का कुर्ता पहन रखा था जिस पर लाल पीले फूल छपे थे, सलवार उसकी सफेद रंग की थी। सड़क पर तेज धूप थी पर वो मस्त आवारा की तरह घूम रही थी। जब लोग उसे छेड़ते तो वो उन्हें गालियां बकती।

मेरा नाम डा. रवि शर्मा है। जिन दिनों की ये बात है उन दिनों नगर के एक प्रमुख चौराहे पर मेरा क्लिनिक था। मई का महीना था। सूरज जमकर आग उगल रहा था। सुबह आठ बजे से ही गर्मी शुरू हो जाती थी। 10 बजे से तो तेज लूं चलने लगती थी। मुख्य मार्ग होने के बाबजूद सन्नाटा पसरा रहता था। आदमजात तो आदमजात, पशु पक्षी तक नहीं दिखाई देते थे। बहुत ही जरूरत होने पर कोई सड़क पर आता था। वाहन भी इक्कादुक्का ही आ जा रहे थे। दुपहर 12 बजे का समय मगर पागल लड़की अपनी मस्ती में मस्त घूम रही थी। उस समय तक मैं सुबह के समय के सभी रोगी देख चुका था। अब क्लिनिक पर कोई मरीज नहीं था। गर्मी अधिक होने के कारण मैं दुपहर में अपने घर नहीं जाता था। दुपहर का समय मैं सामने के दुकानदारों जो एक तरह से मेरे परिवार का हिस्सा हो गए थे, के साथ गप्पे मार कर काटता था। इस लिए मैं उठकर सामने के दुकानदार मसहूर साहब से मिलने चला गया। अभी हम बैठ कर बातें ही कर रहे थे कि देखा वो लड़की पास ही में लगे नल पर आकर आपने कपड़े उतार कर अपनी मस्ती में नहाने लगी। किशोर नग्न लड़की को नहाते देख आसपास के दुकानदार नल के पास इक्कठा हो गए। लड़की इस सब से बेपरवाह मस्ती से नहाती रही। एक हाथ से वो नल चलती नल के नीचे नहाते हुए गर्मी से निजात पाने की पूरी कोशिश कर रही थी। किसी ने बड़प्पन दिखाते हुए उसे नंगा नहाने के लिए टोक दिया। उसे डांटते हुए कपड़े पहनने के लिए कहा। लड़की को टोकना डांटना पसन्द नहीं आया। वो पागलपन भरे गुस्से में आ गयी। गुस्से में उसने नल के किनारे रखे अपने कपड़े उठाये और तार तार कर फाड़ डाले। अब वो बिल्कुल नंगी थी। लोगों को गालियां दे रही थी जो भी हाथ आता उठा उठा कर मारने लगी। अब वो रौद्र रूप में थी। भीड़ में हवस के भूखे भेड़िये पास से हटकर दूर जाकर छिप छिप कर उस लड़की के अंगों को ताक रहे थे। मैं और मसहूर साहब दोनो उठकर आये। जो लोग दूर से भी तमाशा देख रहे थे उन्हें डांटा। उस लड़की से कहा कि बिटिया तेरा जैसे जी चाहे जब तक जी चाहे नहाती रह। अब तुझे कोई नहीं टोकेगा। पागलों को गुस्से से नहीं प्यार से समझाया जाता है। हमने भी उसे प्यार से ही समझाया। इसके कपड़े तार तार हो चुके थे। अब वो नहाने के बाद क्या पहनेगी एक समस्या थी। उसने नहाना बंद किया। हमने बड़ी मिन्नत करके उसका बदन उन तार तार कपड़ो से ही ढकवाया। चौराहे के एक रिक्शा वाला था नाम था उसका शौकत, आम तौर पर घर या बाजार से कुछ मांगना हो तो उसे ही भेजता था। घर पर भी सभी उसे जानते थे। मैंने तुरन्त उसे बुलाया और उसको को अपने घर भेजा। उससे मैंने घर से अपनी बेटी जो उस समय कक्षा छह में पढ़ती थी, उसका एक सलवार कुर्ता मँगवाया। कुछ ही देर में वो सलवार कुर्ता लेकर आगया। हमने बड़ी मिन्नते करके लड़की को वो सलवार कुर्ता पहनवाया। वो सलवार सूट पहनकर वो मेरी बेटी जैसी ही लग रही थी। कपड़े पहनकर वो कहीं चली गयी। हम मैं और मसहूर साहब आपस मे चर्चा करने लगे कि ये लड़की अभी इतनी पागल नहीं है कि ठीक न हो सके। इसे अपनेपन, सदभाव, प्यार, सहानुभूति की जरूरत है। जो शायद उसे अपने घर पर नहीं मिली। इस सब के साथ इसका कहीं अच्छे मनोचिकित्सक से इलाज हो जाये तो ये ठीक हो सकती है। हमारे मन में उसके लिए सहानभूति जागने लगी थी। किसी तरह से इसके परिवार का पता लग जाये तो उन्हें सूचित कर दें। तब तक इसे किसी के घर में रखा जाए। अन्यथा जवान, अकेली, पागल लड़की, अनजान जगह, के साथ कहीं भी कुछ भी हो सकता है। दिन तो खैर यहां वहां कट जाएगा रात को कहां रुकेगी। अब समस्या थी कि इसे रखें किस के घर पर, अपने घर पर रखने की न मेरी हिम्मत थी न मसहूर साहब की। अभी हम इसी गहन समस्या में डूबे हुए थे कि वो कब और कहां चली गयी पता ही नहीं चला। वैसे भी हम सभी ऐसे मामलों में दूसरों को उपदेश तो जमकर देते हैं, कुछ रुपये पैसे भी दे देते हैं, लेकिन पागल लड़की को घर में कौन रखे ये समस्या आ जाती है। लड़की चली गई तो बात खत्म हो गयी, साथ ही हमारी जिम्मेदारी भी। अब हम दोनों मसहूर साहब और मैं क्लिनिक पर आ गये। यहां गर्म हवाओं से कुछ राहत मिलेगी। पागल लड़की चली गयी हम और दूसरे विषयों पर बात करते रहे। बात का क्या है छोटे से छोटे विषय पर घण्टो बातें की जा सकती है। जब कि हमें तो उस आग उगलती दुपहरी में समय ही तो काटना था।

लगभग एक घंटा ही गुजरा होगा कि अचानक वो मेरे क्लिनिक पर आई। आते ही उसने कहा पांच रुपये दे। मैं भिखारियों को भीख नहीं देता, लेकिन पागलों की हर इच्छा पूरी करने का पूरा प्रयास करता हूं। मैं उन्हें सम्मान देता हूं। कई बार उनके साथ बैठ कर चाय आदि भी पी लेता हूं। ये कोई ईश्वरीय विधान सा है कि मेरे नगर में आने वाले पागल मेरे पास जरूर आते हैं। या शायद ये वजह हो कि मेरी क्लिनिक ऐसी जगह पर है कि हर आने जाने वाले की नजर में आ ही जाती है। इधर मैं भी पागलों के साथ हमदर्दी से पेश आता हूं। शायद मैं भी कुछ पागल हूं या शायद मैं समझता हूं कि आज के दौर में सभी मानसिक रोगी है, जिनमें से एक मैं भी हूं। यही वजह है कि मैं ऐसे रोगियों के साथ मधुर व्यवहार करता हूं। यहां मैं एक बात और बता दूं कि पागल की परिभाषा मेरी नजर में इस प्रकार है। पागल दो पंजाबी शब्दों से मिलकर बना है, पा+गल= पागल। पंजाबी में पा कहते है पाने को और गल बात को। तो पागल को हम यूँ करके कह सकते हैं कि जिसने बात पा ली हो वो पागल है। बात- वो कोई भी हो सकती है।

हां तो मैं कह रहा था कि पागल लड़की मेरे क्लिनिक पर आई और उसने मुझसे कहा ला पांच रुपये दे और मैंने बिना एक क्षण की देर किए उसे पांच रुपये दे दिए। पांच रुपये लेकर वो चली गयी। मैंने उसे गौर से देखा था मुझे लगा कि वो किसी अच्छे परिवार की थी। शायद एक दो दिन पहले ही वो पागल हुई हो। अपने पागलपन में भी वो न किसी से बात करती थी न किसी से कुछ मांगती थी। अपने आप में मस्त थी वो। यदि उसे कुछ लेना होता तो भी वो मांगती नहीं थी, दुकानदार को पैसे देकर समान खरीदती थी। वो मुझसे पांच रुपये लेकर खुश होकर चली गयी।

लगभग एक घंटे के बाद वो फिर आयी। इस बार वो खाली हाथ नहीं थी, उसके हाथ में एक ग्लूकोज वाली बोतल थी, जिसमें पानी में दो छोटी छोटी मछली तैर रहीं थीं। वो बोतल उसने मुझे दिखाई, बहुत खुश थी वो उन मछलियों को लेकर । खुशी खुशी उसने मुझे मछलियां दिखायीं और बताया कि दो रुपये में खरीदी हैं, तीन रुपये की मैंने चुस्की बर्फ खा लिया। उस पर खुद के सिवाए किसी का नियंत्रण तो था नहीं। वो अपनी मर्जी की मालिक थी खुदमुख्तार, स्वतंत्र हवा का झोंका थी। मुझे खुशी खुशी मछली दिखा कर फिर कहीं चली गयी। थोड़ी ही देर बाद वो फिर वापस आ गयी थी। इस बार उसके हाथ खाली थे। आते ही उसने मुझे पांच रुपये देते हुए कहा आपने रुपये रख ले। मेरे मना करने के वाबजूद उसने मेरी मेज पर पांच रुपये रख ही दिए। मुझे पांच रुपये दिखाते हुए उसने बताया कि मछली उसने दस रुपये में बेच दी। वो फिर चली गयी।

शायद उसके साथ इतने मधुर व्यवहार से कोई पेश नहीं आता होगा। इस लिए वो फिर कहीं से घूम कर मेरे क्लिनिक पर आ गयी थी। इस बार वो किसी पागल जैसी नहीं बहुत समझदार जैसी लग रही थी। मेरी मेज कुर्सी कुछ इस तरह रखी थीं कि गर्मी में भी ऊपर लगे पंखे की सारी हवा मेज पर ही आती थी, मेरी कुर्सी पर नहीं। इस बार उसने मुझे पागल बताते हुए कहा कि इस गर्मी में भी मैंने अपनी कुर्सी पंखे के नीचे नहीं कर रखी है। उसने मुझसे कहा पहले मेरे लिए चाय मंगा, मैं चाय पिऊंगी, और अपने लिए भी। फिर मैं तेरी मेज कुर्सी ठीक करूंगी। वो मुझे आदरसूचक संबोधनों से भले ही संबोधित न कर रही हो। लेकिन उसके संबोधनों में एक विशेष प्रकार की जिद थी, अपनापन था। मैं सामने के दुकानदार गंगाराम की दुकान पर गया तीन चाय और सेम का ऑर्डर दिया, मसहूर साहब को भी चाय पीने के लिए आमंत्रित किया। मैं लौट कर आया तब तक वो मेरी क्लिनिक की एक एक चीज का निरीक्षण कर चुकी थी। मैंने, मसहूर साहब और उसने चाय पी।

चाय पीकर उसने कहा कि तू इतनी गर्मी में कैसे बैठता है। अपनी मेज इस तरफ कर ले। तेरी कुर्सी पंखे के ठीक नीचे आ जायेगी। मुझे लगा कि पागल वो नहीं, मैं था। ये बात इतने दिनों तक मेरी समझ में क्यों नहीं आयी। मैं इतने दिनों तक पंखे की हवा से महरूम रहा। उसने मेरे साथ मिलकर मेरी मेज कुर्सी, बैंच आदि अपने हिसाब से लगवा दी। अब पंखा ठीक मेरी कुर्सी और मरीजो के स्टूल के ऊपर था। कुछ देर वो मेरे पास रखे मरीज वाले स्टूल पर बैठी। वो मुझसे बड़ी ही आत्मीयता से बातें कर रही थी। उसने मुझसे मेरे परिवार, मेरी पत्नी, मेरे बच्चों के बारे में पूछा। मेरे बताने पर उसने कहा कि तुम मुझे अपने घर रख लो मैं तुम्हारे सारे काम करूंगी। मैंने उससे कह तो दिया कि हां मेरे घर रहना। मैं तेरी पढ़ाई का भी इंतजाम कर दूंगा। एक बात तुमने नोट की होगी या नहीं, लेकिन मैं बता दूं कि जिसे वो थोड़ी देर पहले तक तू कह रही थी अब वो तुम से सम्बोधित करने लगी थी। इन बातों में ही मैंने उसके परिवार की जानकारी ली थी। वो हमारे जनपद मुख्यालय की रहने वाली थी। उसके अब्बू घण्टाघर पर बूरे बताशे की दुकान करते थे। उसकी मां मर गयी है। उसकी दूसरी माँ उसके साथ बड़ा जुल्म करती है। उसके बाल पकड़कर खींचती है। खाना भी नहीं देती है। उसके साथ वो वो हरकतें करती थी कि मैं तो आपको बता भी नहीं सकता। अब वो बड़ी समझदारी की बात कर रही थी। बोली तुम क्या जानो सौतेली माँ क्या होती है। सौतेली माँ दोजख का दूसरा नाम है। अभी वो अपनी लय में कहे ही जा रही थी कि मसहूर साहब आ गये। उन्होंने आते ही कहा की अपना पता बता दे हम तुझे तेरे घर पहुंचा देंगे। इतना सुनना था कि उस पर फिर पागलपन का दौर पड़ गया। वो अपने रौद्र रूप में आने लगी। मैंने इशारे से मसहूर साहब को उनकी दुकान पर भेजा। लड़की को समझाया कि अब तुझे तेरे घर कोई नहीं भेज सकता। तू मेरे घर रहेगी। उसके गुस्से को शांत करने के लिए मैंने उससे खाने के लिए पूछा। मेरा इतना पूछना था कि उसका सारा गुस्सा काफूर हो गया। वो फिर शांत हो गयी। समझदार जैसे वो कभी पागल थी ही नहीं। उसने बताया कि दो दिन से खाना नहीं खाया था।

अब समस्या थी की इस समय खाना कहां से मंगवाया जाए। उस समय पास में रहने वाली नीलू जो मेरे एक मुसलमान मित्र की पत्नी थी, जो अपने आपको हिन्दू पंडित बताती थी। कहती थी कि उसने प्रेम विवाह किया है, आ गयी। उसकी आँख में कुछ गिर गया था मैंने उसकी आंख में से गिरा हुआ कुछ निकाला। आंख के लिए दवा लिखी और उससे कहा कि अगर उसके घर पर खाना हो तो इस लड़की को घर ले जाकर खाना खिला दे। नीलू के हां कहने पर मैंने लड़की को उसके साथ जा कर खाना खाने के लिए भेजना चाहा। लड़की ने उसके साथ जाने से साफ इंकार कर दिया। उसे मेरे अलावा किसी पर भी भरोसा नहीं था। लड़की को खाना खिलाना था इस लिए मैं खुद लड़की को लेकर नीलू के साथ उसके घर तक गया। लड़की पागल थी या समझदार इसका अंदाजा आप स्वयं कर लें कि खाने से पहले उसने साबुन से खूब मलमल कर हाथ धोए। जब वो खाना खाने बैठ गयी तो उससे इजाजत लेकर मैं क्लिनिक पर आ गया। अब मैं सोच रहा था कि घर पर तो इसे रखा नहीं जा सकता। मेरा भरापूरा परिवार है। मेरी पत्नी, बच्चे, भाई, पिताजी, आसपड़ोस वाले, समाज यानी कोई क्या कहेगा। मुस्लिम लड़की, वो भी किशोर, पागल है तो क्या हुआ, है तो घर से भागी हुई। मामला साम्प्रदायिक हो सकता है। जिस पागल के सभी मजे ले रहे हैं, मेरे उसे अपने घर में पनाह देते ही, बस वो एक नाबालिग मुस्लिम लड़की हो जाएगी। मैंने सोचा कि नहीं नहीं मैं उसे अपने घर में पनाह नहीं दे सकता। चलो किसी तरह नीलू को ही तैयार करूँगा मन में ये विचार बना लिया।

नीलू के घर पर भी उसे घर जैसा माहौल ही मिलेगा। कियोंकि वो भी प्रेम विवाह करके अपने घर वालो से नाता तोड़कर यहां आयी थी। यहां भी इसकी ससुराल वालों ने उसे अभी तक स्वीकार नहीं किया था। एक पीड़ित महिला दूसरी पीड़ित महिला की पीड़ा को भली भांति समझ सकेगी। यदि वो लड़की उसके घर रुक गयी और वहां उसने रात गुजार ली तो उसे पास के ही शहर में लेजाकर किसी मानसिक रोग विशेषज्ञ को दिखला कर उसका इलाज करा देंगें। अभी मेरे दिमाग में ये सारे विचार चल ही रहे थे कि लड़की बदहवास भागती हुई सी क्लिनिक में आ कर गयी। पहले मेरी कुर्सी के पीछे छिप गयी। मैंने उससे पूछा कि क्या बात है तो उसने डर से काँपते हुए बताया कि एक डायन आयी है उसके घर में, जो मुझे अपने घर ले जा कर खा जाएगी। अभी वो बता ही रही थी कि पड़ोस के एक सरकारी चौकीदार की काली, मोटी, ठिगनी सी महिला बेटा बेटा करते हुए उसके पीछे आयी। जैसे ही वो महिला आयी लड़की मेरी कुर्सी के पीछे से निकल कर मरीज देखने वाली टेबल के नीचे छिप गयी। मैंने बड़े सम्मान के साथ समझा बुझाकर उस महिला को क्लिनिक से भेजा। महिला को नीलू ने बताया था कि डॉक्टर साहब इस लड़की को कुछ दिनों के लिए किसी के यहां रोकना चाहते हैं। महिला मेरे सम्मान में तथा उसके खुद के तीन लड़के होने और एक भी लड़की न होने के कारण, अपनी खुशी से उसे अपने सरकारी क्वार्टर में रखा चाहती थी, या शायद कोई और कारण हो। महिला के जाने के बाद मैंने लड़की को टेबल से बाहर निकलने की कोशिश की। लड़की ने डरते डरते बताया कि वो औरत डायन है। मुझे छिपा ही रहने दो। नहीं तो वो मुझे खा जाएगी। मैंने लड़की को आश्वस्त किया कि मैंने डायन को भगा दिया। बड़ी मुश्किल से उसे टेबिल के नीचे से निकाला। उस महिला को जो बात हम नहीं कह सकते थे वो उस पागल लड़की ने कहा दी। पागलो को ही वास्तव में इंसान की पहचान होती है ।

वो तो हवा थी जब तक उस पर पूरे अटेंशन न हो, वो एक जगह कहीं नहीं रुक सकती थी। इधर शाम हो गई थी। मरीज आने लगे और मैं मरीजों में घिर गया। वो कहां गयी पता ही नहीं चला। रात में मैं घर आया तो मेरी पत्नी और बेटी ने मुझसे मालूम किया कि सलवार सूट किसके लिए मंगाया था। असलियत में उन्होंने ये सोच कर की मैंने किसी के लिए मंगाया है इसलिए सबसे अच्छा सलवार कुर्ता भेज दिया था। मैंने उन्हें सारी कहानी सुनाई। बड़ी मुश्किल से उन्हें समझाया। सुबह मैं अपनी क्लिनिक पहुंचा तो किसी ने बताया कि पास ही के कस्बे में एक खंडहर में एक 16-17 साल की लड़की की लाश मिली है। जिसके साथ गैंग रेप हुआ था। उसे बड़ी बुरी तरह से मारा गया था। उसके शरीर पर पीले रंग का सलवार कुर्ता था। जब मैंने ये सुना तो मैं सन्न सा रह गया। मुझे लगा जैसे वो मुझसे कहा रही हो कि मैं तो पहले ही कह रही थी मुझे अपने घर रख लो, अब देखो ये क्या हो गया। मैं सोचने लगा कि काश वो नीलू के घर रुक गयी होती? और भी कुछ नहीं तो उस महिला के घर मैंने उसे रुकने को तैयार कर लिया होता। काश मैंने अपनी पत्नी को सारी बात समझकर उसे घर में ही रोक लिया होता। काश मैं हिन्दू मुसलमान की चिंता किये बिना उसे अपने घर पनाह दे देता।

काश मैं समाज से न डरा होता। तो आज वो जिंदा होती। मुझे लगने लगा कि उसे उन दरिंदो ने नहीं मैंने मारा है। मेरी आत्मा मुझे धिक्कार रही थी। अब तो मैं ईश्वर से ये दुआ कर रहा था कि वो लाश उस पागल लड़की की न हो। नहीं तो मैं जिंदगी भर अपने आपको उस लड़की की हत्या का दोषी मानता रहूंगा। फिर मुझे लगा कि मुझे ये घटना आप लोगो के समक्ष रख कर इस का निर्णय आप पर ही छोड़ देना चहिये कि इस मामले में मैं कितना दोषी हूं। अब आप जज है आपका निर्णय मुझे स्वीकार होगा।

संपर्क पुष्पक क्लिनिक
मालियान पो स्योहारा बिजनौर यूपी
94120606999

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