कट्टा निकाल के : समकालीन समाज के प्रतिबिम्ब/डाॅ.अंजुषा सिंह

समीक्षा –


समकालीन रचनाकारों में अशोक ‘अंजुम’ संवेदनशील, सहज एवं भावप्रवण गजलकार व गीतकार हैं। आपने इस संकलन, में गजलों व गीतों में हास्यव्यंग्य के माध्यम से संवेदना, मानवीय संबंधनों एवं समकालीन मुद्दों को संरक्षित करने का प्रयास किया है। ‘कट्टा निकाल के’ कृति में 13 हास्य-व्यंग्य, ग़ज़लें तथा 33 हास्य-व्यंग्य गीत संकलित है जिसको पढ़ते हुए मौजूदा हालात की वास्तविकता से परिचित होता है। निःसंदेह यह कृति अपनी सार्थकता को प्रमाणित करती है। अंजुम जी का चिंतन विषय बहुआयामी है, आपने राजनेताओं की विकृत सोच, रिश्वतखोरी, भ्रष्टाचार, दबंगई जैसे प्रमुख पहलुओं पर अपना मंतव्य मार्मिकता के साथ हास्य-व्यग्य शैली में लिखा है।
मौजूदा समाज में दबंगों या तथाकथित शक्तिशालीन-महानुभावों की दबंगई से किसी न किसी रूप में प्रतिदिन सामना होता ही है। जिससे एक आम इंसान अपने आपको असहाय व उपेक्षित पाता है। तब उसकी अनुभूति कुछ ऐसे होती है-
जो प्यार से बुलाता तो हरगिज ना पहुँचते
हमको बुला रहा है वो कट्टा निकाल के (पृष्ठ-07)

बाहुबलियों की गुंडागर्दी से समाज के हर वर्ग में भय व्याप्त है, शक्तिशाली लोग कमजोरों को डराकर कई प्रकार से शोषण करते हैं। एक अन्य गीत में गीतकार कहते हैं-
हर काल तुम्हारा अपना है,
टकसाल तुम्हारा अपना है,
सब सुविधाएं हैं तुम्हें सुलभ-
हर माल तुम्हारा अपना है। (पृष्ठ-23)

राजनेताओं की भूमिका पर ‘अंजुम’ जी ने प्रमुखता से चिंतन किया है। ‘सजन रे झूठ मत बोलो’, ‘क्या राष्ट्रधर्म’, ‘जय लोकतंत्र’, ‘ताक धिना धिन’, ‘नेता जी आये तोरे द्वार’ जैसे कई व्यंग्य गीतों के माध्यम से वह अपना रोष व्यक्त करते हैं। राजनेताओं की चरित्र-हीनता, भ्रष्टता, आपराधिक प्रवृत्ति आदि से हम सभी भली-भांति परिचित हैं। आजकल कुछ-एक नेता ही जनसेवक या देशभक्त कहलाने के हकदार हैं, बाकी का प्रयोजन तो धन संचय, जातिधर्म के नाम पर भेदभाव, गंुडागर्दी जैसे क्रियाकलाप है। नेताओं के इस दगाबाज रूप से गीतकार व्यथित है, जनता के प्रति नेता की सोच पर व्यंग्य देखते ही बनता है-
चाहे जी और चाहे मर तू, जो भी कहें समर्थन कर त
सब कुछ सहकर मुस्कुराती रह, कभी न करना अगर-मगर तू
तुझे कसम है जोर -जुल्म हो, मत आवाज उठाना जनता
हम गाते हैं जय-जय कुर्सी, तू जन-गण-मन गाना जनता (पृष्ठ -31)

नेताओं की वादा खिलाफी पर अंजुम जी फरमाते हैं-
ये कर देंगे, वो कर दें,
जनता का हर दुख हर लेंगे,
जनता अगर सुखी हो अपनी
हर दिन सौ-सौ कष्ट सहेंगे,
आश्वासन के जाल बिछाते-
रोज, रोज हाँ रोज अनूठे!
ये भी झूठे, वे भी झूठे! (पृष्ठ-32)

‘नाम सारे फिक्स हैं’ व्यंग्य में ‘अंजुम’ जी भ्रष्टाचार की नब्ज टटोलते हैं। पक्षपातपूर्ण कार्यशैली पर उनका व्यंग्य बड़ा ही सटीक लगता है-
तू भले ही प्रैक्टिस दिन-रात कर
नौकरी को नाम सारे फिक्स हैं! (पृष्ठ-14)

आजकल लगभग सभी जगह ऐसे नौकरशाहों/सेक्कों की भरमार है जिनमें कर्तव्यनिष्ठा नहीं होती वरन वो अपनेपद का दुरूपयोग करते हैं, धन इकट्ठा करते हैं और जनता का हक मारते हैं। ऐसे लोगों को गीतकार ने खलनायक की संज्ञा दी है-
वर्दी में लगते महाबली,
धर्राए तुमसे गली-गली,
बात तुम्हारी सभी भली,
झूठों के ‘मायक’ नमो नमः,
हे खलनायक, नमो नमः (पृष्ठ-24)

देश में हर तरफ ढ़ोंगी बाबाओं या प्रवचनकारी गुरूओं ने जाल बिछाया है। भोले-भाले लोग चाहे चह शिक्षित हांे, अल्प शिक्षित हों, अमीर हों, गरीब हों सभी को ऐसे बाबा धर्म के नाम पर, भूत और भविष्य के नाम पर, स्वर्ग-नरक के नाम पर, पाप पुण्य के नाम पर गुमराह कर रहे हैं। ऐसे ढ़ोंगी बाबाओं के झांसे में पड़कर ना जाने कितने लोग घर छोड़ चुके हैं या मेहनत की कामई गँवा चुके हैं। ऐसे ढ़ांेगी गुरूओं पर गीतकार का व्यंग्य देखिए-
नेता और अभिनेता चेले,
युग के अटल प्रणेता चेले,
मुच्छड़ दहियल गुण्डे गंुडे चेले,
बड़े-बड़े मुस्टण्डे चेले,
प्रवचन करवाने को तरसे-
चेंले नामी-नामी जी!
स्वामी जी, जय स्वामी जी! (पृष्ठ-26)

संस्कारों की देवी कही जाने वाली पाश्चात्य संस्कृति के आकर्षण में भारतीय संस्कृति से विमुख हो रही है और पारिवारिक दायित्वों के प्रति उदासीन होती जा रही है-
शरम बेचती है, हया बेचती है,
ऐ भारत की बेटी, ये क्या बेचती है!? (पृष्ठ-39)

नारी के इस परिवर्तित रूप पर गीतकार अपनी व्यथा को कुछ इस तरह व्यक्त करती है-
पूज्य भी नारी भारत में
अब वह चीज कही जाती,
अपसंस्कृति की आँधी में
ये किस ओर बही जाती? (पृष्ठ-35)

अभी-अभी प्रकाशित पुस्तक में कुल 46 ग़ज़लें-गीत व्यंग्य भाव से लिखित हैं जिनमें समाज में व्याप्त बुराईयों, राजनेताओं की चरित्रहीनता व दोगलापन, आतंकवाद, भ्रष्टाचार आदि का प्रतिबिम्ब दिखायी पड़ता है। पुस्तक में समाहित एक गीत ‘दिल है कि….’इस संग्रह की विषय वस्तु और अशोक ‘अंजुम’ जी के चिंतन का झरोखा प्रस्तुत करता है। अंजुम जी के समसामयिक चिंतन से मैं भी अनुभूत हूँ। कई बार यात्रा के वक्त ऐसा हुआ है कि-
‘हमने’ तो बुक कराई थी दौड़-भाग के,
बैठा है पर ‘वो’ सीट पर कट्टा निकाल के।

224, कमला नेहरू नगर, गाजियाबाद-201002

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