वह अपने आँसुओं को रोक नहीं सकीं/राहुल सांकृत्यायन

कालजयी:

कनैला छोड़ने से पहले अपनी प्रथम परिणीता के देखने का निश्चय कर चुका था। अब वह चारपाई पकड़े थी। देखकर करुणा उभर आना स्वाभाविक था । आखिर मैं ही कारण था जो इस महिला का आधा शताब्दी का जीवन नीरस और दुर्भर हो गया

कनैला मेरा पितृग्राम है। मैं ननिहाल (पन्दहा) में पैदा हुआ और वहीं पला पढ़ा भी, इसलिए जन्मग्राम वही है। हर गाँव की आपबीती रोचक कथाएँ होती हैं जिनको बाल्य कल्पना और भी मोहक बना देती है। हो सकता है, मेरे लिए भी कनैला की कथाएँ आकर्षक मालूम हुई हो। पर, सत्य कल्पना से भी अधिक सुन्दर होता है। कनैला की धरती जिस भाषा में परिचय दे रही थी, उस समय उससे मैं परिचित नहीं था। जब परिचित हुआ, तो कुछ घंटों के लिए। सिर्फ दो बार 1943 और 1957 में वहाँ जा पाया।
13 फरवरी, 1957 को उसकी पुरातत्वीय सामग्री देखने के लिए विशेष तौर से कनैला गया था और उसके बारे में मैंने निम्न पंक्तियाँ लिखीं अपने जन्मग्राम से पितृग्राम जाते समय न जाने कितनी बार इस रास्ते (डीहा कनैला) को अपने पैरों से नापा होगा । पर, उस समय रास्ता खेतों के किनारे पगडण्डी का था। अब अच्छी कच्ची सड़क बनी हुई थी। नई पक्की सड़क के चैरस्ते पर पहुँचने से पहले ही हम कनैला में दाखिल हुए। गाँव के कोने पर देखा, बहुत से लोग अगवानी के लिए तैयार हैं। लेकिन, पहले मुझे कनैला की उस पोखरी (बड़ी) को देखना था जिसमें सिसवा जैसी ईंटें मिलती हैं। बरसात के बाद का समय था। बड़ी में अभी भी थोड़ा पानी था और जहाँ से ईंटें खोदी गई थीं, वह जगह पट गई थी। लोगों ने बतलाया, इस स्थान से उस स्थान तक बड़ी ईटों की मोटी दीवार चली गई है जो उस स्थान पर जाकर समकोण पर मुड़ जाती है। चारों ओर खुदाई हो तो पता लगे कि पोखरी कितनी बड़ी थी, उसका मूल घाट किधर था। हो सकता है, पोखरी के भीतर फेंके हुए कुछ और भी पुरातत्व अवशेष मिल जाएँ। वहाँ से सैयदबाबा और डिहबाबा के स्थान पर गये। सैयदबाबा के पास कुछ देखने के लिए नहीं था। वही कुछ गज लम्बा चैड़ा ऊँचा स्थान था जिसे लोग कोट कहा करते हैं। पास में डिहबाबा का स्थान अवश्य महत्त्व रखता है। पिछली बार मैंने वहाँ महाकाल की खण्डित मूर्ति देखी थी। सौभाग्य से अब भी उसके दो टुकडे (सिर और पैरं) वहाँ मौजूद थे। कन्धे और बीच का खण्ड लुप्त था। सिर 3 इंच लम्बा है। 21 इंच की रही हो, यह जरूरी नहीं, क्योंकि महाकाल की मूर्तियों की तरह इस मूर्ति के दोनों. भी काफी फासले पर छितराए हुए हैं। सिर को वहाँ छोड़ना सुरक्षित नहीं था, इसलिए उसे साथ ले आया। महाकाल के मुख को देखकर तिब्बत के चित्र और मूर्तियाँ याद आती थीं। उसी तरह की सारी साज सज्जा थी। मुँह के दोनों छोरों पर शायद दो दाँत भी निकले हुए थे जो अब तोड़ दिये गये। नाक का टूटना बतला रहा था कि इसको मुस्लिम धर्मान्धों का सामना करना पड़ा था। दाहिने कान का आधा लिये हुए छी के नीचे का सारा भाग साफ था। बायें कान का भी कुछ हिस्सा बचा हुआ था। सिर पर अर्ध मुकुट बना हुआ है। महाकाल दाहिनी आँख से काने हो गए हैं, पर बायीं आँख का तेज अब भी झलकता है। मुकुट के नीचे केशों की पाँती के बाद मुकुट के ऊपर भी अग्निज्वाला की तरह प्रज्जलित कुंचित केशकलाप दीख पड़ते है जो मुकुट से 3 इंच ऊपर तक चले गये है। ठीक इसी तरह ज्वालमालाकुल महाकाल तिब्बत में आज भी बनाये जाते हैं। वज्रयान का यह महान् देवता कनैला में आज से आठ नौ शताब्दियों पहले परमपूज्य माना जाता था, पर आज मेरे सिवाय उसे कोई पहिचानने वाला भी नहीं है। कितना परिवर्तन? पुरुषों और उनसे भी अधिक लड़कों की भीड़ हमारे साथ थी जो खडी फसल को रौंदती चल रही थी। गया रावत (भर) का टोला मौजूद था, लेकिन एक एक मिनट के मोह ने पैरों को उधर जाने से रोक दिया । गया रावत के पुत्र आज दो बार से इस गाँव के प्रधान निर्वाचित हो रहे हैं। ग्राम में जाकर ग्रामीणों से न मिलना अफसोस की बात थी, पर हर चीज का याद रखना मुश्किल था। श्यामलाल, रामधारी ही नहीं, सारा गाँव दरवाजे पर स्वागत के लिए उपस्थित था। भोजन प्रतीक्षा कर रहा था, इसलिए कुछ बोलने से पहले हमारी मण्डली भोजन करने के लिए घर में चली गई । रोटी, दाल, भाजी, भात, दूध सभी व्यंजन तैयार थे। हरी मटर का गादा (निमोना) मेरे लिए विशेष आकर्षक था। मैं सबेरे चाय पीने के साथ ही इन्सुलिन ले लिया करता था जिससे दिन भर छुट्टी रहती थी। यह देखकर प्रसन्नता हुई कि कम से कम भोजन में वहाँ सब एक वर्ण हैं। श्रीवास्तव ब्राह्मण, सर्वरिया ब्राह्मण सभी आसन से आसन मिलाये भोजन कर रहे थे ।
भोजनोपरान्त प्रतीक्षा करते बन्धुओं के बीच कुछ बोलना पड़ा। गाँव के सबसे वृद्ध नौमी कहार मौजूद थे जो अब अस्सी के ऊपर के है। नौबत राउत दूसरे वृद्ध थे। तीसरे रजबली चूड़िहार तो मेरे साथ ही साथ घूम रहे थे। मुझे प्रसन्नता थी कि उन्हें देखते ही पहचान गया। उनके सामने लाभ की एक ही बात मैं कह सकता था। वह थी बिखरे हुए खेतों को इकट्ठा करके साझे की खेती करो। मैंने कहा सारे गाँव की एक जगह खेती करने की जरूरत नहीं है। पहले गाँव की चार पाँच साझी खेतियाँ होनी चाहिए और पिछले सौ वर्ष के बंटे हुए खेतों को इकट्ठा कर देना चाहिए। पंचायती खेती की बात मैं उन्हें समझाना चाहता था, लेकिन मुझे स्वयं विश्वास नहीं था कि मेरे शब्द बहरे कानों में नहीं पड़ रहे है। पर, अगले दिन गाँव की बारात में आजमगढ़ आये कनैला के बहुत से लोग मिलने आये। जब गाँव के सबसे ज्यादा खेत वाले पुरुष ने बड़ी गम्भीरता से कहा एक बार आप और कुछ समय के लिए आ जायें, तो हमारे यहॉ जरूर पंचायती खेती हो जायेगी इस पर मुझे विश्वास हुआ कि मेरा कहना सामयिक था और नई उठ खड़ी कठिनाइयों के कारण लोग इस तरह सोचने के लिए तैयार हैं।
विश्वनाथ पाण्डे का ही आग्रह नहीं था, बल्कि मुझे भी दौलताबाद अपनी ओर खींच रहा था। नाम मुस्लिम तथा अर्वाचीन था। लेकिन, उसके कारण गाँव अर्वाचीन नहीं हो सकता था। गौतम अभिमन्यू सिंह मेहनगर राज्य के संस्थापक का नाम मुसलमान होने पर दौलतखाँ पड़ा, जो इस गाँव के नाम से चिपका है। पर, गाँव उससे कहीं अधिक पुराना है। विश्वनाथ पाण्डे रामराज्य परिषद् की तरफ से विधान सभा के लिए खड़े हुए थे। लेखा जोखा लगाकर पूरे विश्वास के साथ ऊह रहे थे, मैं जरूर जीतूँगा । मैंने कहा दों हजार रुपया तुम खर्च कर चुके हो। दों तीन हजार और जाएँगे और तुम्हारा हारना निश्चित है। विश्वनाथ जी बोले चचा, आशीर्वाद दीजिये। मैं जरूर जीतूँगा। 10 मार्च के अखबार में देखा, उनके निर्वाचन क्षेत्र से कम्युनिस्ट चन्द्रजीत को 21774 वोट मिले। कांग्रेसी पद्ममनाथ वकील को 19554 और विश्वनाथ जी मुश्किल से 4816 बोट पाकर अपनी जमानत जप्त करवाने में सफल हुए। कनैला छोड़ने से पहले अपनी प्रथम परिणीता के देखने का निश्चय कर चुका था। अब वह चारपाई पकड़े थी। देखकर करुणा उभर आना स्वाभाविक था । आखिर मैं ही कारण था जो इस महिला का आधा शताब्दी का जीवन नीरस और दुर्भर हो गया । मैं प्रायश्चित करके भी उनको क्या लाभ पहुँचा सकता था? एक बार देखा । वह अपने आँसुओं को रोक नहीं सकीं। फिर मैं घर से बाहर चला आया ।
(-कनैला की कथा से)

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