सृजन है प्रेम

कोलकाता में समय से दोस्ती करना मुश्किल नहीं होता।
यह सरल है, मैदान में घास चरते मेमनों की तरह।
दिन भर फुटबॉल खेलते लड़कों को
जल्दी नहीं होती घर लौटने की।
स्कूल बैग लिए लड़कियाँ घने छायादार पेड़ों के नीचे
बैठी रहती हैं किसी अकथ प्रतीक्षा में।
कैटर-पिलर की तरह हिलती-डुलती-चलती ट्राम
बोर्नविटा और लक्स के विज्ञापन ओढ़े
बार-बार गुज़रती है हमारे करीब से
रस्सी में बंधी घंटी बजाते हुए।

उसने कहा – क्या हम पूरा जीवन
कोलकाता की किसी ट्राम में बैठ कर,
कानों में मारिया कैरी का “वी बिलोंग टुगैदर” सुनते हुए
और मसाला-लगे भुने-चने खाते हुए नहीं गुज़ार सकते?

कोई माने या न माने मैं तो पूरा दिन गुज़ार सकती हूँ
“गैलरी-कोलकाता” में जोगेन चौधुरी, हेमेन मजुमदार
और सुहास रॉय के चित्रों के आस-पास मँडराते हुए,
तुम्हारा हाथ पकड़ कर तरह-तरह के सवाल पूछते हुए।

तुम तो जानते हो नदियों के किनारों पर टहलते हुए
मुझे मिल जाते हैं खूबसूरत गोल-मटोल पत्थर
जिनके बोझ से फटने लगती हैं तुम्हारी जेबें।

किसी दिन, तुम्हारे फोन की प्रतीक्षा में
मैं सुबह से शाम तक गा लेती हूँ, गुनगुना लेती हूँ
हिंदी फिल्मों के कितने ही प्रतीक्षा-गीत।

तुम्हारी कविताओं को बार-बार पढ़ते हुए
देखती रहती हूँ प्रेम के कैलिडोस्कोपिक चित्र।

पता नहीं मैं तुम से प्रेम करते हुए किस से प्रेम करती हूँ?

मैंने उसकी खुली गुलाबी-सी हथेली की रेखाओं को
किसी नज़ूमी की तरह पढ़ते हुए कहा – तुम पागल हो!

हवा में उड़ कर मेरे चेहरे तक आते
उसके बालों की गंध को एक लंबे साँस के साथ इनहेल करते हुए
मैंने कहा – प्रेम अगर शरीर की ज़रूरत था
तो यह था मेरे पास।
प्रेम अगर सुरक्षा का पर्याय था
तो यह था मेरे पास।
प्रेम अगर बच्चों की किलकारी था
तो यह था मेरे पास।
प्रेम अगर उत्तरदायित्व के पहाड़ के शिखर पर अकेले चढ़ना था
तो यह था मेरे पास।
प्रेम अगर सामाजिकता था
तो यह था मेरे पास।

बस …. इस बहुकोणीय प्रेम में
मैं खुद कहीं नहीं था।

मुझे अक्सर उस प्रेम के स्वप्न आया करते थे
जिसमें मैं समुद्र के किनारे, खुले आकाश की केनवास पर
तुम्हारे चित्र उकेरता रहता था।
मेरे प्रेम में तुम कभी मेरी प्रेरणा
तो कभी मेरी कल्पना बन कर आती थी।
पता नहीं कब प्रेम, सृजन बनता था
और कब सृजन, प्रेम बन जाता था।

सुनेत्रा,
मैं अपने अनुभव और विश्वास के साथ कहता हूँ,
प्रेम सृजन की अनेक भंगिमाएँ लिए
जीवन की रिक्तताओं को भरने का सलिलतम माध्यम है।

प्रेम एक ऐसी प्रक्रिया है जो सपनों को
रंगो, शब्दों और अनेक कलाओं में बदल कर
अमरत्व प्रदान करती है।

प्रिये, हम भाग्यशाली हैं
जी रहे हैं इस प्रेम के साथ।

राजेश्वर वशिष्ठ

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