पीड़ा के स्वर

भारतीय किसान के परिप्रेक्ष्य में नहीं चाहिए राज सिंहासन ना वैभवी स्वर्ण आडम्बर एक कलम और कुछ अक्षर एक बूंद स्याही की दे दो लिखना चाहूँ मैं पीढ़ा के स्वर पीढ़ा जो अपनी नहीं है ओरो के दुःख में पली है संचित कर अश्रु के बादल हल उसका फिर भी कोई न हल एक बूंद […]

संस्मरण : लिखना तो बहाना है/ अवनीश सिंह चौहान

कई बार मैंने अपने पिताजी से आग्रह किया कि पिताजी दादाजी के बारे में कुछ बताएं? सुना है दादाजी धनी-मनी, निर्भीक, बहादुर, उदारमना व्यक्ति थे। जरूरतमन्दों की धन आदि से बड़ी मदद करते थे, घोड़ी पर चलते थे, पढे-लिखे भी थे? परन्तु, पिताजी ने कभी भी मेरे प्रश्नों का जवाब नहीं दिया। जब कभी भी […]

कंक्रीट के जंगल कुर्बानी मांगते हैं..

वाराणसी में गिरता पत्‍थर मैं कल जब यहाँ था ठीक उसी समय बस में सवारी करते हुए कार चलाते हुए बाइक से घर लौटते हुए मैं वाराणसी में भी था सुबह ऑफिस जाते वक्‍त बेटी ने कहा था पापा शाम आज बर्थडे है मेरा कैक लाना मत भूलना लौटते वक्‍त मैंने कैक को कार की […]

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