कहानियां जब बतकही सी सरल-स्वाभाविक लगें

पुस्तक – ‘आखि़री गेंद‘ की समीक्षा
लेखक -श्री राम नगीना मौर्य

ब्ंगला में कहानी के लिए ‘गल्प‘ शब्द का प्रयोग किया जाता है। अर्थात साहित्य की वह विधा जिसमें जीवन अपने स्वाभाविक छंद में बहते हुए पाठक का कम समय लेेते हुए उसे रसानुभूति में सराबोर कर सके। काफी दिनों पूर्व मौर्य जी ने अपना कहानी संग्रह ‘आखिरी गेंद‘ पढ़ने के लिए भेजा था। पढ़ते हुए इन कहानियों में वही गल्प तत्व की सरलता और जीवंत अनुभवों का पिटारा हाथ लगा। पिछले दिनों कई पत्र-पत्रिकाओं में आपकी कहानियों की समीक्षा पढ़ने के भी अवसर मिले और हर बार यही महसूस हुआ कि यह लेखक जीवन की उन अति सूक्ष्म घटनाओं पर अपनी नज़र गढ़ाए हुए है जो जीवन में सुख-दुख की धूपछांही रंग भरती हैं।
उक्त संग्रह में संकलित चैदह कहानियां जीवन की उन छोटी-छोटी हलचलों पर केंद्रित हैं जो किसी भी आम व्यक्ति के जीवन में अक्सर आती-जाती रहती हैं पर हम उन्हें उतना महत्व नहीं दे पाते। किंतु लेखक का मन तो संवेदनशील होता है तभी वह खोमचेवाले से लेकर कांपते हाथों से कुल्हड़ में चाय पीते वृद्ध को अपनी कहानियों का हमसफर बनाता चला है। आपकी कहानियों के पात्र बहुत आम होते हुए भी खास बन गए हैं क्योंकि वे आम जीवन और समाज के विभिन्न तबकों का प्रतिनिधित्व करते हैं। पत्नी से घर पर छोटी-छोटी बातों पर होने वाली बहस के रस से भी कुछ कहानियों में रंग जम गया है। कुछ कहानियां कस्बों व छोटे शहरों के चैपालांे और बस अड्डों में चलमान जीवन को सजीव कर रहीं हैं। कहीं पहाड़ों के जीवन की ठंडक महसूस की जा सकती है तो कहीं कालेज के यार-दोस्तों के गप्प मन को हरा कर देते हैं।
आपकी कहानियों के पात्र पाठक से एक अपना सा रिश्ता सहज ही बना लेते हैं। क्योंकि आपकी वर्णन क्षमता इन पात्रांे के चरित्र गठन में स्वाभाविकता के तत्व को बराबर बनाई हुई हैं। उदाहरणार्थ ‘मंै ग्राहक बारिश में‘ कहानी मंे कई पात्र आए हैं जो अचानक आई तेज़ बारिश के कारण एक बस-स्टैण्ड में आकर रुकते हैं और आम जीवन से जुड़ी उसी प्रकार की बातचीत में रम जाते हैं जैसे अक्सर किसी मुसीबत में फंसे कई अनजान लोग आपस में बतियाते हैं। कहानी के अंत तक आते-आते लेखक एक ऐसे खोमचेवाले से पाठकों का परिचय कराते हैं जिसकी इस तीव्र बारिश के कारण बिल्कुल भी बिक्री नहीं हो पाई थी। लेखक उससे कई मोज़े़ और रूमाल खरीद लेते हैं ताकि उसके परिवार का पेट पालने का जुगाड़ हो जाए। तब उस पात्र का चित्रण वे बडे़ मनायोग से यूं करते हैं-‘मैंने ये भी महसूस किया कि बावजूद इस काम-धंधे में कम कमाई के अवसर के, उस नौजवान की आंखों में गज़ब का आत्मविश्वास झलक रहा था, जो ऐसी देश-काल-स्थिति -परिस्थिति में भी जिंदगी की जद्दोजहद से जूझते, जीवन जीने की कोशिश कर रहा है।‘(पृ-52) विचारणीय तथ्य है कि लेखक की दृष्टि एक आम मोजे़ वाले की आंखों के आत्मविश्वास को पहचान पाई। उनकी यही पहचान उनके पात्रांे को और अधिक स्वाभाविक, पाठकों के और करीब लाकर खड़ा कर देते हैं। इसी प्रकार ‘मिश्रित अनुभव‘ कहानी में वर्णित क्रेश की मालकिन का स्वभाव और चरित्र एक आम भारतीय गृहिणी को साकार करता है जो परिवार की गाड़ी खींचने के लिए अटूट परिश्रम से नहीं कतराती बल्कि उसके होठों की हंसी और उसकी जीवंतता पाठकों को बड़ा प्रीतिकर लगता है। लेखक के शब्दों में -‘यद्यपि यह औरत पैसों की कमी का रोना रोती ज़रूर है, पर अपना काम बड़े ही जोश-जुनून और मुश्तैदी से करती है। रोज़ सुबह अपने बच्चों को तैयार करा कर स्कूल भेजना, फिर दफ्तर जाने वाले अपने पति के लिए नाश्ता बनाना, इसी बीच एक-एक कर क्रेश में अपने-अपने बच्चों को छोड़ने आने वाले पैरेंट्स निबटना, उनके बच्चों को भी संभालना काफी दौड़-भाग का और थकाउ काम है। बावजूद जीवन के तमाम झंझावात के वह अपनी सारी थकावट भूल-भालकर दिन भर बच्चों के साथ हिलगी रहती है। हरदम खुश रहती है।‘(पृ-55)
आपकी कहानियों के संवाद ही उनकी जान हैं। बड़े ही सरल पर दिलचस्प ढंग से आपने कथोपकथन का बाना तैयार किया है। कहानियों के कथ्य इन उत्सुकतापूर्ण और रोचक संवादो का हाथ थामे बड़ी तेज़ गति से पाठको के मन मंे उतरने लगते हैं। आपके संवाद दो दोस्तों की बतकही से लेकर पति-पत्नी की नोक-झोंक को समाए हुए हैं। किसी बूढ़े भिखारी की दीनता कहीं झलकती है तो कहीं माॅल के सेल्समैन की सौजन्यतापूर्ण कथोपकथन के रंग जमाते हैं। पर हर स्थिति में आपके कथोपकथन पाठकों को पात्र की मनःस्थिति का अक्स प्रस्तुत करते हैं। कहीं-कहीं पर आम से लगने वाले संवाद भी बड़े दिलचस्प बन पड़े हैं-‘‘वासुदेव जी, आप पूरा नाम क्या लिखते हैं…..?‘‘
‘‘सी. आर. वासुदेव।‘‘
‘‘सी.आर माने?‘‘
‘‘छिंटाई राम…‘वासुदेव‘ मेरा ‘सरनेम‘ है।‘‘
‘‘आप अइसा करिये, हमरे मोबाइलवा पर एक ठो ‘मिस काॅल‘ मार दीजिए।…‘(पृ-86)
आपकी कहानियों की भाषा में देशज टटकापन से लेकर उर्दू का खूबसूरत अंदाज़ भी है। आम जन की भाषा की सरलता भी है और शिक्षित समाज का आभिजात्य भी झलकता है। भाषा की संप्रेषणीयता का गुण भी आपके लेखन को पाठकों के करीब लाता है। पति-पत्नी की नोक-झोंक का मज़ा तो आपकी भाषा ही साकार करती है-‘थोड़ा विचलन हो गया था। कभी-कभी मंै भी हल्के-फुल्के, मजाकिया मूड में आ जाता हूं, खैर।‘‘
‘‘अपने चश्मे को उपर-नीचे खिसकाते-सरकाते मेरी इन जड़ों से ठीक नीचे जरा गौर से देखो तो सही। दीमकों-चींटियों ने मेरी जड़ों में अभी भी अपना घर बना रखा है। इनके लिए अभी भी शरणस्थली सदृश हूं, और तो और ….मेरे आजू-बाजू, दिन-ब-दिन खत्म होते दरख्तों के बाबत बाज़दफे दाना चुगने, खा-पी चुकने के बाद परिंदों के चोंच पोंछने-मांजने का वाजिब ठीहा भी मैं ही हूं।‘‘(पृ-34) बस स्टैण्ड पर इंतज़ार करने वालों की बातचीत की भाषा में जहां स्वाभाविकता है वहीं ‘आखिरी गेंद‘ कहानी की भाषा में साहित्यिक अभिरुचि को जाग्रत करने के तत्व मौजूद हैं।
कहानी की भाषा के विषय में मौर्य जी ने विशेष सतर्कता बरती है। उनकी भाषा कहीं भी उनके उद्देश्य का साथ नहीं छोड़ती। उनकी भाषा पाठकों को उनकी मंशाओं से परिचय करवाती है। परिस्थिति को उजागर करने में भी आपकी कहानियों की भाषा सक्षम है। ठेठ हिंदी प्रदेशों के मध्यमवर्गीय परिवारों और चैक-चैपालों की भाषा का प्रयोग आपके लिए सहज सुलभ हो चुका है। और यह आपका साध्य भी था क्योंकि आपकी कहानियां भी मध्मवर्गीय जीवन को ही पाठकों के सुपुर्द करती हैं। पर जीवन को देखने का एक नया विरला नज़रिया है। किसी वाद या विमर्श के मायाजाल में न फंसते हुए आपने जीवन की सच्चाइयों को पाठकों के हाथों सुपुर्द किया है। अधिकतर कहानियों में लेखक स्वयं एक पात्र के रूप में मौजूद रहते हुए पाठकों से अपने भाव शेयर करते चलते हैं। अर्थशास्त्र के विद्यार्थी होने के कारण आपकी अधिकतर कहानियों में जीवन की आर्थिक मंशाओं और उनसे जूझते मध्यमवर्गीय समाज की चिंता उजागर हुई है। सामान्य सी दीख पड़ने वाली कथाभूमि को आपने अपनी संवेदना के बल पर पाठक के लिए रुचिकर बना दिया है। जैसे संग्रह की पहली कहानी ‘खाली बेंच‘ की कथा अत्यंत सामान्य होने पर भी एक बेरोज़गार युवक के हृदय की टीस को उजागर करती है। ठीक उसी प्रकार ‘आखिरी गेंद‘ कहानी का शिल्प नवीनता के गुण से सम्पन्न है। इसमें आपने गुरु गुड़, चेला शक्कर, दुनिया का सबसे बड़ा सपना देखा जाना अभी बाकी है, भैंस, फिल्में और रमेसरा, अम्मा और उनकी कहावतें, वार्षिक पुरस्कार समारोह आदि उपशीर्षकों के अंतर्गत कथा को विकसित किया गया है। कहानी की लंबाई अपेक्षाकृत अधिक होने के बावजूद आम जीवन से संबंधित मुद्दों और मसलों को लेकर चलने के कारण पाठक को उबाउ प्रतीत नहीं होती। खास बात है लेखक पाठक को एक दोस्त की तरह मानकर उससे खट्टे-मीठे अनुभवांे को साझा करता चलता है। ‘श्रीमान परामर्शदाता‘ कहानी मंे हास्य का पुट होने के बावजूद पति-पत्नी की आपसी नोक-झोंक की मिठास मन को आह्लादित कर देती है। प्रत्येक कहानी अपने संवादों की प्रवाहमयता के सहारे बड़ी सुनिश्चित गति से आगे बढ़ती प्रतीत होती है।
निष्कर्षतः कह सकते हैं कि अपने प्रथम कहानी संग्रह में ही मौर्य जी ने हिंदी कहानी लेखन को पुष्ट और समृद्ध करने की एक नई दिशा देने का समर्थ व सराहनीय प्रयास किया है। प्रत्येक कहानी के आरंभ में एक स्केच बना है जो कहानी के प्रति पाठक की उत्सुकता व जिज्ञासा में अभिवृद्धि करता है। ये स्केच मूलतः कहानी के मूल भाव को केंद्र में रखकर आंके गए हैं। अधिकतर कहानियों का आरंभ किसी प्रश्न से हुआ है जो पाठक की रुचि को शिथिल नहीं होने देता बल्कि एक ही बार में पूरी कहानी पढ़ जाने की इच्छा को जिलाए रखता है। ‘मैं ग्राहक बारिश में‘ कहानी का अंत तुलसी और रहीम के दोहों से होता है तो ‘दुनिया जिसे ढंग का‘ कहानी का आरंभ और अंत दोनों ही प्रश्न के साथ होता है। अतः शिल्प के वैविध्य के प्रति सजगता भी उनके इस संग्रह को पाठकांे के लिए संग्रहणीय बनाती है।
– डाॅ रेशमी पांडा मुखर्जी
2-ए, उत्तरपल्ली, सोदपुर, कोलकाता-700110
मो-09433675671

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