कुछ सपनों के मर जाने से जीवन नहीं मरा करता/अरविंद सिंह

नीरज होने का मतलब!

दिल आज शायर है, ग़म आज नगमा है..

नीरज होने का मतलब सौन्दर्य और आध्यात्म का अद्भुत मिलन। प्रेम पराग की पराकाष्ठा और सौन्दर्यबोध का अनोखा जादूगर। गीत की गहराई और प्रीत की तड़प में आध्यात्म की तलाश । गीतों का दरवेश और प्रेम का सौन्दर्य उपासक। मौन का मुखर सौन्दर्य और शोखियों की अल्हड़ता का दीदार करता रोमांटिज्म और रूमानियत का फ़नकार।
सच कहें तो नज़ाकत से सराफ़त तक। मौन से मुखर तक। गीत से गजल तक। मन से मीत तक। दिल से जुबां तक, सांसों से संवेदनाओं तक भावों का अद्भुत, आलौकिक, अविस्मरणीय, कोमल स्पंदन। नारी सौन्दर्य से नारायण तक कविता की पहुँच और उस सौन्दर्य में जन की संवेदना का मुखर गीतकार। सिनेमा से समाज तक जिनके गीतों और गजलों ने कितनों को जुबां दिया। गीतों और गज़लों को गहराई दी। महफिलों की रौनक और मंचों को ऊँचाई देने वाले गोपालदास सक्सेना ‘नीरज’ आज हमारे बीच नहीं रहें लेकिन उनके नगमें हमारे दिलों की दीरारों और जुबां पर हमेशा बजते रहेंगे। उनके मुहब्बत के तराने हर दिल के तार झंकृत करते रहेंगे।
‘शोखियों में घोला जाए फूलों का शबाब, और फिर उसमें मिलायी जाए थोडी सी शराब। ऐसे प्रेम पराग से जो नशा तैयार होगा उसे नीरज ने ‘प्यार’ कहा। सत्तर के दशक में हिंदी फिल्मी गीतों से नीरज ने बालीवुड को एक नई ऊँचाई दी। ‘बस यही अपराध मैं हर बार करता हूँ..आदमी हूँ आदमी से प्यार करता हूँ।’ नीरज के इस अपराध को समाज ने कभी अपराध नहीं माना बल्कि उसे शिद्दत सो महसूस किया और उसकी जुबां से उनके तराने फिजाओं में गुँजने लगें। कभी गीतकार तो कभी शायर के रूप में नीरज ने उम्र के चढ़ान के उतार को देखा। और उसे जुबां दिया। ‘कारवां गुजर गया गुबार देखते रहें’ का अजीम फ़नकार ने सिनेमा से साहित्य तक समाज को नये सरोकार और मायने दिये। दिलों के दर्द को जुबां दिया और आने वाली पीढ़ियों को मुहब्बत के तराने। उनकी स्मृतियों में ‘दिल आज शायर है, ग़म आज नगमा है, शब ये गजल है सनम गैरों के शेरों को ओ सुनने वाले हो इस तरफ भी करम।’ जीवन के प्रति अगाध प्रेम,-‘छिप-छिप अश्रु बहाने वालों, मोती व्यर्थ लुटाने वालों/कुछ सपनों के मर जाने से जीवन नहीं मरा करता..।
ऐसे अपराजेय योध्दा की स्मृतियों को सादर नमन।

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Post Author: admin