जुगनुओं ने भी बहुत की है बुराई मेरी /महेन्‍द्र अश्‍क

जुगनुओं ने भी बहुत की है बुराई मेरी
छिड़ न जाये कहीं सूरज से लड़ाई मेरी

जिंदगी मैंने ये जी है इन्हीं ग़ज़लों केे लिये
मेरे बच्चो ये ही ग़जलें हैं कमाई मेरी

मैं अगर जिन्दा हूँ इस अन्धेे कुए में तो फिर
एक मुद्दत से क्यों आवाज न आई मेरी

पहले कुछ सोच भी लेता था तेरे बारे में
अब तो मुझ तक भी नहीं होती रसाई मेरी

शहर के लोगों से जो रंजिशें थीं ख़त्म हुई
बच्चे करने लगे अब खुल के बुराई मेरी

अब के मौसम ने बहुत गहरी बुनी है साजिश
हर मुख़ालिफ हवा देती है सफाई मेरी

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