About

नब्बे के जिस दशक में तीसरी और चैथी ज़मात का एक मासूम, अचानक माँ-बाप और घर के परिवेश से कटकर, पूरब के आक्सफोर्ड ‘इलाहाबाद’ के नगरीय जीवन में दाखिल हुआ, वह उसके जीवन का विस्मयकारी क्षण था। यानि ‘टर्निंग प्वाइन्ट’। बचपन के ग्रामीण जीवन में साँस लेने व कुलांचे मारने वाला अबोध बच्चा, अभी बचपन को ठीक से समझ भी नहीं पाया था कि नगरीय जीवन की विषमताओं के हवाले हो गया। पिता तुल्य बड़े भाई के स्नेह और प्रेम से जीवन में गति तो आयी लेकिन माँ-बाप और घर का विकल्प शायद कोई नहीं बन सका। इलाहाबाद की धरती छात्रों के लिए तपोभूमि है, जहां से निकल जिन्दगी को मायने जरुर मिल जाते हैं।
और फिर वर्ष-2000 के आस-पास मैं, इलाहाबाद को अन्तिम रुप से छोड़ चला। आ गया अपने गाँव ‘रामपुर’। पूर्वांचल के खाटी-माटी का विविधतापूर्ण जनपद ‘आजमगढ़’ का एक छोटा सा गाँव। जिसकी सौंधी माटी मेरे लिए हमेशा आकर्षण का केन्द्र बनी रही। इलाहाबाद से अधूरी शिक्षा के साथ अपने गाँव आ गया। यहीं से स्नातक(बी.ए.), परास्नातक (एम.ए.),एल.एल.बी.,बी.एड. तथा एम.फिल. (पत्रकारिता) करता हुआ, पत्रकारिता से ही जुड़ गया। सन्-2002 में गाँव से सटे एक गल्र्स कालेज में पढ़ाता रहा और वाराणसी से प्रकाशित दैनिक आज, अमर उजाला, हिन्दुस्तान आदि से जुड़कर, जहानागंज अँचल से ग्रामीण पत्रकारिता करता रहा। यह वह समय था जब पत्रकारिता मेरे जीवन में अंशकालीन थी और अध्ययन-अध्यापन पूर्ण कालीन। लोगों के दर्द और विषमतापूर्ण जीवन-संघर्ष ने मुझे अन्दर तक आहत किया। रोजाना पीड़ितों की समस्याओं को सुनना और समझना, उन्हें न्याय दिलाने के लिए जिला-प्रशासन, पुलिस और व्यवस्था के अंगों से टकराहट, मेरे जीवन की आम बात हो गयी। इन गतिविधियों ने मुझे आत्मविश्वास और ताक़त भी दी और पीड़ितों के हृदय से निकलते आशीर्वाद मेरी अमूल्य निधि बनते गये। मेरे जीवन में सबसे कष्टप्रद समय तब आया जब, जिन समाचारों-पत्रों के लिए जी-जान से लिखता, वे संकट में मेरा साथ नहीं देते। हद तो तब हो जाती जब गरीब-मज़लूम पीड़ितों की आवाज़ भी अख़बार वाले दबाने लगे, उन्हें छापने के बजाय दूसरे पक्षकारों से मिलकर अपना हित साधने लगे। इन्हीं परिस्थितियों के गर्भ से निकली “शार्प रिपोर्टर”। मार्च-2008 से प्रकाशित यह पत्रिका ‘बेईमानों’ और भ्रष्टाचारियों के लिए ‘शार्प शूटर’ की तरह काम करने लगी। इसकी निष्पक्ष रिर्पोटिंग और धारदार खबरों ने, समाचार और विचार के इस मंच से लोगों को जुड़ने पर विवश कर दिया। हमारे इस सफ़र में जिस व्यक्ति ने सबसे महत्वपूर्ण योगदान दिया और निरन्तर दे रहे हैं वह नाम हैं-‘गुंजेश्वरी प्रसाद’। पूरी हिन्दी पट्टी का वरिष्ठ और बुर्जुग पत्रकार। जिसने न केवल शार्प रिपोर्टर की रीढ़ बनना स्वीकार किया बल्कि उसने हमें उस शख़्सीयत से भी जोडा जिसके योगदान और महत्व को शब्दों के खाँचे में नहीं पिरोया जा सकता। ‘अमन त्यागी’, ‘शार्प रिपोर्टर’ के वह आधार स्तम्भ हैं, जिनके बिना इस सफ़र में एक कदम भी आगे नहीं बढा जा सकता था। शार्प रिपोर्टर का अतीत और वर्तमान इन्हीं मजबूत हाथों के संस्कारों से पुष्पित-पल्वित हो रहा है। विजय नारायण, धाराराम यादव, श्रीधर द्विवेदी, प्रकाश सिंह (पूर्व डी.जी.पी.), सुरेन्द्र सिंह कपूर (दिल्ली), उपेन्द्र सिंह, दीपनारायण मिश्र…आदि अनेक साथियों के बल पर ही हमारी विसात बिछी है। “शार्प रिपोर्टर पोर्टल” इन्हीं गतिविधियों को और मुखर करने का मंच है। इसके संस्थापक बीरेन्द्र सिंह(इलाहाबाद) के सपनों को एक नई उड़ान देने की कोशिश। इस कोशिश में हम कितना सफ़ल हो रहे हैं। यह आप के प्रेम पर निर्भर है
हाँ, कुछ कदम और बढ़ाना चाहते हैं, जिसमें आप सभी प्रबुद्धजनों का मार्गदर्शन और आशीर्वाद की कामना है।

आपका अपना

अरविन्द कुमार सिंह