दिल के टुकड़े टुकड़े करके मुस्कुरा के चल दिये-अभिषेक सिंह नीरज

शहरनामा इतिहास पढ़िए या वर्तमान को इतिहास होता देखिए। वरना कोई भक्त न जाने कब आने वाले सालों में यह सिद्ध कर दे कि आजादी के बाद आज़मगढ़ में पहले प्रधानमंत्री आ रहे हैं।अब उनसे कौन माथा टकराये और बताये गुलामी के दौरान प्रधानमंत्री का चुनाव नहीं होता था प्रभु। प्रधानमंत्री के आगमन की तय […]

आओ राजनीति खेलें/अमन कुमार त्यागी

राजनीति जानना अलग बात है, समझना अलग और करना अलग बात है। यह खेल बहुत ही अजीब है। इस खेल में कितने खिलाड़ी होने चाहिए अभी विद्वान यह निश्चित नहीं कर पाए हैं। इस खेल के मैदान की नाप सीमित भी हो सकती है और असीमित भी। इसमें आपको हंसना भी आना चाहिए और रोना […]

थोपाथोपी का खेल/अमन कुमार त्यागी

भारत की ही नहीं बल्कि दुनिया की परंपराएं बड़ी अजीब हैं। विभिन्न देशों एवं विभिन्न संस्कृतियों वाली इस दुनिया को निराली दुनिया वैसे ही नहीं कहा जाता है। विभिन्न बोलिया, आदमियों के विभिन्न रंग-रूप, विभिन्न खान-पान, विभिन्न रहन-सहन, सभी कुछ विभिन्न होते हुए भी उनके अपने विचार किसी थोपे हुए व्यक्ति के विचार बन जाते […]

अच्छा बताओ क्या लिखूं?/अमन कुमार त्यागी

यह राजनीति कम ही लोगों की समझ में आती है। जिनकी समझ में आती है वही तो गाड़ी में बैठते हैं और जिनकी समझ में नहीं आती उनके पैर गाड़ी के पहिए के नीचे दबकर टूट जाते हैं। लेकिन नेता जी की बात उस आदमी की समझ में आ जाती है और वह घर में […]

आज कुछ लिखने का मूड है /अमन कुमार ‘त्यागी’

मित्रों मूड भी अजीब चीज होती है। कब किस चीज के लिए हो जाए पता नहीं। शुक्र है कि आज मेरा मूड कुछ लिखने का है, मगर क्या? यह शोचनीय है। कुछ बड़े लेखकों की तरह घंटे भर शौचालय में भी बैठ आया मगर समझ में ही नहीं आया, क्या लिखू? एक दो मित्रों से […]

मैं व्यंग्य नहीं लिखता/अमन कुमार त्यागी

मित्रों! मैं मन की बात कह रहा हूँ। मुझे व्यंग्य लिखना नहीं आता है। प्रयास करता हूँ लिखने का मगर सोचता रहता हूँ ‘क्या लिखूँ’ और मेरी ‘सोच के दायरे’ बढ़ते जाते हैं। मैं इतना अधिक सोच डालता हूँ कि कुछ भी लिखना तुच्छ ही जान पड़ता है। व्यंग्य ही क्या कुछ भी नहीं लिख […]

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