जुगनुओं ने भी बहुत की है बुराई मेरी /महेन्‍द्र अश्‍क

जुगनुओं ने भी बहुत की है बुराई मेरी छिड़ न जाये कहीं सूरज से लड़ाई मेरी जिंदगी मैंने ये जी है इन्हीं ग़ज़लों केे लिये मेरे बच्चो ये ही ग़जलें हैं कमाई मेरी मैं अगर जिन्दा हूँ इस अन्धेे कुए में तो फिर एक मुद्दत से क्यों आवाज न आई मेरी पहले कुछ सोच भी […]

ग़ज़ल-अग़र तुम लौट आओ तो वही ख़ुशबू बिखर जाये/-हरकीरत हीर

इक ग़ज़ल का प्रयास … मुफाईलुन मुफाईलुन मुफईलुन मुफाईलुन बह्र : हज़ज मुसम्मन सालिम ग़ज़ल ……….. अग़र तुम लौट आओ तो वही ख़ुशबू बिखर जाये खयालों में वही मीठी, हसीं मुस्कान भर जाये इशारों से, अदाओं से , निगाहों से , बहानो से किया इज़हार मैंने जो ,ज़हे सपना सँवर जाये मुझे तू माफ़ करना […]

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