पीड़ा के स्वर

भारतीय किसान के परिप्रेक्ष्य में नहीं चाहिए राज सिंहासन ना वैभवी स्वर्ण आडम्बर एक कलम और कुछ अक्षर एक बूंद स्याही की दे दो लिखना चाहूँ मैं पीढ़ा के स्वर पीढ़ा जो अपनी नहीं है ओरो के दुःख में पली है संचित कर अश्रु के बादल हल उसका फिर भी कोई न हल एक बूंद […]

कंक्रीट के जंगल कुर्बानी मांगते हैं..

वाराणसी में गिरता पत्‍थर मैं कल जब यहाँ था ठीक उसी समय बस में सवारी करते हुए कार चलाते हुए बाइक से घर लौटते हुए मैं वाराणसी में भी था सुबह ऑफिस जाते वक्‍त बेटी ने कहा था पापा शाम आज बर्थडे है मेरा कैक लाना मत भूलना लौटते वक्‍त मैंने कैक को कार की […]

मन की अंधेरी राहों पर

आभार तुमने जगा दिये हैं छूकर सोए मन के तार सजन। तुमसे ही पाया है मेरे सपनों ने आकार सजन। हुआ आज सुरभित तुमसे मेरे मन का संसार सजन। भूल नहीं सकती जीवन भर मैं तेरे उपकार सजन। जब भी दुःख के बादल छाए। जब भी पाँव मेरे थर्राए। मन की अंधेरी राहों पर तुमने […]

हादसा या बालसंहार ?

यह एक हृदयस्पर्शी कविता भर नहीं है, और नहीं सबसे नौजवान देश के मासूम बचपन की टूट चुकी सांसों की डोर पर गायी गयी मर्सिया है। और नहीं हमारी सभ्यता की मौत पर पढ़ी गयी राजसत्ता ही फातिहा। बल्कि यह हमारे समय की निर्लज्जता, राजसत्ता और समाज की सुख चुकी संवेदना, और उसकी (अ)विकसित सभ्यता […]

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