कहानियां जब बतकही सी सरल-स्वाभाविक लगें

पुस्तक – ‘आखि़री गेंद‘ की समीक्षा लेखक -श्री राम नगीना मौर्य ब्ंगला में कहानी के लिए ‘गल्प‘ शब्द का प्रयोग किया जाता है। अर्थात साहित्य की वह विधा जिसमें जीवन अपने स्वाभाविक छंद में बहते हुए पाठक का कम समय लेेते हुए उसे रसानुभूति में सराबोर कर सके। काफी दिनों पूर्व मौर्य जी ने अपना […]

‘सरहदें’ तोड़ती हैं कई तरह की सरहदें- राजेन्द्र वर्मा

कवि हमेशा सीमाएँ तोड़ता है, वे चाहें जिस भी प्रकार की हों— राजनीतिक, समाजिक, धार्मिक अथवा आर्थिक। मनुष्य सामाजिक प्राणी है और समाज के बिना उसका काम नहीं चलता, इसलिए वह सामाजिक नियमों में आसानी से बँध जाता है। यहाँ तक तो ठीक, पर जल्द-ही समाज के ठेकेदार उसे कतिपय निर्देश देने लगते हैं कि […]

कट्टा निकाल के : समकालीन समाज के प्रतिबिम्ब/डाॅ.अंजुषा सिंह

समीक्षा – – समकालीन रचनाकारों में अशोक ‘अंजुम’ संवेदनशील, सहज एवं भावप्रवण गजलकार व गीतकार हैं। आपने इस संकलन, में गजलों व गीतों में हास्यव्यंग्य के माध्यम से संवेदना, मानवीय संबंधनों एवं समकालीन मुद्दों को संरक्षित करने का प्रयास किया है। ‘कट्टा निकाल के’ कृति में 13 हास्य-व्यंग्य, ग़ज़लें तथा 33 हास्य-व्यंग्य गीत संकलित है […]

सैर `कथाकारों की दुनिया’ की

डॉ.सुपर्णा मुखर्जी, हैदराबाद mukherjee.jaydeep@gmail.com   `कथाकारों की दुनिया’ [2017] डॉ. ऋषभदेव शर्मा की ओर से पाठकों को दिया गया एक और नायाब उपहार है. संपूर्ण पुस्तक 6 खंडों में विभक्त है. पहले दो खंडों में लेखक ने जहाँ हिंदी उपन्यासों और उपन्यासकारों की दुनिया की सैर कराई है, वहीं तीसरे और चौथे में वे अपने […]

‘सूरज के छिपने तक’ : मौलिकता के मूल से मुलाक़ात

रविराज पटेल

परिलेख प्रकाशन, नजीबाबाद की नवीनतम प्रस्तुति ‘सूरज के छिपने तक’ एक सारगर्भित काव्य संग्रह है | मूलतः पटना निवासी कवयित्री रश्मि अभय द्वारा रचित एक सौ दो कविताओं का यह संग्रह कोई भी व्यक्ति के रूप में स्वयं को समझने की काव्यात्मक कोशिश है | वहीँ, यह संग्रह रचनाकार रश्मि की प्रमाणिक विशेषता की शुरुआत के रूप में भी देखा जा सकता है | Read more about ‘सूरज के छिपने तक’ : मौलिकता के मूल से मुलाक़ात

‘वृद्धावस्था विमर्श’ तथा ‘संकल्पना’ लोकार्पित


साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्था ‘साहित्य मंथन’  के तत्वावधान में आंध्र प्रदेश हिंदी अकादमीके नामपल्ली स्थित सभाकक्ष में स्व. चंद्रमौलेश्वर प्रसाद कृत ‘वृद्धावस्था विमर्श’ तथा ऋषभदेव शर्मा और गुर्रमकोंडा नीरजा द्वारा संपादित ‘संकल्पना’ शीर्षक  दो पुस्तकों का लोकार्पण समारोह भव्यतापूर्वक संपन्न हुआ जिसमें उपस्थित विद्वानों ने हिंदी साहित्य और विमोचित पुस्तकों पर विचार व्यक्त किए. अंग्रेजी एवं विदेशी भाषा विश्वविद्यालय  के भारत अध्ययन विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. एम. वेंकटेश्वर ने समारोह के मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित करते हुए  निरंतर बढ़ती जा रही वृद्धों की आबादी के पुनर्वास को इक्कीसवीं शताब्दी की एक प्रमुख चुनौती बताया 

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