राजनीति के लिये सतत क्रांति की जरूरत /ललित गर्ग-

जैसे-जैसे 2019 में होने वाले आम चुनाव नजदीक आते जा रहे हैं वैसे-वैसे राजनीतिक सरगर्मियां तेज होती जारही है। संभवतः आजादी के बाद यह पहला आम चुनाव होगा, जिसके लिये इतनी अग्रिम चुनावी सरगर्मियां देखने को मिल रही है। न केवल भाजपा बल्कि सभी राजनीतिक दलों में आम चुनाव का माहौल गरमा रहा है। अपने-अपने […]

सुलगी हुई घाटी की नई आफत/डॉ-अर्पण जैन

महबूबा से दूर हुए मोदी दिन ढलने को था आसमान से श्वेत कबुतर अपने आशियानों की तरफ लौटने ही वाले थेए कहवा ठण्डा होने जा रहा थाए पत्थरबाजों के हौसले परवान पर थेए अलगाववाद और चरमपंथ अपनी उधेड़बुन में बूमरो गुनगुना रहा थाए चश्म.ए.शाही का मीठा पानी भी कुछ कम होकर एक शान्त स्वर झलका […]

न्यायपालिका की गिरती साख/अमित त्यागी

जिस तरह से भ्रष्टाचार अन्य क्षेत्रों में हैं वैसे ही न्यायपालिका भी भ्रष्टाचार से अछूती नहीं है। कांग्रेस ने मुख्य न्यायाधीश के विरुद्ध ठीक उसी तरह की लामबंदी की जैसे वरिष्ठ वकील कर रहे थे। राहुल गांधी ने पहले पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह एवं सलमान खुर्शीद जैसे वरिष्ठों की असहमति के बावजूद महाभियोग प्रस्ताव का […]

गुजरात में भाषा के स्तर पर प्रधानमंत्री तक नीचे गिरे/अरविंद सिंह

◆ ”शर्मनाक पराजय तो सुना था लेकिन शर्मनाक विजय नहीं सुना था। गुजराती चुनाव परिणामों के बारे में आजकल यह मुहावरा पूरे समाचार माध्यमों और सोशल मीडिया पर छाया हुआ है। आखिर इसके निहितार्थ क्या हैं।क्या जीत भी कभी शर्मनाक हो सकती है। क्या हार भी कभी जीत के एहसास जितना आनंदित करती है।क्या विकास […]

तो कांग्रेस की हार के निहितार्थ भाजपा के जीत से बड़े हैं ?

मोदी ब्रांड को इस बात के लिए हमेशा जाना जायेगा कि उसने इस चुनाव (2017)में राहुल गांधी को एक परिपक्व नेता के सांचे में ढाल दिया। इस चुनाव ने राहुल को पप्पू की छवि से बाहर निकाल एक राजनेता के रूप में स्थापित कर दिया। इस चुनाव ने कांग्रेस के अंदर यह विश्वास भर दिया […]

तो कांग्रेस की ओवरहालिंग का सबसे मुफीद समय है राहुल युग ?

कांग्रेस: गांधी से गांधी तक वह पीढ़ी आज भी कांग्रेसी कल्चर में ही सोचती और जीती है। हाँलाकि इस कालखंड में गंगा, यमुना, सतलज, झेलम, साबरमती और ब्रह्मपुत्र में ना जाने कितनी जलराशि बह गयी। उस दौर में पैदा हुए बच्चे आज बुढ़ापे के दिन गिन रहे हैं। देश को सात प्रधानमंत्री देने वाली पार्टी, […]

जहर मिलता रहा..जहर पीते रहे……. बंदिशों में बेखौफ होने का मजा

याद नहीं आता इंदिरा गांधी के इमरजेन्सी के दौर को छोडकर कभी कोई प्रधानमंत्री बहस – चर्चा में आया । जेएनयू में रहते हुये मुनिस रजा तो शैक्सपियर और किट्स के जरीये क्लासिकल अंग्रेजी साहित्य को छात्रों के साथ शाम में घूमते-टहलते हुये बकायदा जीते । छात्र भी जीते । आगवानी साहेब तो जेएनयू की […]

यह प्रधानमंत्री की स्वेच्छाचारिता और निरंकुशता की पराकाष्ठा है…

नोटबंदी भारत के प्रधानमंत्री ने भ्रष्टाचार को भगाने के नाम पर, काला धन को लाने के नाम पर, नकली नोटों को मुद्रित होने से रोकने के नाम पर, कागजी करेन्सी की बन्दी और बदली का जो काम किया है, उसको अर्थशास्त्र की दृष्टि से मूर्खतापूर्ण कहा जायेगा, राजनीति की दृष्टि से मक्कारी से परिपूर्ण कहा […]

एक घातक निर्णय का हासिल क्या है ?

नोटबंदी और जीएसटी की असलियत इन खबरों ने देशवासियों को व्यग्र कर दिया है कि इस वित्तीय वर्ष की पहली तिमाही में भारत की जीडीपी की वृद्धि दर को गहरा झटका लगा है, और नोटबंदी की धोषणा के बाद चलन से बाहर की गई करीब-करीब समूची करंसी वापस बैंकों के पास लौट आई है। तो […]

योगी सरकार का एक माह

शार्प रिपोर्टर डॉट इन  किसी भी सरकार के कार्यकाल और क्रियाकलापों के समग्र मूल्यांकन के लिए एक माह का समय अधिक नहीं होता। सरकार की भावी रणनीति और विकास की रुपरेखा को समझने के लिए भी कम से कम छः माह का समय अवश्य दिया जाना चाहिए। लेकिन योगी सरकार इसका अपवाद है। कुछ अति […]

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