इरोम शर्मिला चानू: मेरी आवाज़ गूंगी है कि तेरे कान बहरे हैं ?

पूर्वोत्तर की आवाज़:-अरविन्द कुमार सिंह

नवम्बर-2000 में, जब मणिपुर की मानवाधिकार कार्यकर्ता इरोम शर्मिला चानू ?आफ्स्पा? के विरूद्व भूख हडताल शुरू कीं, तब उनकी उम्र मात्र 28 साल थी और सन् 2016 के अगस्त में, जब वे डेढ़ दशक के इस महान संघर्ष के बाद भूख हडताल और अनशन समाप्त करेंगी तो वे 44 साल की हो चुकी होंगी। इन डेढ़ दशकों में देश की इस महान अनशनकारी बेटी ने अन्न के एक दाने को छुआ तक नहीं, बल्कि उनकी नाक में स्थायी रूप से पाइप लगाकार तरल पदार्थ दिया जाता रहा। इरोम के जीवन में इन डेढ़ दशकों में आखिर क्या परिवर्तन आया कि गाँधीवादी तरीके से भारत सरकार और राज्य सरकार की व्यवस्था के विरूद्व पिछले 16 वर्षों के लगातार संघर्षों के बाद अचानक से वे उस पथ को ही छोडने का निर्णय कर लेती हैं

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यह कालेधन पर मोदी सरकार का बज्रपात है..

अरविन्द कुमार सिंह

यह कालेधन के कुबेरों पर बज्रपात है या भारतीय सियासत में भूचाल लाने की मोदी सरकार की तैयारी…। भारतीय राजसत्ता और उसकी अर्थव्यवस्था के समानान्तर कालेधन की सत्ता चलाने वाली व्यवस्था और उसकी अटूट आस्था पर संघात है या इस व्यवस्था के बलबूते राजसत्ता तक पहुँचने वाली मानसिकता पर वज्रपात? मोदी सरकार पर सवाल उठाती आवाज़ को शांत करने की कोशिश है Read more about यह कालेधन पर मोदी सरकार का बज्रपात है..

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