कुछ सपनों के मर जाने से जीवन नहीं मरा करता/अरविंद सिंह

नीरज होने का मतलब! दिल आज शायर है, ग़म आज नगमा है.. नीरज होने का मतलब सौन्दर्य और आध्यात्म का अद्भुत मिलन। प्रेम पराग की पराकाष्ठा और सौन्दर्यबोध का अनोखा जादूगर। गीत की गहराई और प्रीत की तड़प में आध्यात्म की तलाश । गीतों का दरवेश और प्रेम का सौन्दर्य उपासक। मौन का मुखर सौन्दर्य […]

बिसराम के बिरहे और भाष्यकार मुखराम की लोकदृष्टि

बिरह और वीरता भोजपुर के निवासियों के अभिन्न अंग हैं। शताब्दियों से इस अँचल की वीरप्रसू धरित्री अपने क्रोड़ में वीरता और विपन्नताओं को छिपाए हुए सिसक रही है। वीरता और प्रेम का अन्योन्याश्रम संबंध होता है। वीर अपने अवकाश के क्षणों में प्रेम की शीतल छाया में विश्राम करता है। प्रेमाश्रुओं का पानी तलवार […]

मुखराम सिंह होने का मतलब जीवटता और जिजीविषा का मिलन

पचास के दशक में जन सरोकारों को लेकर जिस एक जुझारु और मिशनरी पत्रकार ने आजमगढ़ के वायुमंडल में सिंह गर्जना की, और उसके लिए लेखनी को हथियार बना, कागज के कुरुक्षेत्र में उतरा गया, उस दिलेर और जांबाज कलम के सिपाही का नाम मुखराम सिंह ही था। वो मुखराम, जिसकी भाषा में अविरल गंगा […]

जाना एक जनकवि का….

श्रद्धांजलि… जगदीश सुधाकर (21 नवंबर, 1946 – 6 जनवरी, 2017) अभावों में जन्मे, अभावों में पले, और हम मर गए, अभावों के तले. लकड़ियाँ भी थीं इतनी कि रह गए अधजले. इन हृदयविदारक पंक्तियों के रचनाकार जगदीश ‘सुधाकर’ अभी इसी माह अपनी इहलीला समेटकर परलोक गमन कर गए। अपनी अंतिम साँस तक अभावों से जूझते […]

मन और नयन का रिश्ता/ अनामी शरण बबल

दो माह पहले ही जीवन में मैं पहली बार उनसे बात कर रहा था। कुछ ही दिनो के बाद मैने उनके नंबर पर दोबारा फोन लगाया तो उनकी आवाज आती रही कौन है…… कौन है….। पर मेरी आवाज ठीक से उधर नहीं जा रही होगी शायद।  वे मुझे पहचान भी नहीं सकी और बात अधूरी रह गयी।  अभी एक सप्ताह पहले ही फिर मुझे यह पता लगा कि वे अपने पोते की शादी में उदयपुर में कहीं गिर गयी और कमजोर शरीर इस कदर लाचार सा हो गया कि वे खुद को भी नहीं संभाल पा रही है। Read more about मन और नयन का रिश्ता/ अनामी शरण बबल

गुंजेश्वरी प्रसादः जिसने अन्तिम सांस भी समाजवादी चोले में ली……. 


-अरविन्द कुमार सिंह
वह सन् 2008 का फरवरी या मार्च का महीना रहा होगा, जब पहली बार मैं और आजमगढ़ के धूर समाजवादी श्री विनोद कुमार एक साथ कौड़ीराम जा रहे थें। दो पहिया से 70 किलोमीटर का सफ़र कब बीत गया, पता ही नहीं चला। समाजवाद और समाजवादी आंदोलनों के अतीत और वर्तमान पर बात करते विनोद भईया, गुंजेश्वरी प्रसाद की चर्चा करना कभी नहीं भूलते।

Read more about गुंजेश्वरी प्रसादः जिसने अन्तिम सांस भी समाजवादी चोले में ली……. 

Translate »